Thursday, 20 August 2026

दोषी केवल औरत ???

प्रेम का पैमाना क्या 
प्रेम न बांटा जा सकता है न खरीदा 
समय-समय पर प्रेम में बदलाव हो जाता है 
क्या प्रेम सचमुच बदलता है ??
आज सुनीता - गोविंदा के चर्चे सब जगह
चालीस साल का वैवाहिक जीवन खतरे में 
धज्जियाँ उड़ाई जा रही है सुनीता द्वारा 
असलियत तो कोई नहीं जानता 
जो औरत दो बड़े बच्चों की माँ 
पूरा जीवन परिवार के लिए समर्पित 
आज वह क्यों ऐसा कर रही है 
कहीं न कहीं कुछ बात तो है 
अच्छा अभिनेता अच्छा पति हो 
यह जरूरी तो नहीं 
वे शालीनता से बोल रहे हैं 
जिसका मन टूटा हो वो कैसे बोलेगी 
उसकी भाषा बंबईया जरूर है 
बिना लाग - लपेट के 
पर भाषा से किसी को परखना 

जया भादुड़ी इसका सबसे अच्छा उदाहरण 
अमिताभ और रेखा के प्रेम के चर्चे 
उस औरत ने कैसे झेला होगा और झेल रही है 
उसका चिड़चिड़ापन सबको दिखाई देता है 
कारण नहीं 
अभिनेता जाना - माना पर पति 
यहाँ तक कि लोग बोलते हैं 
जया अमिताभ के लायक नहीं है 
बहुत मगरूर है 
रेखा से शादी नहीं करने दी 
उसकी जिंदगी खराब की 

अरे यह कौन सी बात हुई 
कौन पत्नी यह स्वीकार करेंगी 
यह भी याद रहें कि यह प्रेम विवाह था 
उस समय जब जया शीर्ष पर थी 
अमिताभ फ्लाप हो रहे थे 
घर - बच्चों के कारण काम छोड़ा 
भादुड़ी से बच्चन बनी 
अपने को पूर्ण समर्पित किया 
और आज वह विलेन बन गई 

राधा का नाम कृष्ण के साथ 
पूजा भी जाता है 
रूक्मणि ने क्या अपराध किया था 
यही तो वह समाज है 
कब किसको उठाए और किसको गिराए 
ऊपर से दोषी केवल औरत ??

कर्म हमारा

एक गलत फैसला क्या लिया 
उसने जिंदगी की दशा और दिशा ही बदल दिया 
जिंदगी को दशकों पीछे कर दिया 
न जाने क्या-कुछ सोचा था 
क्या-कुछ सपने देखे थे 
भविष्य के ताने - बाने बुने थे 
ऐसा मझधार में पहुंच गया 
उसमें अभी तक डूब - उतरा रहा हूँ 
बाहर आने की कोशिश भी की 
सफल भी हुआ 
लेकिन क्रम अभी जारी है 
कब खत्म होगा पता नहीं 
फिर भी सुकून है 
उससे तो बाहर आया 
बहुत कुछ समझ आया 
अब तो हर पग सोच-समझकर धरना है 
जल्दबाजी कभी अच्छी नहीं होती 
समय को भी समय चाहिए 
वैसे यह भी पता है 
हमारे चाहने से कुछ नहीं होता 
होता वही है 
      जो वह चाहे 
होयहै वही जो राम रचि राखा 
अब नजर उस पर
कर्म हमारा फल उसका 

Monday, 17 August 2026

तू है तो मैं भी

जिंदगी ने मुझसे कहा 
अभी तो बहुत से इम्तिहान बाकी है 
मैने भी हंसकर कहा 
तू उसे जारी रख 
अभी मुझमें जान बाकी है 
तू अपना कर्म कर मैं अपना 
इतनी जल्दी तो मैं भी हार मानने वाली नहीं 
तू भी तो इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं 
जान है तो जहान है 
तू मुझसे अलग तो नहीं 
तू है तो मैं भी हूँ 

