Saturday, 3 June 2017

मॉ ,मुझे कुछ कहना है

मॉ ,तू मेरी बात क्सों नहीं सुनती
मेरे पास क्यों नहीं बैठती
हमेशा जल्दी में रहती है
काम पर जाने की जल्दी
पालनाघर में छोडकर
मुझे वहॉ अच्छा नहीं लगता
वहॉ मैं न रूठ सकता हूं
न रो सकता हूँ
न खाना नापंसद होने पर मचल सकता हूं
मुझे तेरी जरूरत है
रूठू तो मनाए
अपने हाथों से खाना खिलाए
बगीचे में घूमाने ले जाय
मैं गिर पडू तो अपने हाथ से उठा सहलाए
गले से लगाए ,प्यारी सी चुम्मी दे
पर मैं तो इन सबसे मरहूम हूं
मैं बचपन में ही बडा हो गया
समझदार हो गया
यह सब मुझे नहीं सुनना है
तू गलती करने पर डाटे
गालों पर हल्की सी चपत लगाए
पर तेरे पास तो समय नहीं है
तू कहती है यह सब तुम्हारे लिए कर रही हूं
तुम्हारा भविष्य बना रही हूं
मुझे नहीं चाहिए
यह सब ़़़़़़़़़़
मुझे तो केवल तुम चाहिए
तेरे ऑचल की छाया में दुनिया- जहान की खुशियॉ मिल जाएगी
मुझे बस तू चाहिए.

कपडों के माप से नैतिकता का माप???

प्रियंका चोपडा से बर्लिन में हुई मुलाकात आज चर्चा का विषय बन गया है
उनका पहरावा और बैठने का ढंग उचित नहीं था
पर यह तय करनेवाले लोग कौन होते हैं
भारतीय संस्कारों की दुहाई देकर टिप्पणी करना
क्यों साडी या सलवार- कुरता पहनने वाले ही संस्कारी होते है
इसका कोई मापदंड है क्या ??
बुरखे और घूंघट में औरतों को रहना चाहिए
यह मानसिकता किसने बनाई है
वह सुरक्षित पर्दे में रहने से नहीं बल्कि औरतों की तरफ देखने का दृष्टिकोण बदलना चाहिए
आज तैराकी ,कुश्ती ,अभिनय में लडकियॉ आ रही है
तब वह भारतीय पहरावा पहनेगी तो कैसे काम चलेगा
भारतीय परिधान पहन कर तो दौड नहीं लगा सकती
प्रियंका ने क्या पहना और किस तरह बैठी
इसकी अपेक्षा भारत की बेटी विदेश में भी अभिनय के क्षेत्र में पैर रख चुकी है
इसका अभिमान होना चाहिए था

यह भारत के प्रधानमंत्री से भारत की बेटी के रूप में मुलाकात है
हिन्दूस्तान बदल रहा है
तो सोच ,पहरावा भी बदलेगा ही
वैसे भी जीवन अपने ढंग से जीने की सबको आजादी है
वैसे हॉ  - आजकल टेलीविजन सीरियल में ही भारतीय नारी का जो मापदंड तय किया गया है
वह दिखाई देता है
वास्तविकता कुछ और है
औरत घर से बाहर निकल रही है
अपनी शर्तों पर जी रही है
इस बात को स्वीकार करना आवश्यक है
समय से कदम मिलाकर ,विकास की राह चलकर और दूनियॉ को अपनी काबिलियत दिखानी है
न कि कपडो और संस्कारों के विवाद में पडना है

Friday, 2 June 2017

किसान और इतना आक्रोश

आज महाराष्ट्र का किसाान सडकों पर उतरा है
अन्नदाता अपनी ही उपज को सडकों पर फेक रहा है
जिसने इतनी मेहनत और लगन से उसे पैदा किया था
अन्न का अपमान नही करना
अन्न को नाली मेंनही बहाना
घर बुहारते समय भी एक- एक दाने को चुनकर रखना
दूध तो गो - रस है ,कटोरी को भी पानी से खंगारकर पी जाना
वही आज सडकों पर सैकडो लीटर दूध बहा रहा है
क्यों इतना नुकसान कर रहा है???
इतना आक्रोश ़़़़़
क्या यह सही है
आंदोलन करना ठीक है पर इस तरह से
जहॉ लोग भूख से मर रहे हो
बच्चे दूध के लिए तरस रहे हो
इस तरह तो अपना ही नुकसान हो रहा है
कर्जमाफी के लिए ऐसा आंदोलन
क्यों अपना नुकसान कर रहा है
कभी अपनी जान देकर ,आत्महत्या कर
कभी अपनी मेहनत को सडकों पर फेककर
बरसात - आंधी के थपेडो का सामना करने वाला
ठंडी और गर्मी की तपन सहनेवाला
मौसम की मार झेलनेवाला
प्रकृति के हर कहर को बर्दाश्त करने वाला
इतना असहनशील कैसे हो गया ???
सरकार को भी इनकी समस्याओं को जल्द से जल्द सुलझाना होगा
निर्माण करने वाला ही विनाश करे
यह अच्छा संकेत नही है

Thursday, 1 June 2017

जंगल में मोर रोया ,किसने देखा ????

मोर हमारा राष्ट्रीय पक्षी है
यह तो सर्वविदित है
बच्चा - बच्चा जानता है
पर क्यों है यह आज पता चला
एक जज ने बताया कि मोर ब्रहचारी है
वह मोरनी के साथ सहवास नहीं करता
जबकि उसके ऑखों से ऑसू निकलते हैं उसे पीकर मोरनी गर्भवती हो जाती है
अब जज साहब को यह बताने की जरूरत क्सा पड गई
कहावत है - जंगल में मोर नाचा किसने देखा
मोर को तो देख पाना दुर्लभ है तो उसके ऑसू कहॉ से दिखेगे
हॉ मोरपंख को बाजार नें बिकते हुए जरूर देखा है
बात गौ माता की हो रही है
उन्हें राष्ट्रीय पशु बनाने की मांग चल रही है
राष्ट्रीय पशु घोषित हो या न हो
इससे हमें कोई फर्क नही पडता
वे तो हमारे दिलों में विराजमान है
हमारे तैतीस करोड देवी - देवताओ का वास उनमें माना जाता है
अगर पशु की नजर से भी देखे तो दूध से लेकर गोबर और मूत्र तक उपयोगी है
उनको माता की उपमा दी गई है
जन्मदात्री ,नदी और गाय
इनको ही हम मॉ कहते हैं
यह तो जीवनदायिनी है
भगवान कृष्ण के सर पर मोरमुकुट और साथ में गैया को तो हम देखते ही हैं
गऊ माता की बराबरी तो कोई नहीं सकता