Tuesday, 31 May 2022

आई ऑधी आई शुभ संदेश लाई

धूल उडाती आई आंधी
सब लगे भागने इधर - उधर
कोई घर की ओर तो कोई और ठिकान
पंछी लगे छुपने अपने घोसलो में 
पेड़ लगे हिलने जोर - जोर से 
पत्तियां झरने लगी
डालिया टूटने लगी 
सब लोग डरे - घबराएं 
कहीं न कहीं दुबके हुए 
हर जीव है परेशान

कुछ देर में ही होने लगी 
झम झमा झम  बरसात 
यह तो बारिश आने की सूचना 
धरती भी हो गई ठंडी 
सब जीव भी होने लगे प्रसन्न 
लगा मयूर नृत्य करने
किसान की फसलों ने भी ली अंगडाई 
सब जगह हुआ पानी - पानी
सबके मुख पर आई आंनदी हंसी
सब भूल गए ऑधी को
उसके घरघराते थपेडों को

यह तो होता है हर साल
हर बार , बार - बार
ऑधी भी आती है 
अपने लाम लश्कर के साथ
फिर बारिश होती है
यह तो चक्र है
प्रकृति का
जीवन का
पृथ्वी के हर जीव का
हर निवासी का
हर कण-कण का 
मौसम ने ली अंगडाई 
आई ऑधी आई
शुभ संदेश लाई



कभी कुछ कहीं कुछ

मैंने स्वयं को अब तक नहीं जाना
क्या हूँ कौन हूँ  कैसी हूँ 
दशकों गुजर गए
अभी भी मैं उलझन में ही हूँ 
अपने को पहचान नहीं पाई
कोई कुछ कहता है कोई कुछ 
असल में मेरा स्वभाव कैसा है
मेरी फितरत कैसी है
कहीं मैं डरपोक तो कहीं निडर
कहीं दयालु तो कहीं कठोर
कहीं दब्बू तो कहीं दबंग
कहीं मैं खुशमिजाज तो कहीं दुखी
कभी ऑखों में पानी कभी होठों पर खुशी
किस बात पर प्रसन्न किस बात पर रुष्ट 
कभी मीठी आवाज तो कभी कर्कश
कहीं कुछ तो कहीं कुछ 
कभी कुछ तो कभी कुछ 
यह क्या दोहरा चरित्र है
दोहरा व्यक्तित्व है
शायद समझने का फेर है
हर जगह भूमिका अलग
हर जगह परिस्थिति अलग 
उनके बीच में यह मन
कभी कौन सी करवट लेता है
यह समझ नहीं आया
कहती कुछ करती कुछ 
करने जाती कुछ होता कुछ 
इसी दो राहें पर चलती जिंदगी 
कब एक निश्चित ठिकाना पर होगी
शायद यह कहना मुश्किल होगा ।


घर और मन

घर और मन
दोनों अपने
किसको बिठाना है
किसको अलविदा कहना है
यह भी हम पर
हाँ कभी - कभार अनचाहे मेहमान आ जाते हैं 
कुछ वक्त के लिए हम परेशान तो हो जाते हैं 
उनके जाने के बाद हम सुकून की सांस लेते हैं 

यह हमारा
पूर्ण अधिकार हमारा
हमारी इच्छा 
हमारे सपने
हमारी आशा - आंकाक्षा
सुख - दुख हमारा
खुशी हमारी
रूदन हमारा
पल - पल के साक्षी 

इस पर और किसी को शासन न करने दे 
किसी को भी जबरदस्ती घुसने न दे
किसी को भी अपना निर्णय स्वयं पर थोपने न दे
भावनाओं के साथ न खेलने दे
स्वतंत्र विचरण करें 
घर में और मन में 
अगर यहाँ आपने अपना अधिकार छोड़ दिया
तब तो आप गुलाम से कम नहीं 

Monday, 30 May 2022

तू मेरा सर्वस्व

तू मेरी जान
मुझसे क्यों इतना नाराज
तुझ पर तो मुझे है नाज 
तू मेरा अभिमान 
तुझ बिन मेरा जीवन सूना
तेरी आहट सुन मेरा  मन हो जाता प्रसन्न
तू तो है मेरा शान 
तेरे बिन सब सूना
तेरे बिना मेरा जीवन भी अधूरा
मेरी हर सांस में तू ही तू
हर आस है तू
तुझसे ही जीवन है गुलजार
तू नहीं तो कुछ नहीं 
कुछ भी नहीं 
न जाने यह क्या हुआ
दोष किसका ??
परिस्थिति का या किसी और का
ना पवन की ना सुमन की 
किसकी है यह भूल
यह समझ पाना भी है मुश्किल 
तेरी मुस्कान में तो बसे मेरे प्राण 
अब तो मान जा मेरी जान