Happy Nagpanchami

हम हिन्दू हैं 
हिन्द के वासी है 
सबसे न्यारे हैं 
हम वह हैं 
जो सर्प की भी पूजा करते हैं 
विषधर है यह जानते हुए भी 
हमारे शिव तो उसको अपने गले में धारण कर रखे हैं 
सबको जीने का अधिकार 
सब ही हैं प्रकृति के अंग 
सभी का योगदान यहाँ 
कोई जीव बेकार नहीं यहाँ 
सबकी अपनी महत्ता 
दोस्त कहते हैं इसे किसानों का 
सर्प को भी मित्र 
यही तो हैं हम
हमारी संस्कृति 
जब तक हमें कोई छेड़ता नहीं तब तक हम कुछ नहीं करते 
छेड़ा तो हम छोड़ते भी नहीं 
ऐसे ही तो हैं हमारे नागराज 
भोले के गले की शोभा 
नमन है तुम्हें 
सभी को नागपंचमी की शुभकामना 

Saturday, 15 August 2026

आज हवा भी स्वतंत्र है

आज हवा भी स्वतंत्र है
झूम झूम कर कह रही है
झंडा ऊंचा रहे हमारा 
यह पेड़ भी सरसरा रहे हैं 
हरियाली से भरे भरे
खडे हैं ठाठ से
सूरज भी सिंदूरी आभा फैला रहा है
आसमान भी शुभ्र सफेद बादलों के साथ 
लगता है धरती से आसमान 
सफेद , हरा और केसरिया 
सब झंडे का स्वागत कर रहे हैं 
भारत की स्वतंत्रता के साक्षी 
देशभक्ति का गान चारों तरफ
बच्चे से बूढे सब उत्साहित- आनंदित 
नये - नये  कपडे पहने सब 
सलामी दे रहे 
हमारे प्यारे झंडे को
राष्ट्र धुन बज रही है
शहीदों को याद किया जा रहा है
लगता है वक्त यही ठहर जाएं 
झंडे को देखते रहें 
सबसे ऊंचा सबसे अच्छा 
इसकी तो छटा ही निराली 
हमारा भाग्य 
हमारा कर्म 
हमारा धर्म 
सब इसमें ही संचित 
न जाने क्या- क्या बलिदान देना पडा है
आज उनको भी याद किया जा रहा है
ऑख भर आ रही है
मुख पर मुस्कान 
एक अलग ही तरह के तेज से ओत-प्रोत 
हर शख्स हर भारतीय 
हमारी सांस 
हमारी धड़कन 
सब इसमें समाई 

जब तक यह है 
तब तक हम है 
     जय हिन्द 
              जय हिन्द की सेना

Friday, 14 August 2026

कान्हा से द्वारिकाधीश तक का सफर

कान्हा और द्वारिकाधीश
मुरलीधर से सुदर्शनचक्रधारी तक के सफर में कृष्ण ने बहुत कुछ खोया भी है। उसका दर्द बयां करता एक छोटा सा प्रसंग।

कृष्ण और राधा स्वर्ग में विचरण करते हुए 
अचानक एक दुसरे के सामने आ गए

विचलित से कृष्ण- 
प्रसन्नचित सी राधा...

कृष्ण सकपकाए, 
राधा मुस्काई

इससे पहले कृष्ण कुछ कहते 
राधा बोल उठी-

"कैसे हो द्वारकाधीश ??"

जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया

फिर भी किसी तरह अपने आप को संभाल लिया

और बोले राधा से ...

"मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!

आओ बैठते है ....
कुछ मै अपनी कहता हूँ 
कुछ तुम अपनी कहो

सच कहूँ राधा 
जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी..."

बोली राधा - 
"मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे जो तुम याद आते

इन आँखों में सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे

प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको ?

कुछ कडवे सच , प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए
यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए ?

एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर भरोसा कर लिया 
और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए ?

कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो ....
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी
प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी ? 
सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी

कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ ?

कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता

युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है
युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं
और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं

कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है
पर किसी को दुःख नहीं देता

आप तो कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो

पर आपने क्या निर्णय किया
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया ?

सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालाक होता है
उसका रक्षक होता है

आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी ?

