पिता का आधार
नहीं कोई दूजा उस समान
माता माता सब करें
पेट का जुगाड़ पिता करें
दर दर भटके
दिन रात एक करें
तब जाकर घर खडा करें
मालिक की बातें सुने
समाज के उलाहने सुने
तब जाकर हमें बोलने लायक बनाएं
स्वयं अनपढ़ रहे
बच्चों को शिक्षित करें
स्वयं फटेहाल रहे
बच्चों के तन पर कपड़े धरें
ऊपर से कठोर दिखे
अंदर से प्रेम हिलोरे ले
स्वयं बेहाल रहें
सबको हर हाल में खुश रखें
पिता बिना परिवार अधूरा
उसकी छत्रछाया में आसमान समाया
नहीं किसी का हो एहसान
जब पिता का हो साथ
जो करता है
दिखाता नहीं
जिस पर हो हमारा पुर्ण अधिकार
जो हमारी मनुहार और जिद पूरी करें
एक उसका होना ही
दे देता हो निश्चिंतता का आभास
उसके रहते ले सकते सुकून की सांस
जब तक पिता तब तक नहीं जिम्मेदारी का एहसास
न बडप्पन का
पिता का आधार
नहीं कोई दूजा उस समान ।
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