Tuesday, 1 February 2022

आंगन का पौधा

मैं किसी के आँगन का पौधा हूँ 
अपनी हद में रहना जानता हूँ 
बडे नाजो से लगाया
समय - समय पर खाद - पानी देते रहें 
मेरी अच्छी तरह से देखभाल की
गरमी , बरखा और ठंड में ध्यान रखा
जब - जब जरूरत  पडी
मुझे काटा - छाटा 
मुझे आकार दिया
कभी धूप में तो कभी छाया में रखा
आज मैं  जब बडा हो गया हूँ 
फल - फूल रहा हूँ 
तब वे भी बडे गुरूर से देखते हैं 
देख देख मुस्कराते हैं 
मन ही मन खुश होते हैं 
मैं उनको जानता हूँ 
उनके मन की बात समझता हूँ 
आखिर उनकी ही देख रेख में  पला - बढा
अगर वे नहीं होते तब
पता नहीं  किस चिडिया के पेट में जाता
किस पशु का चारा बनता
किसकी कुल्हाडी चलती
हर तरफ से सुरक्षा की
मुझे अपने आंगन में जगह दी
यह तो उनका एहसान है
इसका मुझे भी एहसास है
उनका यह कर्ज चुकाना तो संभव नहीं 
हाँ अपनी छाँव देकर जरूर थोडा सुकून दे सकता हूँ 
अपने फल - फूल से उनकी मदद करू
उनके चेहरे पर थोड़ा सा सुकून देखूं 
यही चाहता हूँ 

ऐ मन तू क्यों घबराएं

ऐ मन तू 
क्यों घबराएं 
जो यहाँ तक लाया है
आगे भी ले जाएंगा
तूने क्या सोचा 
होता रहा क्या
फिर भी जो हुआ 
उसमें भी उसका ही एहसान 
कितनों को तो वह भी नहीं 
हर मुश्किल घडी में साथ रहा
बुरा समय भी निकलता रहा
यह भी वक्त गुजर जाएंगा
किसी का सोचा हुआ 
न हुआ है न होगा
कौन जाने 
आगे जीवन में क्या लिखा है
यह भी तो लिखने वाला ही जानता है
पल भर में क्या से क्या हो जाता है
यह जीवन है
इसकी डोर भी विधाता के हाथ में 
विधि के विधान पर भरोसा रख
जो यहाँ तक लाया है
आगे भी ले जाएंगा 

खुदा बचाये ऐसे मेहमानों से

वे मेरे घर आए
मेहमान बनकर
हमने भी खूब मेहमान नवाजी की 
मेजबान बनकर
खातिरदारी में कोई कसर न छोड़ी 
जो हमको नसीब नहीं था
वह भी उपलब्ध कराया
अच्छे बिस्तर , अच्छा खाना
सब उपलब्ध कराया
पास नहीं था 
तो उधार लेकर काम चलाया
जाते समय भी उनको कपडे - लत्ते दिए
कोई कसर न छोड़ी 
वह आए तो थे घूमने 
हमारा घर उन्हें सरायघर लगा
बिना खर्च किए आराम से
कोई बात नहीं 
आज वे हमारे मेहमान 
तो कभी हम भी उनके मेहमान 
जाते - जाते वे हमारे घर का बारीकी से निरीक्षण कर गए 
हमारे घर की तमाम बातें चटखारे ले लेकर सुनाया
न्यूज रिपोर्टर का काम कर गए
हम तो उनको अपना समझे थे
वे तो दगाबाज  निकल गये 

कुल्हड़ सी जिंदगी

खाली कुल्हड़ सी लगती है 
अब तो यह जिंदगी 
कभी थी भरी - भरी
उफान मारती 
गरम गरम 
मसालेदार 
खुशबूदार 
सौंधी सौंधी महक 
धीरे - धीरे सब खाली होता गया
अब तो बच गई है
नीचे तली में  
कुछ ठंडी सी
जिसे पीने का मन नहीं करता 
अब यह भी फेंक दी जाएंगी
कुल्हड़ समेत
वह कचरे के ढेर में 
या फिर टूट कर कोने में