क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे

आज भी धरती पर जाकर देखो

अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे 
हर घर हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे

आज भी मै मानती हूँ

लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है

मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं, i.
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं

गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है, 
पर आज भी लोग उसके समापन पर " राधे राधे" करते है". 🙏 COPY PEST
    

     कृष्ण का राधा को जवाब

नहीं राधा मैं तुम्हे भूला ही कहा था
मैं तो स्वयं को तुम्हारे पास ही छोड़ गया था
मुझे मथुरा तो जाना ही था
माता -पिता का कर्ज चुकाना था
उनको जेल में कैसे रहने देता
मामा कंस के अत्याचार से मुक्त करना था
प्रजा के प्रति कर्तव्य पूर्ण करना था
यमुना तो आज भी याद आती हैं
बचपन को कैसे भूल सकता हूँ

राजा का कर्तव्य था
बांसुरी कैसे बजाता
सुदर्शन चक्र को उठाना पड़ा
पांडव को अन्याय से बचाना था
बुआ कुंती को धीरज बंधाना था
राजसभा मे पांचाली का चीरहरण
यह समस्त नारी का अपमान
राधा यह कैसे देखता
मैं कैसे गोकुल मे बैठा रास रचाता

भगवतगीता का उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं
यह समस्त मानव जाति के लिए था
सुदामा को भी मैं भूला नहीं
उनको तो मै सब कुछ बिन मांगे दे दिया
मित्रता को नया आयाम दिया
आज भी हमारी मिसाल दी जाती है

समाज को नई दिशा देनी थी
मैं युद्ध से कैसे दूर रहता
फिर भी मैंने शस्त्र नहीं उठाया
माता गांधारी का शाप भी मुझे मिला
जीत पांडवों की दोषी मैं बना

कर्म का महत्व जगत को समझाने वाला
मैं एक राजा का कर्म कैसे नहीं करता
मुझे दूख हो रहा था 
पर महाभारत का युद्ध तो निश्चित था
जब -जब धर्म की हानि होगी
मुझे तो आना ही पड़ेगा
वहाँ गोवर्धन उठाया था उंगली पर
यहाँ सुर्दशन घूमा रहा था

मैं तुमको कैसे भूलता
मेरी मुस्कराहट मे तुम ही तो थी
गीता मे तुम भले ही न हो
पर आज भी मैं राधे श्याम ही के नाम से जाना जाता हूँ
राधा बिना तो मैं अधूरा ही हूँ।

यह जवाब मेरे द्वारा लिखा गया है

Sunday, 9 August 2026

सब पर जाहिर न करें

थोड़ा धूप अपने लिए भी छुपा रखना 
न जाने कब उसकी जरूरत पड़ जाए 
थोड़ी यादें मन के एक कोने में दबाकर रखना 
न जाने कब मन उसमें रमने का मन करें 
कुछ बातें अपने मन में छिपा कर रखिए 
समय आएगा तो बताना अभी इतनी जल्दी क्या है 
हर खुशी दूसरों के सामने जाहिर न करें 
क्या जाने किस की बुरी नजर लग जाए 
अपनी बातें अपनी यादें 
अपना सुख - दुख अपने तक सीमित रखिए 
ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता क्या है 
जीवन व्यक्तिगत है सार्वजनिक नहीं 
हर बात का ढोल बजाना 
उचित नहीं 
यहाँ सब आँख गड़ाए बैठे हैं 
घात लगाए बैठे हैं 
शिकारी जैसे शिकार पर झपट्टें को तैयार हैं 
बस कुछ सुनने में आना चाहिए 
बाकी सब तो वो खुद कर लेंगे 
एक चेहरे पर कई मुखौटें लगाए हुए हैं 
चेहरे पर मुस्कान दिल में जहर भरे बैठे हैं 
पग - पग पर सांप और बिच्छू सरीखे 
डंक मारने - डसने को तैयार हैं 
उनको मौका क्यों देना है 
थोड़ा चालाक भी बनना है 
हमारा सब हमारे तक ही सीमित रहे 
सब पर जाहिर न हो 

