Friday, 15 December 2017

याद आया वह पल

बात बचपन की है जब मैं विद्यालय के मैदान में हिरणी जैसी कुलांचे भरती थी
सारा ध्यान यहॉ - वहॉ
शिक्षिका के टोकने पर कि कहॉ पर खोई है
मन कहॉ की उडान भर रहा है
तब नहीं जानती थी कि किसी दिन मैं आसमान की उडान भरूंगी
वह जमाना और था तब जब यह क्षेत्र केवल पुरूषों का
ऐसे समय में जब लडकियॉ घर से बाहर निकलती नहीं थी तब मैं जमीन से ऊपर उठ आसमान में उडान भर रही थी
देश की पहली महिला पायलट बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ
आसमान में उडान भरते हुए और इतनी ऊंची उठने के बाद भी बचपन की याद नहीं भूली
जिसने इतना कुछ दिया
जीवन की  नींव भी यही पडी
विधालय में आने का सौभाग्य मिला तब बचपन जाग उठा
आसमान में उडान भर एकाग्रचित्त होना
यहॉ आकर स्वच्छंद हो गई
जी भर कर और मन खोलकर विचरण किया
यह अवसर को हाथ से जाने देना नहीं चाहती थी
बहुत बडे - बडे जगह पर भले जाना हुआ
पर अपनापन तो यही आकर लगा
मेरा बचपन जो वापस जीवित हो गया था

पैसा बोलता है

पैसा बोलता है
बोलता क्या चलता भी है
क्यों पैसे में यह कौन - सी बात है
सब उसके पीछे दिवाने
कितना भी ज्ञान हो पर पैसा न हो तो.
क्या उसका फायदा
कौन आपको पूछता है
ज्ञान - वान सब धरा रह जाता है
अच्छे ब्रांडेड कपडे , मंहगी गाडी
फ्लेट , मंहगे फर्नीचर , यहॉ तक कि रंगरोगन भी
जरा घर बुलाकर देखो तो - यह विज्ञापन खूब चल रहा
आप किसी की गाडी को ठोक दें
अगर आप के पास पैसा - रूतबा है तो कोई बात नहीं
पर अगर आप साधारण टेक्सी वाले है
तब तो गाली - गलौज क्या लात- घूसे भी पडेगे
यहॉ व्यवहार भी व्यक्ति को देखकर होता है
आप संपन्न है तो प्रभावशाली भी होगे
हर चीज आप खरिद सकते हैं
सम्मान की तो बात ही क्या ???
वह भी मोल मिलता है
दुनिया उसके इर्दगिर्द घूमती है
सच ही है
बाप बोले न भैया , सबसे बडा रूपैया

पेट है सबसे भारी

भूख लगी थी , मन व्याकुल था
आज भोजन नहीं ला पाई
सोचा बाहर से मंगा लूगी
कोई मिला ही नहीं कि वह जा बाहर से ले आए
सब काम में व्यस्त थे
अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था
सब अपना डब्बा खोल कर खा रहे थे
शिष्टाचारवश लोगों ने पूछा
पर मेरा मन नहीं किया
पेट में भूख कुलबुला रही थी
दो - तीन बार पानी भी पी लिया
पर भूख तो भूख ही होती है
मन ललचाता रहा पर नियंत्रण कर बैठी रही
आखिर छुट्टी हुई
बाहर का ठेला जिसे देख नाक - भौं सिकोडती थी
ठेले पर का खाना तो कभी नहीं
न जाने कितनी गंदगी आसपास बिखरी रहती है
बर्तन भी बराबर धोए नहीं रहता है
उसी बालटी के पानी में डुबोकर निकालता है
बीमारी का घर बना कर बैठा है
आज कुछ नहीं देखा
क्या चाहिए मैडम
पूछने पर कहा
जो भी हो अच्छा वो दे दो
हमारे यहॉ का तो सब टेस्टी और मजेदार है
रगडा - पेटीस खाइए , मजा आ जाएगा
उस दिन का वह रगडा - पेटीज जो चटखारे ले खाया
सारे स्वाद फीके पड गए
अब समझ में आ गया था
भूख क्या होती है
पापी पेट का सवाल और भूखे भजन न होय गोपाला
सुना था पर आज अनुभव भी कर लिया था
पैसे होते हुए भी खाना नहीं मिला
भोजन का स्वाद समय देख कर होता है
भूख काल , स्थान कुछ नहीं देखती

Thursday, 14 December 2017

ईश्वर हैं ना

लॉन में बैठी हुई थी
ठंडी हवा चल रही थी
सूर्यदेव का आगमन हो रहा था
सुनहली धूप पसर रही थी
दृष्टि गई एक ऊँचे पेड पर
तन कर खडा था
उससे ऊपर देखा तो गगनचुंबी ईमारतें
पर आसमान का तो कोई सानी नहीं
वह तो सबसे ऊपर , उससे भी ऊपर ग्रह
धरती के भुगर्भ में न जाने क्या - क्या बन रहा
पर उसकी गहराई न जाने कितनी??
हम तो बीच में है
सारे जीवों का तथा सृष्टि कर्ता की रचना
उसकी चित्रकारी तथा समयनियोजन
दाद देनी पडेगी
हम तो केवल निहारते हैं , नष्ट करते हैं
इतनी समृद्ध धरती
इतना विशाल आसमान
इन सबके साथ हमारा ईश्वर
विश्वास रखिए
उसकी कृपा पर , उसके निर्णय पर
कभी संदेह नहीं
जग कर्ता आपके लिए जो भी करेगा
वह आपकी भलाई के लिए ही होगा