Thursday, 30 June 2022

तेरे - मेरे का खेल

यह मेरी है
यह तेरी है
तेरी - मेरी का यह खेल
कब तक चलेगा
कभी तो इस खेल का अंत तो होना ही था
वह हुआ भी
परिणाम भी सबको पता ही था
आश्चर्य की बात तो नहीं 
एक बात जो सालती है
वह कहती है
ऐसा तो नहीं होना चाहिए था 

यही तो बात है

आज शहर की हवा कुछ गर्म है 
मन में सर्द की लहर है 
ऑखों में ऑसू मुख पर मुस्कान है 
न जाने क्या बात है
खुश हो या गम मनाए
यह समझ के बाहर है
कुछ तो ऐसी बात है
जो मन के विरुद्ध है
क्या करें क्या न करें 
यह निर्णय तो मुश्किल है
किस ओर जाए किस ओर नहीं 
मन तो गुमराह है
जब बात हो ऐसी
चित भी अपनी पट भी अपनी
यही तो असली बात है ।

Wednesday, 29 June 2022

यही तो राजनीति है

बंदरबाट का खेल जारी है
कभी इस डाली पर 
कभी उस डाली पर
उछलकूद में मस्त है
उस पेड पर क्या रसीले  और बडे - बडे आम
यहाँ पर रहने से क्या फायदा 
यहाँ का तो हम सब खाकर और चूस कर फेंक चुके हैं 
अब इससे मोहमाया छोडो 
उस पर चलो 
चुपचाप चलो 
नहीं तो भावना में बह जाओगे
उस तरफ नजर भी मत डालना
इस पर रहकर बहुत खा लिए
मजा कर लिए 
मोटे मोटे और तंदुरुस्त हो गए
जब आए थे तब पिद्दी से थे
अब वहां किया जाएंगा 
यहाँ पर अब छोटी छोटी चिडिया को बैठने दो
सब एक साथ कूदेगे और चढेगे 
कोई पीछे न रह पाएं 
यह ख्याल रखना
सब एकजुट रहना
तभी अपना वर्चस्व रहेंगा
किसी को भी बीच में आने मत देना 
इंसानो से कुछ सीखो
तुम तो उनके पूर्वज हो
तुम चाहो तो किसी को भी उजाड़ सकते  हो
जिस पेड़ पर बैठे हो
उस पेड़  का फल खाकर उसकी डाली तोड़  सकते हो
जरा राजनीति के दांव पेंच करों 
आगे क्या कहना क्या सुनना 
तुम तो माहिर खिलाड़ी हो 

बारिश तो सबको भायी है

बारिश तो वही है
झम झमा  झम वाली
कभी इसी बारिश में भीगने के लिए दिल मचलता था
सर पर छतरी तो दिखावा मात्र 
सर से पैर तक पूरा भीगने हुए
सहेलियों संग समुंदर किनारे 
बारिश में अठखेलियां करती लहरें 
उफान मारती और फिर लौट जाती
घंटों किनारे खडे या बैठे मंत्र मुग्ध निहारते 
वह समय था युवावस्था का
काॅलेज के दिनों का

आज भी बारिश तो वैसे ही है
हम अवश्य बदले हैं 
अब भीगने का मन नहीं करता
बारिश में कीचड़ और गंदे पानी में उतरने का मन नहीं करता
काम बढ जाएंगा
तबियत खराब हो जाएंगी 
जल भराव हो जाएंगा
इससे तो भले अपने घर में 
खिड़की पर बैठ कर चाय की चुस्कियां लेते हुए 

फर्क है न 
बचपन की मासूमियत में 
जहाँ कीचड़ में थप थप करते थे
युवावस्था में जहाँ घंटों भीगते थे
बिना बेपरवाह होकर
अधेडावस्था में जहाँ 
कार्यालय से घर पहुँचने की भागम-भाग 
ट्रेन और बस पकडने की जद्दोजहद 
अब आया वृद्धावस्था
जहाँ घर से ही बारिश का आनंद 

जीवन का पडाव 
कोई भी हो
बरसात की तो बात ही निराली है
यह हमेशा सबको भायी है
इसलिए तो यह सब पर भारी है ।