वह भी एक नहीं तीन - तीन
मां - पिता और युवा
मोबाइल न दे पाए अपनी युवा औलाद को
वह पहाड़ी पर चढ़ गया जान देने
मनाने की कोशिश हुई नहीं माना
आखिर में सबकी जान चली गई
आज लोगों की जान मोबाइल में टिकी है
बचपन से हाथ में मोबाइल
यह ऐसा खिलौना है जो जिंदगी लील रहा है
एक जमाना था
जब बच्चें अपने पालक की परिस्थिति को समझते थे
कुछ भी नहीं मांगते थे
हर बात की जिद नहीं करते थे
हमने ब्लेक - व्हाइट टेलीविजन के लिए दूसरों के घर जाते थे
दुत्कारना जाते थे
भगाए जाते थे
हंसते हुए बाहर आ जाते थे
कभी मांग नहीं की
यहाँ तक कि पढ़ने के लिए पुस्तक की भी मांग नहीं की
लाइब्रेरी से किताब लेकर नोट्स बनाए कर पढ़ते थे
प्रेमचंद की ईदगाह कहानी में इसका बखूबी चित्रण है
हामिद को मिठाई के लिए दादी पैसे देती है
तो वह चिमटा लेकर आता है ताकि दादी के हाथ रोटी बनाते हुए नहीं जले
उसका भी बालमन मचलाता है
मिठाई और खिलौने के लिए
बेटी होने के कारण बेटियां सब दुख सह लेती थी पर जाहिर नहीं करती थी
बेटा अपने आंसू छिपा लेता था ताकि मां की आँखों में आंसू न आए
शिक्षक से मार खा लेते थे पर घर पर नहीं बोलते थे
पड़ोसी भी डांट लगा देते थे
दो कपड़ों में पूरा वर्ष निकाल देते थे
घर के पकवान वो भी त्योहार में खाकर मस्त रहते थे
आज जरूरतें बढ़ गई है
हर बच्चें को मोबाइल और बाइक चाहिए
उसको भराने के लिए भी पैसा चाहिए
आमदनी है नहीं न काम करना है
माता - पिता सामर्थ्य वान न हो तब
पढ़े - लिखे और अपनी कमाई से अपने शौक पूरे
यह युवाओं को समझना होगा
इतना अमूल्य जीवन यू ही गंवाना
मजबूर न करें अपने पालक को
परिस्थिति को समझे
छोटी - छोटी बात पर जान देना लगता है फैशन हो गया है
आए दिन ऐसी घटनाएं हो रही है
क्षुद्र कारणों से जान देना
जीना सीखिए
प्यार में धोखा
मोबाइल, मोटरसाइकिल, इन सब के लिए जान देना
जिंदा रहेंगे तभी तो मोबाइल चलाएंगे
दूसरों की कहानियां देखने की अपेक्षा अपनी कहानी खुद लिखे
अपने जीवन की
मां - बाप के सपनों को
अपने सपनों को साकार करें
जान मत दें
जान है तो जहान है
आप तो चले जाएंगे
अपने पीछे जो प्रियजन है उनको जीते - जी मार जाओगे
मत करो ऐसा
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