Sunday, 22 December 2019

ठंडी

ठंडी ठंडी बतिया
ठंडी ठंडी रतिया
ठंडी में गर्म मूंगफलियां
ठंडी में गर्म रजाईयां
ठंडी में ठंडी आइस्क्रिमियां
अब हो गईल सपनवां
अब न उ ठंडी हय
न उ बतिया है
अब सब बदल गयल
अब हीटर हय
अब तो जब चाहे गर्मी
जब चाहे ठंडी
मौसम का कौनो नहीं ठिकान
जब सब बदल गयल
तब इ बिचारों अब का करिहै
अब ठिठुरत कहीं पडल बा
अपने दिनन को याद करत बा
कहत बा
भैया जमाना बदल गयल बा

अपनी रस्सी तैयार रखिए

संमुदर में तो उतरना ही है
अपनी नाव लेकर
अब डर के किनारे ही रहे
बीच मझधार में चले जाय
यह तो हमको तय करना है
हर नाव को डूबा ही देगा समुंदर
यह कैसे संभव है
हाँ कुछ हिचकोले खाती है
कुछ पलट कर फिर सीधी हो जाती है
हर बार ऐसा नहीं होता
तब संतान को भी संसार के समुंदर में छोड़ देना है
हर संकट का सामना करने देना है
हर चुनौती को स्वीकार करने देना है
हर थपेडों को सहना सिखाना है
आंधी तूफान का सामना करना सिखाना है
गोते लगाने देना है
कब तक डरते रहेंगे
कब तक रक्षा करते रहेगे
कब तक सब छिपाकर रखेंगे
स्वयं ही डूबने उतरने दे
जीवन का भिन्न-भिन्न एहसास लेने दे
इतने बडे संसार सागर में उतरने दे
वह भलीभाँति सब जानेगा
सीखेगा
अनुभव करेंगा
आप बस किनारे पर खडे रहिए
देखते रहिये
अगर डूब रहा है
तब अपनी रस्सी तैयार रखिए
संतान को संसार के समुंदर में छोड़ना है
हर हाल में रहना
हर परिस्थिति का सामना
यह तो उसे सीखना ही है
कब तक अपनी छत्र-छाया में रखेंगे
लहरों में तो उतरना ही है

Saturday, 21 December 2019

वह औरत जो है

हाॅ मुझे मन मारने का शौक है
मैं औरत जो हूँ
न मन हो तब भी खाना बनाना है
घर को संभालना है
कहीं बाहर जाने का मन हो
कैसे जाए
घर पर कौन रहेगा
पिक्चर देखने का मन हो
तब अकेले कैसे जाऊं
कोई क्या कहेगा
होटल में खाना हो
तब भी वही समस्या
वह औरत जो अकेले घर संभाल लेती है
यहाँ वह मन मार लेती है
देर रात तक आना हो
नहीं यह कैसे हो सकता
सब कहेंगे
घर छोड़ अकेली घूम रही है
सबकी परवाह उसको
पर उसकी परवाह किसे नहीं
रात का बचा हुआ भोजन उसके हिस्से
वह सबके लिए गर्म बनाएंगी
स्वयं बासी खाएंगी
सबको परोसेगी
अपने बाद में खाएंगी
वह अन्नपूर्णा जो है
स्वादिष्ट भोजन और परिवार का पेट भरना जिम्मेदारी
घर संभालना भी
वह गृहलक्ष्मी जो है
न जाने कितनी उपाधियो से नवाजी जाती है
पर उसे याद है
वह औरत है
घर की धुरी है
पत्नी है
जननी है
इसी के इर्द-गिर्द उसका जीवन
उसका महत्व कोई समझे या न समझें
पर वह बखूबी समझती है
अपनी इच्छाओं की कुर्बानी देती है
उसके बिना सब तितर बितर
तब सबको सहेजना उसकी जिम्मेदारी
वह औरत जो है
उसी से परिवार
उसी से समाज
उसी से संसार

स्वाद भोजन का

स्वाद भोजन का
लेने का मजा भी
सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक
ताना बाना बुना जाता है
आज क्या बनाना है
एक दिन पहले से ही
सुबह उठते ही ताम झाम शुरू
मुंह का चलना शुरू
पेट का काम शुरू
इन पर कभी विराम नहीं
जो इनको बनाता है
वह है घर की गृहिणी
सारा इंतजाम उसका
कभी उसे भी तो विश्राम दे
कभी पेट को भी तो आराम दे
हर रोज की वही दिनचर्या से आजाद करें
हफ्ते में एक दिन उसके भी मन का ख्याल रखें
हर रोज वह बनाती है
उसके हाथ का स्वाद
कभी दूसरों के हाथों के स्वाद का मजा लेने दे
वह रोज भोजन परोसती है
कभी उसे भी तो कोई भोजन परोसे
घर में न सही
बाहर ही सही
मंहगे होटल में न सही
सस्ते में ही सही
तब देखें
उसकी मुस्कान
और अगले दिन भोजन का स्वाद भी दोगुना