Saturday, 8 August 2026

वह बहुत अच्छा है

वह कहती अक्सर अपने सहेलियों से 
अपने परिवार- रिश्तेदारों से 
उसका लाईफ पार्टनर बहुत अच्छा है 
उसकी सब जरूरतें पूरी करता है 
हर फर्माइश पूरा करता है 
सर ऑंखों पर बिठाकर रखता है 
किसी चीज की कमी नहीं होने देता 
बस वह अपनी ईच्छा से कुछ नहीं कर सकती 
कोई निर्णय नहीं ले सकती 
कहीं आ - जा नहीं सकती 
किससे बात करनी किससे नहीं 
किससे दोस्ती करनी किससे नहीं 
कपड़े कैसे पहनना कैसे नहीं 
खाना क्या बनाना क्या नहीं 
यह सब वह डिसाइड करता है 
हाॅ वैसे वह बहुत अच्छा है 
दिल का साफ है 
बस कभी-कभार गुस्सा आ जाता है 
हाथ उठा देता है 
लग जाए ज्यादा तो डाॅक्टर के पास ले जाता है 
देखभाल करता है 
दवाई अपने हाथ से खिलाता है 
हाॅ वैसे वह बहुत अच्छा है 
बस उसको जो करता है करने दो 
उसको रोको - टोको मत 
सलाह मत दो 
उसे पसंद नहीं किसी की बात सुनना 
उससे बस काम की बात हो तो करो 
अन्यथा उसे कुछ सुनने में रूची नहीं 
उसकी बात चुपचाप सुन लो 
अपनी बात मत रखो 
तुम हमेशा हंसती रहो 
वह गुस्सा हो , जलील करें तब भी 
तुम्हें रूठने - नाराज होने का हक नहीं 
किसी को मनाना उसकी फितरत नहीं 
उसकी हर बात पत्थर की लकीर
समझौता उसके स्वभाव में नहीं 
आर या पार
थोड़ा डर कर रहो 
मुंह बंद कर रहो 
आज्ञानुसार चलो 
हाॅ वह बहुत अच्छा है 
बस उसको जानने - समझने की जरूरत है 
एक बार समझ लो ऐसे व्यक्ति को 
फिर सब कुछ अच्छा 
जीवन जेल में कैदी जैसा हो तो क्या हुआ 
खाना - पीना मिल रहा है 
आराम से जीवन यापन हो रहा है 
और क्या चाहिए 
तभी तो सबसे कहती फिरती है 
वह बहुत अच्छा है 

Friday, 7 August 2026

साड़ी से परहेज ???

समय बदलता है 
एक वक्त जो जरूरी लगता था आज वह भार लगता है 
वह है उसमें से एक साड़ी 
जो धीरे - धीरे हो गई भारी 
कभी बहाने बनाए जाते थे 
अवसर ढूंढा जाता था 
अवसर की  दुहाई देकर नई साड़ियाँ खरीदी जाती थी 
आज वह साड़ी अलमारी की शोभा बढ़ा रही है 
अब न पहनने के सौ बहाने ढूंढे जाते हैं 
एक समय की पसंद आज नहीं भाती 
मन से उतर रही है 
कारण कुछ भी हो लेकिन यही हो रहा है 
ऐसा लगता है 
यह धीरे- धीरे लुप्त हो जाएगी 
व्यक्ति का स्वभाव है 
जो उसे आरामदायक लगे 
कम्फरटेबल महसूस हो 
इसका एक अनुभव स्वयं का 
हमारे कार्यस्थल में कभी साड़ी अनिवार्य थी 
कुछ सालों बाद लोगों की मांग 
आना - जाना , भागा - धापी , बारिश 
बड़ी मुश्किल होती है 
परमीशन मिल गई 
अब आलम यह है 
नोटिस आती है कि कल यह पोग्राम है 
साड़ी पहनना है 
सबने सलवार- सूट को अपना लिया 
क्या नये क्या पुराने 
संस्कृत हमारी अपनी भाषा है 
पर वह आज मरने की कगार पर है 
सांस ले रही है क्योंकि वह आम आदमी के लिए क्लिष्ट है 
वही हाल साड़ी का हो रहा है 
यह हमारी भारतीय पहचान है 
फिर भी छूटी जा रही है 
साड़ी का स्थान दूसरे परिधानों ने ले लिया है 
सभी को कम्फर्ट जोन चाहिए 
साड़ी उसमें फिट नहीं बैठती है 
उसको भी कुछ तो बदलना पड़ेगा 
तभी शायद वह स्थान ले पाएगी 
हम जानते है और मानते भी हैं 
साड़ी तो अपने आप में बेमिसाल है 
उसके जैसा परिधान कोई नहीं 
फिर क्यों पकड़ छूटती जा रही है 
कभी शरीर की शोभा बनने वाली 
अलमारी की शोभा बढ़ा रही है 
यह हमारी पहचान है 
इसे इस तरह से उपेक्षित नहीं करना है 
पहनिए सब 
पर साड़ी से परहेज न हो 

