बकरीद का त्योहार ,खुशियों की बरसात
किसकी जान लेकर
किसी बेजुबान का कत्ल कर
कुरबानी के नाम पर निरीह जानवर की हत्या
उसका खून और तडपता देखकर खुशी
खून बहाना ,मांस बॉटना
क्यों इतना निर्दय दिल को बना देना
तडपन देख शॉति मिलना.
कहीं छत पर खून तो कहीं गली - चौराहों पर
आज जमाना बदल रहा है
शिकार करना यह आदिम युग की बात है
आज वह अपराध है
पहले हिन्दूओं में भी बलि प्रथा थी
पर आज वह खत्म ही हो गई है
अब लोग प्रतीक रूप में सुपारी या कोई फल काटकर बलि की प्रथा पूरी करते हैं
नवरात्र में दुर्गा को बलि देने की प्रथा उत्तर भारत में थी
पहले तलवारबाजी होती थी कबीलों में
आज वह खत्म हो गई है
हॉ उसकी जगह आंतकवाद के नाम पर मानव की हानि हो रही है
चॉद तो शीतल है और उसे देखकर बलि देना
तो दूसरी जगह उसे देख लम्बी उम्र की दुआ मांगना
समय बदल रहा है तो परम्पराए क्यों नहीं
रूढी से हटकर काम करना
उस समय की परिस्थितियॉ और आज की अलग
फिर से सोचे कुर्बानी से पहले.
जान लेने के लिए नहीं
जीने का अधिकार हर जीव का
जीओ और जीने दो
मानव बनो
हर जीव का रक्षण करो
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Tuesday, 13 September 2016
बेजुबानों को काटना और मुबारकबाद
आवाज का जादू
आवाज का जादू वह जादू है जो दिखाई तो नहीं देता पर वह बडे- बडे करतब कर जाता है कि सदियों तक कायम रह जाता है
वह अपने चारों ओर इंसान को लपेटता है
एक कटु बोली की खाई को भरने में उम्र निकल जाती है पर कटुता समाप्त नहीं होती
घाव भरता तो नहीं पर नासूर जरूर बन जाता है
वहीं एक मीठी वाणी सुनने को लोग सदियों से तैयार रहते हैं
कानों को अच्छा लगे ऐसी बोली हर कोई चाहता है
यह मानव को कुदरत का वरदान है
पर इसका इस्तेमाल करने में वह कोताही कर जाता है
जिसको सोच- समझ कर बोलना है वहॉ लापरवाह हो जाता है
और उसका परिणाम भुगतता है
एक बार तरकश से निकला हुआ तीर जैसे वापस नहीं आता वैसे ही वाणी से निकला हुआ वार कभी खाली नहीं जाता
और जब यह मीठा बोलता है तो सर चढ कर बोलता है और किसी अजनबी को भी अपना बना लेता है
इसमें कटुता और मिठास दोनों है
यह व्यक्ति के स्वयं के चुनाव पर है कि वह क्या चुनना चाहता है
लोगों के दिलों में रहना है या बाहर
इसमें कोई खर्च भी नहीं है बस संभाल कर इस्तेमाल करना है
और जिसको यह कला आ गई वह जग जीत सकता है
Monday, 12 September 2016
बप्पा की सवारी - सडक की लाचारी
गणपति बप्पा का धूमधाम से आगमन
बप्पा ,अपने भक्तों को देख प्रसन्न
इतनी भक्ति और श्रद्धा
दिन पर दिन इसमें बढोतरी
बप्पा ने मूषक से पूछा
तुम प्रसन्न तो हो ना?
मूषक ने सर हिलाकर चूपचाप हॉ कहा
क्या बात है?
आज कुछ उछलकूद नहीं
आज मैं बहुत थक गया हूँ
सडक पर गढ्डों की भरमार
हम तो साल में एक बार यहॉ आते हैं
पर यहॉ के निवासी बारहों महीने यह पीडा झेलते हैं
कभी- कभी इस कारण जान भी गवाते हैं
दूसरा इतनी आवाज
मेरा सर फटने लगा
अच्छा ,और तो कोई परेशानी नहीं?
मिठाईयों की तो कतार लगी है ,जी भर खाओ
नहीं! बप्पा अब तो खाने से भी डर लगता है
बनावटी मावे से बनी ये मिठाईयॉ हुई तो?
मैं तो छोटा- सा जीव
मर जाऊंगा ,अब तो डर लगता है
बप्पा ने हँसकर कहा
अरे मूषक ,ये तो भोलेभाले है?
इन्हें पता नहीं ये क्या कर रहे हैं
आप इन्हें सद्बुद्धि दे बप्पा
अगली बार आप आए तो गढ्ढे न हो
मिलावट न हो
और आवाज न हो
केवल श्रद्धा मन से हो
दिखावा न हो
आप तो मंगलमूर्ति हो , विघ्नहर्ता हो
गणपति बप्पा मोरया
अगले बरस तू जल्दी आ
Sunday, 11 September 2016
यह मेरा घर आज है कितना सूना - सूना
आज मैं बैठी हूँ अपने घर में
बहुत दिनों से याद आ रही थी
क्या कुछ नहीं दिया इस घर ने
हर सुख- दुख में सहभागी रहा
बच्चे बडे हुए ,पढाई - लिखाई सब इसी में
एक समय था जब यह घर गुलजार रहता था
मेहमानों और रिश्तेदारों से भरा रहता था
बच्चों के दोस्तों से घिरा रहता
न जाने कितनों का आश्रय था यह घर
इस दरवाजे से कभी कोई भूखा नहीं गया
कितनी भी संख्या हो मेहमानों की
हर किसी को अपने में समा लेता
पूजा से लेकर शादी- ब्याह
मुंडन से लेकर जन्मदिन
सब धूमधाम से यही संपन्न हुआ
बच्चों के आपस में लडाई - झगडे से
खाना- पीना और सोने तक को लेकर विवाद
पर हर कोई अपनी जगह तलाश ही कर लेता
यहॉ तक कि टेलीविजन देखने के लिए भी
बाहर दो- चार ऑखें झाकती रहती
यही मैं सास बनी
नानी बनी ,दादी बनी
यही आकर भगवान से अटूट नाता जुडा
संतों और महात्माओं से परिचय
भगवान कृष्ण की सेवा करने का अवसर
यहॉ ईश्वर के फोटों पर फूल सजे रहते
दरवाजे पर आलीशान तोरण लगा रहता
घर प्रसाद से भरा रहता
कोलाहल और शोरगुल तो अभिन्न हिस्सा थे
आज बच्चे अपने - अपने घरों में खुश है
पर उनके नए जीवन की नींव भी यही से पडी
कुछ बडे दुख भी आए पर वह भी बीत गये
बहुत दिनों के बाद पुरानी स्मृतियॉ याद आ रही है
आज इससे बडे घर में रह रही हूँ
पर इसकि जगह कोई नहीं ले सकता
यह प्रतीक है अपनेपन का
परिवार के हर सदस्य की भागीदारी का
घर केवल दीवारों से नहीं बनता
उसमें हमारी आत्मा समाई रहती है
अपनों का प्रतिबिम्ब होता है घर
आज यह सूना पडा है
पर मन इसकी यादों से भरा पडा है
और वह अमूल्य है
इसकी जगह कोई नहीं ले सकता