जो लाख आंधी - तूफानों में भी डटकर खड़ी रही
कभी हार नहीं मानी
मेहनत को उसने अपना भाग्य बनाया
हमेशा सबको देती रही
हर सुख - दुख में सबके साथ खड़ी रही
कभी उसके मुख से तेज आवाज भी नहीं सुनी
कभी अपने बच्चों पर हाथ भी नहीं उठाया
बच्चें ही उसकी पूंजी असली धन
वह ज्यादा पढ़ी - लिखी नहीं
तब भी ककहरा तो उसने ही सिखाया
शिक्षा को सर्वोपरि माना
बच्चों के लिए सपना ही नहीं देखा उन्हें साकार भी किया
वह देहात - गांव की थी
फिर भी कभी उसके मुख से एक फूहड़ शब्द या ताने नहीं सुने
न हमको कभी सिखाया
वह बाहर की दुनिया से अंजान रही
रसोई में ही उसकी दुनिया सिमटी रही
अन्नपूर्णा का साक्षात अवतार
कभी उसके दर से खाली पेट कोई नहीं गया
सबको देती रही उसके बदले शायद उसको कभी कुछ मिला नहीं
ईश्वर पर अपार आस्था
कुछ ऐसे अवसर भी आएं जीवन में
जहाँ उसे टूटना चाहिए था
बिखरना चाहिए था
वह तब भी वैसे ही अडिग रही
उसने अपनी बांहों पर भरोसा किया
जितना प्यार देना था दिया
वह पैसे से भले संपन्न नहीं थी मन से तो बहुत थी
गजब का साहस और हिम्मत
पूरे परिवार की धूरी
अपने दम पर परचम फहराने वाली
उस घरेलू और हिम्मती मां को मैंने देखा है
बेटी - बहन - बहू - भाभी - चाची - दादी - नानी - मामी - फुआ
हर रिश्ता क्या बखूबी निभाया
कभी किसी के मुख से मां के बारें में कुछ अनुचित सुना नहीं
दुश्मन को भी ऊंचा पीढ़ा देने की बात करना
अनगढ़ पत्थर को भी तराश कर रूप देना
नारी के सारे गुण
स्नेह - दया - प्रेम - त्याग- सौंदर्य की मूर्ति
सादा जीवन उच्च विचार धारण करने वाली
अपने आंसू को अस्र बनाने वाली
उस फौलादी मां को सलाम
एक चुप्पा सौ को हराए का सिद्धांत
हमें कभी-कभार कोफ्त होता था
पर यह उसका अपना जीने का अंदाज
कभी न किसी के सामने हाथ फैलाया न मांग की
समय फिर भी बड़ा बलवान है
उम्र के आखिरी कगार पर है
देख कर दुख होता है
मां का बुढ़ापा
सहन नहीं होता है
उसे उसके उसी फौलादी रुप में देखने की आदत जो है
मैं तुम्हें क्या दूंगी
जो कुछ भी हूँ वह तो तुम्हारें ही कारण हूँ
तुम्हारा अंश हूँ
कुछ प्रतिशत भी वैसे हो जाए तो खुशनसीबी हमारी
तुम्हारें बारे में कुछ कहना या लिखना
सूर्य को दीया दिखाना हुआ
बहुत दिया तुमने
बहुत बांटा प्रेम और अपनापन
अब तो ईश्वर तुम्हारी भक्त तुम पर ही निर्भर
बहुत कुछ विस्मरण होने लगा है
भूलने लगी है
शायद यह अच्छा भी है
दुखद स्मृतियां जुड़ी है
बस अपने बच्चों को मत भूलना
हमेशा सुबह चार बजे भोर में प्रार्थना करती रहती थी
वह क्रम कभी न टूटे
क्योंकि तुम कहती थी ना
मेरे बच्चों को कोई प्रेम दे या न दें
मैं कोई कमी नहीं होने दूंगी
फर्श से लेकर अर्श तक खड़ा करने वाली माता
तुम्हें शत शत प्रणाम
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