Tuesday, 6 December 2016

मेरी काठी ,मेरी लाठी

मेरी काठी ,मेरी लाठी ,है सबसे प्यारी
हरदम साथ निभाती मेरा
सहारा देने को रहती तत्पर
गिरने- पडने से मुझे बचाती
मेरे साथ- साथ यह भी आराम फरमाती
मेरे उठते ही यह भी तैयार
सुबह से लेकर रात तक
अंधेरा हो या उजाला
गर्मी हो या ठंडी या फिर मुसलाधार बारीश
घर हो या बाहर
संग हमेशा रहती
लडखडाते कदमों का सहारा
उबडखाबड रास्ते या जीने की चढाई
इसके बिना तो सब मुश्किल
यह न रहती तो जीवन हो जाता दुश्वार
कौन सहारा देता ,किसका सहारा लेता
ऐसा संगी कहॉ से मिलता
है तो यह निर्जीव
पर चलती है मेरी साथी बन
स्वावलंबन का एहसास दिलाती
अपनेपन से मुझे संभालती
मेरी काठी ,मेरी लाठी ,सबसे न्यारी सबसे प्यारी

बगिया का फूल

बगिया में एक गुडहल का फूल खिला था
सूर्ख लाल रंग ,सबके आकर्षण का केन्द्र
ललचाई दृष्टि ,मन में तोडने की ईच्छा
अचानक वृद्ध माताजी का आगमन
देखा ,तोडा और ऑचल में रखा
दो- चार कली भी तोड ली
माली के कहने पर उत्तर
भगवान को चढाना है ,पूजा करना है
इन कलियों को पानी में रख दूंगी
खिल जाएगी सुबह तक
वह लाल फूल शायद किसी की दृष्टि से बच गया था
तभी वह आज अपने पूरे शबाब पर खिला था
कली को अगर खिलने ही न दिया जाय
तो उसका सौंदर्य कैसे रह पाएगा
ईश्वर की रचना को खिलने दिया जाय
महकने दिया जाय
तभी ईश्वर भी प्रसन्न होगे
चरणों में अर्पण की अपेक्षा डाल पर खिला रहने में ही ईश्वर की प्रसन्नता होगी

Saturday, 3 December 2016

जिंदगी की बस छूट न जाय

आज समय से केवल पॉच मिनट देरी से निकली
चाल तेज कर दी ,रास्ता क्रास करने की कोशिश की
तब तक सामने बस स्टॉप पर बस आ गई
मन मसोसकर रह गई
अब कम से कम दूसरी का आधा घंटा इंतजार करना पडेगा
यह पॉच मिनट की देरी भारी पड गई
अब यह लेट होता ही रहेगा
दफ्तर में लेट मार्क लगेगा
शायद बॉस की क्रोधी निगाह भी पड जाय
जीवन का भी यही दस्तूर है
कभी- कभी अवसर सामने होते हैं
पर हम उसको किसी कारण से खो बैठते हैं
बाद में पछताते रहते हैं
पता नहीं दूसरा मौका कब हमें मिले
समय को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए
जिंदगी अवसर तो हर एक को देती है
हॉ ,कोई अवसर को लपक कर पकड लेता है
तो कोई छोड देता है
छोडने वाला फिर इंतजार करता रहता है
दूसरे अवसर की तलाश में
"अब पछताएं का होत है जब चिडियॉ चुग गई खेत "

खतरों के खिलाडी


बस में बैठी थी अगली सीट पर
ट्रेफिक जाम था
बस धीरे- धीरे खिसक रही थी
कुछ आगे निकलने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे
बाइक स्कूटर सवार
यहॉ - वहॉ से अपना रास्ता निकाल आगे पहुँच रहे थे
कुछ गाडियॉ रफ्तार में तो कुछ धीमी
जीवन में जिसने भी रफ्तार पकडी
कैसे- वैसे प्रयत्न कर आगे बढा
सफलता तो निश्चित मिलनी है
हॉ, कभी- कभी ज्यादा रफ्तार से दुर्घटना हो सकती है
पर जो चल रहा है उसी ढर्रे पर धीरे- धीरे चले
  या रफ्तार पकड आगे बढे
यह तो स्वयं को तय करना है
जिसने भी लीक से हट कर काम किया
खतरों से खेलने की हिम्मत की
वही तो पहचाना गया
कबीर जी ने सही कहा है
     जिन खोजा तिन पाइया ,गहरे पानी पैठ
     मैं बपुरा बूडन डरा ,रहा किनारे बैठ