Tuesday, 17 September 2019

प्रधानमंत्री मोदीजी जन्मदिन मुबारक

भारत माँ का लाल है
उससे बढकर वफादार है
है हिन्द की शान
नहीं कोई इससे अंजान
तभी तो सबकी जबान पर एक ही नाम
मोदी मोदी मोदी

आया जबसे तबसे गया नजारा बदल
दोस्तों का दोस्त
दुश्मन से दुश्मनी भी जम कर
सब हो जाते इनके सामने निरूत्तर
हर बात का जोड तोड जवाब
प्रखर वक्ता और अभिव्यक्ति में माहिर
तभी तो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सब इसके इनके कायल
विश्व में परचम फहरा रहा
सोशल मीडिया पर सबसे आगे निकल रहा

कठिन चुनौती का डटकर सामना
कठोर निर्णय लेने में न हिचकिचाना
विश्व पटल पर भारत की शाख बढाना
धर्म और जाति को छोड़ विकास की राह पकड़ना
हर वक्त कार्यरत 
इनके जीवन में आराम को है विराम

संन्यासी सा जीवन
नहीं कोई लोभ लालच
योग का हिमायती
माँ जगदम्बा का भक्त
शुद्ध शाकाहारी
आहार और विहार में भी
सोमनाथ से माँ गंगा और बाबा विश्वनाथ की नगरी के
सफर का महानायक
एक साधारण कार्यकर्ता से प्रधानमंत्री तक का सफर
भारतवर्ष का  मान और सम्मान
यह सब सौपा है जनता ने
जनत जनार्दन का आशीर्वाद प्राप्त है
तभी तो सब एक स्वर में कह रहे हैं
मोदी है तो मुमकिन है
मोदी मोदी मोदी मोदी
यह नारा गूंजता रहे
आप भारत का विकास करते रहे
हर जन्मदिन एक खास हो
उसमें आपके साथ भारत का विकास भी शामिल हो
      बहुत बहुत मुबारक हो आपको प्रधानमंत्री जी
                   जन्मदिन
जनता का भरपूर प्यार बना रहे
उनके दिलों पर राज करते रहे
          यही शुभकामना तहे दिल से ।

अनाथाआश्रम हमारा प्यारा आश्रय

हम तो है अनाथ
वंचित और घरबार विहीन
कभी गरीबी ने मारा
कभी अपनों ने ठुकराया
कभी कुंवारी माँ की मजबूरी ने
कभी समाज के ठेकेदारों ने
कभी धार्मिक कट्टरता ने

आज हमें सहारा है
अनाथालय का
जिसने हमें अपनाया
पढाई लिखाई करवाई
हमें हमारी पहचान दिलवाई
जीने का और कुछ कर गुजरने का जज्बा पैदा किया
हमें सडक से उठाकर आश्रय दिया
सर पर छत दी
पेट को रोटी दी
हमें दर दर भटकने से बचाया

किसी ने हमें नाजायज समझ कचरे में फेंका
किसी ने उठाकर प्रेम से गले लगाया
रमेश को कचरे के ढेर में फेंका
किसी ने राबर्ट बना कर प्रेम से पाला
फिर बीच में लोग ले आते हैं धर्म की राजनीति

सबसे बडा धर्म तो इंसानियत का धर्म
जिसने हमारा पालन पोषण किया
हमें सडकों से उठा सर पर बिठाया
वही अनाथाआश्रम  हमारा प्यारा आश्रय

नारी सम्मान

*नारी सम्मान-*         
👏👏👏👏
जब रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले... तो काल आया और जैसे ही काल आया ... तो गीधराज जटायु ने मौत को ललकार कहा, -- "ख hबरदार ! ऐ मृत्यु ! आगे बढ़ने की कोशिश मत करना... मैं मृत्यु को स्वीकार तो करूँगा... लेकिन तू मुझे तब तक नहीं छू सकता... जब तक मैं सीता जी की सुधि प्रभु "श्रीराम" को नहीं सुना देता...!
      मौत उन्हें छू नहीं पा रही है... काँप रही है खड़ी हो कर... मौत तब तक खड़ी रही, काँपती रही... यही इच्छा मृत्यु का वरदान जटायु को मिला।
   किन्तु महाभारत के भीष्म पितामह छह महीने तक बाणों की शय्या पर लेट करके मौत का इंतजार करते रहे... आँखों में आँसू हैं ... रो रहे हैं... भगवान मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं...!
    कितना अलौकिक है यह दृश्य ... रामायण मे जटायु भगवान की गोद रूपी शय्या पर लेटे हैं... प्रभु "श्रीराम" रो रहे हैं और जटायु हँस रहे हैं... वहाँ महाभारत में भीष्म पितामह रो रहे हैं और भगवान "श्रीकृष्ण" हँस रहे हैं... भिन्नता प्रतीत हो रही है कि नहीं... ? अंत समय में जटायु को प्रभु "श्रीराम" की गोद की शय्या मिली...   लेकिन भीषण पितामह को मरते समय बाण की शय्या मिली....!
    जटायु अपने कर्म के बल पर अंत समय में भगवान की गोद रूपी शय्या में प्राण त्याग रहा है.... प्रभु "श्रीराम" की शरण में..... और बाणों पर लेटे लेटे भीष्म पितामह रो रहे हैं.... ऐसा अंतर क्यों?...    
     ऐसा अंतर इसलिए है कि भरे दरबार में भीष्म पितामह ने द्रौपदी की इज्जत को लुटते हुए देखा था... विरोध नहीं कर पाये थे ....! दुःशासन को ललकार देते... दुर्योधन को ललकार देते... लेकिन द्रौपदी रोती रही... बिलखती रही... चीखती रही... चिल्लाती रही... लेकिन भीष्म पितामह सिर झुकाये बैठे रहे... नारी की रक्षा नहीं कर पाये...!
     उसका परिणाम यह निकला कि इच्छा मृत्यु का वरदान पाने पर भी बाणों की शय्या मिली और .... जटायु ने नारी का सम्मान किया... अपने प्राणों की आहुति दे दी... तो मरते समय भगवान "श्रीराम" की गोद की शय्या मिली...!
       *जो दूसरों के साथ गलत होते देखकर भी आंखें मूंद लेते हैं ... उनकी गति भीष्म जैसी होती है ... जो अपना परिणाम जानते हुए भी... औरों के लिए संघर्ष करते है ... उसका माहात्म्य जटायु जैसा कीर्तिवान होता है... ।*
*प्रणाम*
🙏🏻🙏🏻
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Saturday, 14 September 2019

हिन्द की हिन्दी लगती बहुत प्यारी

हिन्द की हिन्दी
लगती बहुत प्यारी
जोडती है दिलों को
करती नहीं कोई भेदभाव
जो भी इसको अपनाता
उसकी ही हो जाती
तोड मरोड़ कर किसी भी लहजे में
वह ढल जाती
अंजानो के बीच रिश्ता कायम करती
जनसाधारण की भाषा है यह
हर आम आदमी परिचित इससे
नहीं कोई इससे अंजान
ज्यादा न सही थोडा ही सही
सब तक यह पहुंची जरूर
यह किसकी मजबूरी नहीं
स्वेच्छा से स्वीकृत है
जब कुछ न समझ आता
तब अपना दामन पकडा देती
सबका सहारा बनती
बातचीत का माध्यम बनती
सडक से लेकर महलों तक
सबमें इसका वास
है बहुत सरल
नहीं है इसमें कोई क्लिष्टता
लिपि इसकी देवनागरी
जो है सब पर भारी
यह है हिन्द की पहचान
हिंद की हिन्दी लगती बहुत प्यारी