Thursday, 6 August 2026

यही तो है संसार

सांझ होने की तरफ
सूरज धीरे - धीरे ढलान पर
बहुत समय लग रहा है 
सब इंतजार में हैं 
कब इनका प्रस्थान हो 
आभा कम हो रही है 
जाते - जाते मद्धिम होते जाते हैं 
प्रकाश धीमी गति लेने लगता है 
अंधकार का साम्राज्य घिरने वाला है 
प्रतीक्षारत में सब
कभी प्रकाश का स्वागत 
कभी अंधकार का इंतजार 
इनके बीच में जग डोलता 
कभी उजाला कभी अंधेरा 
जीवन का यही है खेला 
यही तो है संसार 

अपनी - अपनी समझ

क्या करें 
हम सबको समझ नहीं आते हैं 
क्यों ??
समझ नहीं पाए 
ऐसा नहीं कि आप समझ न पाए 
नासमझ आप भी नहीं 
हम भी नहीं 
समझदार हम भी समझदार आप भी
अब समझना ना चाहे तो बात और है 
यह सब समझ समझ का फेर है 
जो हमको समझ गए 
हम उनके होकर रह गए 
जो नहीं समझे उनसे किनारा कर लिया 
हमें अपना स्वयं प्यारा है 
किसी और से कुछ नहीं अपेक्षा
बस हमको समझे 
दिखावट हमें पसंद नहीं 
जो है जैसे हैं 
उसी में अपना लो 
अन्यथा रास्ता नाप लो 
तुम अपने रास्ते 
हम अपने रास्ते 

Tuesday, 4 August 2026

क्या बात हुई??

मैं जा रही थी 
तुमने मुझे जाने के लिए नहीं कहा था 
मैं स्वयं गई 
तुमने मुझे रूकने के लिए भी तो नहीं कहा 
पूछा भी तो नहीं 
क्यों जाना है 
क्या हुआ 
कुछ नहीं बात
कोई नहीं प्रतिक्रिया 
घर तुम्हारा था 
गलतफहमी मेरी थी 
मैंने उसे अपना माना था 
किसी और के चीज को अपना मानना 
यह तो सरासर बेवकूफी है 
हो सकता है 
तुम चाहते हो कि मैं चली जाऊ 
संकोच वश कभी बोल नहीं पाए 
इधर-उधर की बात होती रही 
मुद्दों पर बात हुई नहीं 
हंसी - मजाक में टाल दिया गया 
हर बार मजाक नहीं भाता 
जिंदगी भी मजाक करती है तब 
तब सब कुछ खत्म कर देती है 
हंसना नहीं आता 
वह ऐसा झटका देती है कि चारो खाने चित्त 
कुछ नहीं सूझता है 
सब प्लान धरा का धरा रह जाता है 
तब न तुम कुछ कह पाते हो 
न मैं कुछ कह सकती 
बस सोचते रह गए 
क्या बात हुई  ???

