मात्र यह शब्द नहीं पढ़ने वाला
यह तो है दिल में बसने वाला
जिस कोख से जाई
उसी की बन जाती एक दिन माई
मन से रिश्ता निभाती
जी - जान छिड़कती
कभी डांटती कभी समझाती
कभी हंसती कभी गले लगाती
मुख पर उदासी को तुरंत भाप लेती
क्या न करें वह कम
हर बात का ध्यान रखती
एक संरक्षिका जैसी
वह ईश्वर की नियामत होती है
लक्ष्मी, दुर्गा , सरस्वती का रुप होती है
घर की रौनक होती है
रोशन होता है उनसे घर - परिवार
बड़ी अनमोल हौती है
बेटियाँ सिर्फ बेटियां नहीं होती
दो अक्षर में सिमटी सारा जहां होती है