Thursday, 20 May 2021

तब जीवन में आ जाएं बहार

सब कुछ  धुल गया
जमी हुई  धूल - मिट्टी
छत पर
पेड  - पौधों  पर
यहाँ  - वहाँ 
जहाँ  भी गंदगी
कूडे  का ढेर
सब बह गए
सब निर्मल और स्वच्छ
वर्ष  में  एक बार आती है
सब धोकर जाती है
हम  भी दीपावली  में  साफ - सफाई  करते हैं
रंग - रोगन  करते  हैं
पुरानी  चीजें निकालते  हैं
नये से घर  सजाते हैं
सब यत्न  करते हैं
मन को नहीं  धोते
बरसों  की जमी हुई  मन को टीसने  वाली बातें
पीड़ा  दायक घटनाएं
सब सहेज कर  रखे हुए  हैं
समय-समय पर  पीछे  मुड़कर  देखते हैं
घावों  पर मरहम  लगाने  की अपेक्षा
उसे कुरेद - कुरेद कर ताजा करते रहते हैं
दुखी रहते हैं 
अपनों  को  भी दुखी करते रहते हैं
क्यों न मन को साफ किया जाएं
दीपावली  पर घर तो होली पर मन
घर में  दीए  की  रोशनी
मन में  रंगों  की  बौछार
सावन में  बरखा की फुहार
तब जीवन में  आ जाएं  बहार

बरखा रानी जरा जम के बरसों

आज प्रकृति ने भी ली अंगडाई  है
फिर बरखा की फुहार  आई है
रिमझिम  रिमझिम  बरसे बदरा
प्रकृति  का भी डोले जियरा
मौसम  हुआ सुहावना
हरियाली  से हुए गदगद
पेड - पौधे  और तपती  धरती
वे भी है डोल रहे
हर हर शोर मचा रहें
मेंढक  उछल कूद  कर रहें
चिडियाँ रानी घोसले  में  दुबकी
मिट्टी  भी सौंधी  सौंधी  महक  रही
सब मानो कह रहे
बरखा रानी जरा जम के बरसों

Wednesday, 19 May 2021

हम भीगते रहें

बारिश   की बूंदों  ने जैसे  ही छुआ
मन में  सिहरन सी हुई
याद आ गई
वह पहली मुलाकात
तुम सकुचे  से
मै चाहती पास - पास आना
तुम  रहते दूर- दूर
तब आया एक साथी
वह था तुम्हारा  छाता
आ गए
पास - पास
एक ही छाता
उसमें  हम  और तुम 
कभी यहाँ  कभी वहाँ
तुम  मुझे  भीगने से बचाते
मेरी तरफ छाता करते
इस तरह पास - पास आते
मैं  मन ही मन खुश होती
जान - बुझकर 
इधर-उधर होती
तुम्हारी  परेशानी  देख मन ही मन मुस्काती
इतना  केयर करना
यह भी तो एक तरह का प्यार  है
जो मुझसे  अपनी बीवी से भी सकुचाए
वह किसी और  की तरफ  क्या देखेंगा
यह गूरूर  तो हमेशा रहा है
मेरा पति केवल मेरा है
न हो धन - दौलत
न हो घर - बार
कोई  बात नहीं
बस प्यार  रहे बरकरार
हमारा और तुम्हारा  साथ
एक ही छाते के  नीचे
तब चाहे हो बारिश या तूफान
तो उसका भी सामना कर लेंगे
हर बवंडर  को  दूर भगाएंगे
अपने  उडते  हुए  छाते की डंडी कस कर पकड़  रखेंगे
बरखा भिजाती  रहें
हम भीगते रहें

कान्हा और कृष्ण

सवाल है कान्हा तुमसे
तुम राधा के हो या रुक्मिणी  के
अगर  प्रेम  राधा  से
तब ब्याह  रुक्मिणी  से
प्यार  बंटता  भी नहीं
प्रथम  प्रेम को भुलाया  नहीं जा सकता
राधा को तो तुम  कभी भूले ही नहीं
राधा भी तुमको कभी  भूली नहीं
तब क्या  रुक्मिणी  से प्रेम  नहीं  था

नहीं  प्रेम  को बांटने की भूल न करें
प्रेम  का स्वरूप  अपार  होता है
प्रेम  तो मुझे  दोनों  से था
एक मेरी  बाल सखी थी
उसके साथ खेला कूदा था
निश्छल  प्रेम  था
वह कान्हा  का राधा से प्रेम  था
गोकुल  से  गोपियां  सब उसमें  समाएं  हैं
मैं  हमेशा  राधा का  रहा
तभी  तो राधे श्याम  कहलाता  हूँ
उसके साथ ही पूजा जाता  हूँ

रुक्मिणी  से भी प्रेम  था
वह रानी थी मथुरानरेश  कृष्ण  की
वहाँ  मैं  राजा था
कूटनीतिज्ञ श्रीकृष्ण
ईश्वर  था

राधा का कान्हा  और  रुक्मिणी  के कृष्ण  में  बहुत  फर्क था
एक राजा और दूसरा  गोपाल
एक का पति था दूसरे  का प्रेमी
एक गोपी दूसरी  राजकुमारी
राजकुमारी के लिए  मैं  अपनी गोपी को नहीं  भूला
राधा  मेरे मन में  थी
रुक्मिणी  मेरी  अर्धांगनी  थी
कर्तव्य  दोनों  के प्रति  था
एक को दिल में  बिठाया 
दूसरी  को अपने  साथ  राजसिंहासन पर
कान्हा ही कृष्ण  है प्रेम  भी शाश्वत  है