जीवन एक जंग है

यह पूरा का पूरा समंदर हमारा नहीं है 
यह हम भी जानते हैं तुम भी जानते हो 
रहना भी इसी में है 
सीप - मोती - हीरे - जवाहरात भी इसी में खोजना है 
हर बार हाथ में बहुमूल्य ही लगे ऐसा भी नहीं है 
कंकर - पत्थर भी रेत के कण भी हाथ लग सकते हैं 
उतरना भी इसी में है 
डूबना - उतरना भी इसी में 
किनारा भी ढूंढना और पहुंचना भी 
कहने जितना आसान नहीं 
हजारों तरह के जीव इसमें 
न जाने कब कोई हमला कर दें 
जानलेवा हो जाए 
राह में रूकावट बन जाए 
भंवर भी इसी में 
कब अपने में लपेट ले 
सब बाधा को पार कर किनारे आना है 
अच्छा तैराक बनना है 
तभी तो इस विशाल समुंदर में जीवन नैया किनारे लगेगी 
कमजोर हो डूबना नहीं है 
डूबाने को लोग तैयार बैठे हैं 
पहचानना है 
कहाँ गहरा है 
कहाँ उतरना है 
कहाँ आगे बढ़ना है 
उतरना जरूर है घबराना नहीं है 
बिना उतरे कुछ हासिल नहीं होगा 
हर बार सफलता मिले ऐसा भी संभव नहीं 
हार - जीत तो खेल है 
जीवन एक जंग है 

जिंदगी का सफर

सफर जिंदगी का सबका एक सा नहीं रहता 
किसी का समतल तो किसी का उबड़ - खाबड़ 
यह स्वयं पर नहीं होता 
भाग्य पर होता है 
आपका जन्म ईश्वर द्वारा निर्धारित है 
उसमें आप क्या कर सकते हैं 
अपना कर्म आपके हाथ में हैं 
मेरे पास क्या 
उसके पास क्या 
उसे सब कुछ मुझे नहीं 
ऐसा प्रश्न आना स्वाभाविक है 
आपके पास योग्यता है 
आपके पास गुण है हुनर है 
यह भी तो मिला है 
इसका भी धन्यवाद देना है 
आप अपने आप को मजबूत बना सकते हैं 
किसी पर निर्भर नहीं 
अपना रास्ता स्वयं पार कर सकते हैं बिना किसी के सहारे 
सबका जीवन अलग- अलग 
किसी की तुलना से क्या लाभ 
अपना जीवन सुंदर बनाना 
सफल बनाना 
यह आपके हाथ में है 
जो नहीं है उसे छोड़ दें 
जो है उसे मुठ्ठी में कसकर पकड़ लें 
सफर सुहावना बन जाएगा 

Monday, 3 August 2026

मैं और जिंदगी

आज जिंदगी मेरे सामने आ खड़ी हुई 
मैंने हंसकर कहा 
क्या हुआ 
अब क्या कहना है 
क्या सुनना है 
वह हंसने लगी 
अभी तो बहुत कुछ बाकी है मैडम 
उम्र खिसकी जा रही है 
और तू ऐसा कह रही है 
अभी कहा उम्र हुई बहुत पड़ी है 
बचपन छूटा 
जवानी छूटी 
अब तो लास्ट है 
यहाँ लास्ट- वास्ट कुछ नहीं होता 
सब फर्स्ट है 
हर दिन नया सबेरा 
हर दिन नयी आशा 
हर दिन नया कार्य 
मैं जब तक साथ हूँ तेरे 
अनवरत चलता रहेगा 
एहसान मानो मेरा 
मैं साथ चल रही हूँ 
मुझसे अलग तुम कहाँ 
मैं तुममें समाई 
देखो तो जरा 
सोचो तो जरा 
कितने काम पेंडिंग है 
अभी इतनी जल्दी एन्डिग नहीं है 
एंजॉय करो 
हंसो - मुस्कराओ 
नाचो - गाओ 
जिंदगी के साथ खुशियां मनाओ

जी भर जी लो

आओ जरा साथ बैठ ले 
हंस - मुस्करा ले 
कुछ गुफ्तगूं कर लें
जो छूट गया है वो सहेज लें 
जो टूट गया है वह जोड़ लें 
कुछ अपनी कहो कुछ हमारी सुनो 
कुछ शिकवे - शिकायते कर ली जाए 
मुस्कराकर हर गम को भूल जाए 
एक - दूसरे की कमी को नजरअंदाज कर दिया जाए 
कुछ गलतियों को माफ कर दिया जाए 
Hello- Good morning 
कह दिन की शुरुआत की जाए 
न जाने कब Good bye कहना पड़ जाए 
जो इतनी खूबसूरत जीवन मिला है 
उसे जी भर तो जी लिया जाए 

