Sunday, 13 November 2016

मेरे अच्छे दिन आ गए

मॉ को यह कहकर छोड आया था बेटा
कुछ दिन की बात है यही रह लो
बाद  में मैं ले जाऊँगा
यह घर छोटा पड रहा है
बच्चों की पढाई पर असर पड रहा है
बडा घर लेनेवाला हूँ
तब तुमको ले जाऊंगा
मॉ ,बेटे की परेशानी समझ गई
आशिर्वाद भी दिया
और बेटा छोड आया वृद्धाश्रम में
वहॉ उसके जैसे ही लोग ,हालात के मारे
पर मॉ गलतफहमी में थी
उसका बेटा ऐसा नहीं है ,वह उसे जरूर ले जाएंगा
लोग हँसते ,व्यंग करते
बुढापे में सठियॉ गई है बुढियॉ
पर मॉ को तो विश्वास था
रोज राह देखती
दिन ,सप्ताह ,साल गुजरते गए
बूढी ऑखें पथराने लगी पर आशा नहीं छोडी
मॉ जो थी बेटे पर अविश्वास कैसे कर सकती थी
पर मन में शंका भी उठने लगी
क्या सचमुच मेरा लल्ला ऐसा कर सकता है
आज अचानक बेटा आते दिखा
मॉ की खुशी का ठिकाना नहीं
अपना सामान समेटने लगी
मॉ ,घर चलो ,मैं तुम्हें लेने आया हूँ
मॉ चल पडी बेटे के संग
आने पर बेटे ने मॉ के नाम पर बैंक में पैसा भी डाला
वह भी हजार दो हजार नहीं ,लाखों रूपये
मॉ खुश ,ऐसा बेटा कहॉ मिलेेगा???
पर बेटा तो कुछ और ही सोच रहा था
और कितना पैसा डाल सकता हूँ
टेक्स बचा सकता हूँ
इससे विपरीत मॉ सोच रही थी
मेरे अच्छे दिन आ गए

कब यह भीड खत्म होगी ?????

घर में खिडकी पर बैठी सोच रही
क्या करूँ ,कहॉ जाऊ, जहॉ से नोट आसानी से बदल लाऊ
टेलीविजन पर ही भीड देखकर छूट गई हिम्मत
फिर भी मन न माना
ऐसे हाथ पर हाथ धरे रहने से तो कुछ नहीं होगा
रोजमर्रा की जरूरते कैसे पूरी होगी
पैसे तो चाहिए ही
अब तो पॉच- सौ और हजार के नोट नहीं चलनेवाले
पहले तो पॉच- सौ लेकर जाओ और सामान लेकर आओ कुछ बचे रूपये  के साथ
पर आज यह बेकार हो गया है
छोटा रूपया बडा हो गया
पर वह तो है नहीं पास में
किसी तरह हिम्मत जुटाकर निकली
बैंक पर दूर से ही दृष्टि पडी
दूर तक लंबी कतारे
हर कोई बेहाल ,परेशान
इसमें मेरा नंबर कब आएगा???
चलो दूसरी जगह चले
वहॉ भी वही हाल
मन मसोस कर घर वापस लौटी
कुछ खरिदना नहीं है
जो पास में है ,उसी में गुजारा करना है
लगता है अपने ही घर में कैद हो गई हूँ
बाहर निकले भी तो क्या करे???
पैसा तो हैं नहीं पास में
हॉ ,बनिया राशन और केमिस्ट दवाई उधार पर देने को तैयार
पर छुट्टा नहीं
खैर कोई बात नहीं
हर चीज का मूल्य तो चुकाना ही पडता है
भ्रष्टाचार खत्म करना है
काले धन को बाहर निकालना है
तो यह सब भी स्वीकारना होगा
और यह कीमत तो आम आदमी चुका रहा है
अमीर तो काला को पीला कर रहा है
गंगा जी में  बहा रहा है
पर आम आदमी तो भोजन को तरस रहा है
कैसे जुटाएगा ,कैसे यात्रा करेगा
यह समझ से बाहर है
वह प्रतीक्षा कर रहा है
कब यह भीड खत्म हो और जीवन सामान्य हो

