कहने को तो वह मेरी सखी
मेरी जिगरी दोस्त
असलियत यह नहीं थी
बस साथ - साथ थे
उसको भी मेरी जरूरत मुझे भी उसकी जरूरत
अकेले तो रहा नहीं जा सकता
ऐसा भी नहीं था
मतभेद नहीं थे
हम एक - दूसरे का भला सोचे
उसको अच्छे अंक आ जाते तो ऊपर से तो खुशी दिखाती
अंदर मन कचोटता था
कहता था देखो उसको
मैं किस बात में उससे कम
कपड़े पहनती या और कुछ
मन में एक अजीब सी जलन
सोच रही हूँ
यह मेरे साथ ही या और किसी के साथ भी
वह भी कम नहीं थी
बात बात में टान्ट भी कस देती थी
दूसरों के सामने नीचा भी दिखा देती थी
फिर भी वह मेरे बिना नहीं रह पाती थी
जिस दिन मैं न आऊ वह उदास हो जाती थी
हम घंटों बातें करते
हंसते - बतियाते
सिनेमा देखने जाते
वह अपने मन की बात और मैं अपने मन की बात बताती
कोई अगर मेरे विरुद्ध बोलता तो लड पडती
अब तक यह समझ न पाई
वह सच में जिगरी दोस्त थी ???
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