यह पब्लिक है भाई
कब क्या करना है
कहाॅ करना है
कैसे करना है
अच्छी तरह जानती है
अगर कहीं दुर्घटना हो जाती है
तब तमाम लोग इकठ्ठे हो जाते हैं
जब पुलिस पूछ-ताछ करना शुरू करती है
सब खिसक लेते हैं
जलाना हो
पीटना हो
तब आ जाती है
जब सहायता के लिए कोई चिल्लाता है
तब नजरअंदाज करते हैं
जब कुछ अनहोनी हो जाती है
तब फिर उसके विरोध में खडे हो जाते हैं
धरना और प्रदर्शन शुरू हो जाता है
पुलिस का भी यही हाल
समय रहते चेतती नहीं
दौड़ाती है
शिकायत को टाल देती है
कभी मजाक बना डालती हैं
कोई किसी को आसानी से सहयोग नहीं करता
मददगार नहीं साबित होता
जब मामला तूल पकड़ता है
तब जागृत होते हैं
तब नौकरी पर बन आई होती है
फिर मीडिया का डर
ब्रेकिंग न्यूज़
नमक ,मिर्च और मसाला साथ में
ताकि चटखारे लेकर देख सके
आधी सच्चाई आधी मनगढ़ंत अफवाह
समय रहते ही ध्यान दिया जाए
तब बहुत सी अनहोनी से बच जाया जाएंगा
एक जिम्मेदार नागरिक
एक जिम्मेदार पुलिस
और जिम्मेदार मीडिया भी
अपनी जिम्मेदारी निभाए
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Thursday, 2 January 2020
नागरिक ,पुलिस और मीडिया की जिम्मेदारी
ठंडी और मंदी
ठंडी ठंडी
गजब की ठंडी
बना गई
सबको बंदी
सब दुबक रहे
शाल और रजाई में
सडकों पर पसरा सन्नाटा
एक तो कडाके की ठण्डी
ऊपर से मार मंदी की
जेब कैसे करे ढीली
हर चीज में करनी पड रही कमी
कटौती कटौती करते करते
जान पड गई सांसत में
ठंडी और मंदी
दोनों ने कर दिया जीना दुश्वार
अब तो हो गई हद
मन करता है
कब दोनों को भगाए
दोनों ने है अपना
अड्डा जमाया
प्रतीक्षारत में हैं
ऑखे लगी
कब भागे
ठंडी और मंदी
इसका खेल है अजब गजब
शब्दों का खेल है बडा गजब
इनकी ताकत तो है अपरम्पार
यह जब खेलते हैं
तब बडे बडो के छक्के छूट जाते हैं
जो इस खेल में माहिर हो गया
उसने मानों जग जीत लिया
यह होते हैं छोटे
पर इनकी चाल बडी लंबी
बरसों तक चलती है
हदय में घर कर जाती है
फेविकोल से भी मजबूत जोड़ है इसका
आसानी से नहीं निकलती
प्यार से लेकर युद्ध
सब करा सकती है
यह मृदु भी है कठोर भी
फूल से भी ज्यादा कोमल
चट्टान से भी ज्यादा कठोर
सारे संसार में इसने मायाजाल फैला रखा है
कभी-कभी भ्रमित करती है
कभी डराती है
कभी विश्वास दिलाती है
बाहर से लेकर अंतर्मन तक भ्रमण करती है
इसके जैसा बडा कलाकार कोई नहीं
इसका खेल है अजब गजब
मैं मनुष्य नहीं कुत्ता हूँ
मैं कुत्ता हूँ
बेजुबान हूँ
अच्छा है न
केवल भौकता हूँ
किसी को अपशब्द तो नहीं कहता
अपमानित तो नहीं करता
निंदा तो नहीं करता
शब्दों के व्यंगबाण तो नहीं चलाता
जब आप कहते हैं
यह कुत्ते की तरह भौकता है
तब मुझे दुख होता है
मैं आप जैसा बिल्कुल नहीं हूँ
मैं मनुष्य नहीं कुत्ता हूँ
मुझे कहा जाता है
मैं मालिक के पीछे दूम हिलाता है
सही है
मैं नमकहराम नहीं हूँ
स्वामीभक्त हूँ
मालिक के पीछे जान दे सकता हूँ
मनुष्य जैसा नहीं
खाए किसी का और गाए किसी का
अपनों की पीठ में ही पीछे से छुरा घोंपे
यह तो मैं नहीं करता
मैं मनुष्य नहीं कुत्ता हूँ
कहा जाता है
कि कुत्ते की दुम टेढ़ी ही रहती है
कुछ भी कर लो
सही है
मैं दलबदलू नहीं हूँ
जैसा हूँ उसी पर कायम हूँ
शेर की खाल में छुपा भेडिया नहीं हूँ
मैं मनुष्य नहीं कुत्ता हूँ
हर दम साथ निभाता हूँ
मरते दम तक
एक बार किसी का हो लिया
तब अंत तक उसका
सडकों से लेकर महलों तक में निवास
फिर भी घमंड का नामो-निशान नहीं
मैं मनुष्य नहीं कुत्ता हूँ
जमीन से जुड़ा हूं
पर स्वर्ग तक पहुंचा हूँ
धर्मराज युधिष्ठिर का सहचर हूँ
उनके साथ स्वर्ग के द्वार तक पहुंचा हूँ
तभी तो मैं अपने धर्म पर अडिग हूँ
धर्म और जाति के बंधनों से परे
स्वामिभक्ति ही धर्म मेरा
मैं मनुष्य नहीं कुत्ता हूँ .