Saturday, 21 December 2019

खाकी का सम्मान करें

खाकी से इतना खौफ
यह खाकी ही है
जो रात दिन जागती है
जब हम रात को चैन की नींद सोते हैं
तब ये प्रहरी सज्ज रहते हैं
सुरक्षा के लिए
चौबीस घंटे उसी में रहते हैं
अपने परिवार को छोड़ हमारा ध्यान रखते हैं
जब आपदा आती है
तब सबसे पहले यही याद आते हैं
हम जब त्योहारो का जश्न मनाते हैं
तब यह किसी अनहोनी को रोकने के लिए सज्ज रहते हैं
यह अपनी ड्यूटी निभाते हैं
यह उनका कर्तव्य है
वह भाग नहीं सकते
जब जुलूस निकलते हैं
तब यह साथ चलते हैं
जब भीड़ उपद्रव पर आ जाती है
तब भी उनको संभालने के लिए डटे रहते हैं
अपनी परवाह किए बिना
यह सरकार के नुमाइंदे हैं
उनके आदेश का पालन करते हैं
पर वह हमारे भी कुछ लगते हैं
हमारे रक्षक हैं
तब उन पर प्रहार
उनको दौड़ाकर मारना
तब असामाजिक तत्वों के मन में इनका डर खत्म हो जाएगा
ऐसे ही लोग पुलिस को गाली देते हैं
उनके प्रति गलत धारणा बना रखी है
आप जनता है
ये जनता के सेवक हैं
उनको सैलरी आपकी सुरक्षा के लिए मिलती है
मार खाने और चोटिल होने के लिए
यह हमारी पुलिस है
उसकी खाकी वर्दी का सम्मान सभी का कर्तव्य बनता है
अपने ही रक्षक को मारेगे
तब आप कैसे सुरक्षित रहोंगे
अधिकार चाहिए तब कर्तव्य का भी पालन हो

Friday, 20 December 2019

मानव जीवन

बर्फ गलता जाता है
उसका आकार बिगडता जाता है
अंत में वह पानी बन जाता है
उसी पानी से फिर बर्फ बनाना हो
वह फिर बन जाएंगा
कोई मुश्किल नहीं
पर मनुष्य जीवन एक बार ही
वह पिघलता रहेगा
गलतियाँ और अपराध करता रहेगा
तब वह चाहे कि
फिर पहले जैसा हो जाऊं
यह संभव नहीं
एक ही जनम मिला है
उसका सदुपयोग करना है
दुरूपयोग करना है
यह तो स्वयं उसके हाथों में
न समय वापस आएगा
न जीवन
तब इसी जीवन को जी ले
सार्थक बना ले

भविष्य आपकी मुठ्ठी में

परिस्थितियां हमेशा हमारे अनुकूल हो
यह जरूरी तो नहीं
कभी हम जैसा चाहते हैं
वह होता नहीं
न भाग्य साथ देता है
न कर्म
ईश्वर भी रूठे हुए लगते हैं
हमारे अपने विवश होते हैं
हम निराश होते हैं
यह निराशा निरंतर घर करती जाती है
हमारे तन मन को बीमार कर डालती हैं
उदासी और अवसाद घेर लेते हैं
निराशावादी कभी सफल हो ही नहीं सकता
भले सब विपरित हो
तब भी आशा बनाए रखें
स्वयं पर
ईश्वर पर
भाग्य पर
कर्म पर
हमारा दिन भी आएगा
समय एक सा नहीं रहता
दशा दस साल बाद बदलती है
बारह साल बाद तो घूरे के दिन भी फिरते हैं
तब निराशा के घेरे में क्यों
अंधेरा चाहे लाख घनेरा हो
हर रात की सुबह तो होती ही है
आशा ही जीवन में चेतना का संचार करती है
आस रखिए
धीरज रखिए
धीरे-धीरे ही सही
वक्त तो बदलेगा
बदलना तो उसकी फितरत में है
वह हमेशा एक समान नहीं रहता
तब आशा के साथ प्रतीक्षा करें
भविष्य आपकी मुठ्ठी में होगा

जीवन का चक्कर

अब गुडिया बन गई बुढिया
अब बिटिया बन गई ददिया
अब आ गई चेहरे पर झुर्रिया
अब पोपले मुख से हंसती चुनिंदा दतियां
अब बालों में आ गई सफेदियां
ऑखों में छा गई धुंधलिया
अब बिछडने लगी है हमजोलियां
शरीर में आ गई कमजोरियाँ

जुबान है लडखडाती
पैर हैं कंपकपाते
शरीर है थर्राता
कान हो गया बहरा
जानते हैं
यह सब क्या दर्शाता
कानों के पास आकर कुछ कहता
उसकी बात पर गौर करो
अब छोड़ दो नादानियां
गई जवानी
आया बुढापा
जो कुछ हो रहा
वह चुपचाप देखते रहो
खाओ और पडे रहो

प्रभु का नाम जपो
अब इसी का एक सहारा
किसी को अब नहीं भाएंगी तुम्हारी दखलंदाजियां
सब कुछ नजरअंदाज करों
अब तक बहुत किया
अब तो संन्यास लो
सबसे मोह भंग करों
करना ही है
देना ही है
तो जी भर कर आशीर्वाद दो
कभी जमाना तुम्हारा
आज किसी और का
यही चक्कर है जीवन का