Sunday, 2 August 2026

जवानी हंस रही है

आज हंसना भूल गए 
उसके लिए भी सोचना पड़ता है 
एक समय था जब हंसी अपने आप आ जाती थी 
बिना कारण कहीं भी कभी भी 
किसी से डांट पड़ने पर भी 
स्वयं गिरने पर भी दूसरों के तो अनायास ही 
वाकया है उस समय का 
जब हम यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे 
क्लास छूटते ही बाहर झुंड बना बतियाते थे 
घर जाने की जल्दी नहीं रहती थी 
समय का तो पता ही नहीं चलता था 
एक बार ऐसे ही खड़े थे 
प्रोफेसर भी अपनी - अपनी क्लास से निकलते थे 
कभी-कभार उनको जाने की जगह भी नहीं बचती थी 
सब अपने में  मग्न और मशगूल 
तभी एक सर ने कहा 
क्या फालतू ही - ही करते रहते हैं ये सब
तब दूसरे सर ने उत्तर दिया 
यार छोड़ो 
जवानी हंस रही है 
इतने बरसों बाद भी आज वह वाक्य गूंजता है 
तो मुस्कान अपने आप आ जाती है 
वह उनका कहा 

जवानी हंस रही है 

Dost I love you

मित्रता जन्मजात नहीं होती 
खून का रिश्ता भी नहीं होता 
कुंडली का मिलान भी नहीं किया जाता 
औकात भी नहीं देखी जाती 
जबरदस्ती भी नहीं बना सकते 
उम्र का बंधन नहीं 
जाति और धर्म भी आड़े नहीं 
प्रांत और भाषा भी नहीं 
जब दिल से आवाज आती है 
मन से मन मिलते हैं 
अपने आप हो जाती है 
योजनानुसार नहीं होता 
आप उसके साथ हंस सकते हैं 
रो सकते हैं 
नाच - गान कर सकते हैं 
मनसोक्त घूम सकते हैं 
बिना कारण घंटो बतिया सकते हैं 
सच्चा मित्र जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है 
जिसको मिल गया उसका जीवन संवर गया 
दिल खोल कर रख सकते हैं 
आपको वह समझ सकता है 
आपमें कितने भी दुर्गुण हो तो भी वह कर्ण जैसा साथ नहीं छोड़ता 
आप गरीब भी हो तो वह आपका कृष्ण है जो सम्मान और प्रेम देना नहीं छोड़ता 
अपनी निराशा , दुख , खीज , क्रोध उस पर जाहिर कर सकते हैं 
विश्वास पात्र मित्र जीवन संजीवनि होता है 
जब सब साथ छोड़ दे तब भी वह डटकर खड़ा रहता है 
वह सगा नहीं होता 
रिश्तेदार नहीं होता 
उनसे बढ़कर होता है कभी-कभार 
दिल से दिल का जुडाव है यह
सब बंधन से मुक्त 
कोई पर्दा नहीं 
कोई एहसान नहीं 
न Sorry  न Thank you 
    दोस्त 
I love you 