Saturday, 12 November 2016

बेटी बन कर आई तू अपने ही घर

नोन - मिर्च और लौंग का धार उतारू मैं तुझ पर
नजर न लगे और ऑच न आए तुझ पर
क्यों हुई बावरी
यह घर नहीं पराया है तेरा अपना
महावर से रंगा पैर पडा घर में
घर हो गया खुशहाल
हल्दी का पीला रंग  भर रहा उजास
सोने से लकदक हो रहा सब जगमग
क्यों भय है इन ऑखों में
यहॉ सब तो है तेरे अपने ही
मत संकोच कर मुझसे
मैं भी हूँ बेटी की मॉ
अपना घर छोड मैं भी कभी आई थी इस घर
इसी घर की बन रही
यही मेरी छत्रछाया बना
मान- सम्मान और प्यार मिला
आज यह घर फिर बुला रहा है प्रेम से तुझे
तेरे दर्शन को आतुर है
तू इस घर की लक्षमी है
और यह तेरा असली रैन- बसेरा है
मत घबरा संसार की यही रीत है
बेटी को एक नहीं दो घर की बेटी बनना है
दोनों फर्ज निभाना है
ससुराल को भी अपना ही घर समझना है

Friday, 11 November 2016

आम आदमी परेशान ,कुछ तो करो सरकार

आम आदमी परेशान , कुछ तो करो सरकार
काला धन की भरमार ,सरकार हुई लाचार
करना पडा बडा फैसला
काले धन पर कसने लगाम
बंद करने पडे नोट पॉच सौ - हजार
पर जनता भी तो है मजबूर
कहॉ से सब्जी- दूध खरिदे
बस- ऑटों का किराया कहॉ से लाए
रोज कमाना- रोज खाना ,वह क्या करे बेचारा
मिल भी रहा तो दो- चार हजार
इस मंहगाई में कैसे हो गुजारा
मौके है शादी- ब्याह के
बेटी के बाप का तो होश गए उड
कुछ ने तो बैंक का दर्शन भी न किया होगा
आज वह भी खडा कतार में
गृहणियों की बचत भी कर रही बवाल
आज छुपा रूपया का कहॉ करे इस्तेमाल
बैंक और ए टी एम के बाहर बढ रही भीड
और नोट हो रहे खत्म
मुँह लटका कर वापस लौट रहे
दूसरे दिन सुबह फिर आने के लिए
क्या करे काम करे या कतार में खडे हो
रूपया तो चाहिए ही
कतार में अमीर नहीं आम आदमी खडा है
गरिब को तो समझ नहीं आ रहा
उसको तो कोई उधार भी नहीं देगा
फिर उसके घर में चूल्हा कैसे जलेगा
यह अमीर को तो जोर का झटका है
पर गरिब को तो बेहाल कर रहा
काला धन बहाया जा रहा है ,फेका जा रहा है
उनका तो हाल हो रहा खराब
अलग- अलग तरकिबें की जा रही ईजाद
पर नहीं चल पा रहा उपाय
भर लिए अनाज दूकान से
रातोरात सोना खरिद लिया
डॉक्टरों से दवाई का स्टाक खरिद लिया दो- चार महिने का
पर फिर भी पैसा पडा है भरमार
वह तो आराम से हल ढूढेगे
पर आम आदमी की तो बढ गई दिक्कत
बाजार हो गए है वीरान
नहीं कोई है खरिदार
क्योंकि दूकाने गरिबों से होती है गुलजार
अमीर तो मॉल और एमाजोन से खरिदेगा सामान
उबर और ओला हो जाएगे बुक
उसको क्या दिक्कत
दिक्कत तो है आम आदमी को
क्या बुजुर्ग ,क्या युवा ,क्या महिला
सब है कतार में
कोई फार्म भर रहा ,कोई दूसरों से भरवा रहा
कतार में तो वही है आम आदमी
खास तो आराम से बैठे इसका तोड निकाल रहे होगे