Saturday, 1 August 2026

मैं सूर्य

मैं सूर्य था 
जग को प्रकाशित करना मेरा कार्य 
अंधेरा दूर करने को प्रतिबद्ध 
कुंती तो विवश थी 
लोकलाज का डर था उसे 
वह कुंवारी माता बनी जिसे समाज स्वीकार नहीं करता 
दो कुल का भार था उस पर
पर मैंने क्या किया 
क्या कर्ण के जन्म का भागीदार मैं नहीं था 
मैं उसे अपमानित होते देखता रहा 
कुंती ही अकेले उसकी जिम्मेदार नहीं थी 
मुझ पर क्यों कोई लांछन नहीं लगा 
सारा अपमान कुंती पर
कोसा उसे गया 
बताती तो कुल्टा कहलाती 
कैसी मां जो बच्चें को नदी में बहा दिया 
वह रोती रही बिलखती रही 
उसकी पीड़ा - मजबूरी को किसी ने समझा 
कर्ण ने भी उसे लताड़ा 
स्वाभाविक भी था 
बच्चा तो दोषी नहीं था 
उसका कोई कुसूर भी न था 
कुंती महलों की महारानी बनी रही 
पांच महारथी में स्नेह बांटती रही 
मैं देवता बना रहा 
पूजन करवाता रहा 
मैं सारे संसार में प्रकाश बांटता रहा 
कर्ण के जीवन का अंधेरा 
महाभारत के युद्ध का कारणों में एक था 
माता - पिता की पहचान के बिना नाजायज संतान 
धर्म को जानते हुए भी अधर्मी दुर्योधन के साथ खड़े रहना 
योग्यता की कद्र नहीं 
पहचान के लिए तरसना 
महाभारत को कौन टाल सकता था 
अन्याय और अधर्म पर खड़ा समाज 
उसे खत्म होना ही था 
द्वारिकाधीश को अवतरित ही होना था 
दोषी तो सब थे 
अकेला दुर्योधन नहीं 
वह तो वह नैया थी जो डूबने की कगार पर थी 
नाविक का अता - पता नहीं 
कोई वचनबद्ध तो कोई धर्म राज तो कोई तन - मन से नेत्रहीन 
धर्म हिचकोले खा रहा था 
दुर्योधन ने डुबो दिया 
अच्छा ही हुआ 
कहीं तो खत्म होना था नई शुरुआत के लिए 


मेरा हमसफर

तेरी शरारतों का अंदाज निराला 
तेरी बातों में गजब का जादू 
किसी के आगे न झुकने वाली 
हर बात में अपनी मनमानी करने वाली 
किसी की छोटा सी बात और मजाक भी नागवार 
वही शख्स तेरी हर बात पर हार मानता 
अपने को सरेंडर कर देता 
तेरा गुस्सा भी प्यारा लगता 
तेरे बिना मेरा मन भी सूना 
तू ही तो मेरी हमसफर 
कब मेरी उंगली छोड़ मेरा हाथ पकड़ने लगी 
मुझे रास्ता पार करवाने लगी 
मेरा बोझ अपने कंधों पर उठाने लगी 
मुझे दुनिया घुमाने लगी 
मुझे रहने का सलीका सिखाने लगी 
मुझे अच्छे कपड़े दिलाने लगी 
मंहगे से मंहगे होटलों में ले जाने लगी 
वह सब दिखाया जो मैंने कल्पना भी न की थी 
अपने बल पर मैं तो यह कभी करती नहीं 
हमसफर जरूरी नहीं जीवन साथी हो 
हमसफर हमारे बच्चें भी तो है 
कभी हमने उनको राह दिखाया 
आज वो हमें राह दिखा रहे हैं 
साथ लेकर चल रहे हैं 
हमने उनको वह सब नहीं दिया 
आज वो दे रहे हैं 
हमने उनकी इच्छा को दबाया 
वो हमारी इच्छा पूरी कर रहे हैं 
ईश्वर मेरे इन हमसफर और हमराही को ऐसा बनाए 
हम उन्हें देख खुश होते रहें 
जो हम न कर पाए 
वो करते रहें 
सफलता का परचम फहराते रहें 
ईश्वर से यही पार्थना 
उनकी राह आसान हो 
उन्नत हो 
प्रगतिशील हो 
खुश और सुखी हो 
इन्हें देख और कोई खुशी नहीं 
इनके चेहरे पर मुस्कान ही मेरी खुशी 
अगर खुदा आकर खुद कहें 
चलो हमारे साथ स्वर्ग 
मैं इन्कार कर दूंगी 
नहीं जाना है यही रहना है 
इनको देख जीना है 
आँसू ठीक है , मिटना ठीक है 
तभी तो 
मन कह उठता है 
                    रहने दो हे देव , मेरा मिटने का अधिकार 
वह जीवन ही क्या जिसमें अपनों की कहानी न हो