Wednesday, 29 November 2023

मैं पुरूष हूँ

मैं पुरूष हूँ
यह बात तो सौ प्रतिशत सत्य
पर मैं और कुछ भी हूँ
एक पुत्र हूँ
एक भाई हूँ
एक पति हूँ
एक पिता हूँ
और न जाने क्या - क्या हूँ
मेरे पास भी दिल है
मैं कठोर पाषाण नहीं
जो टूट नहीं सकता
मैं बार बार टूटता हूँ
बिखरता हूँ
संभलता हूँ
गिरकर फिर उठ खडा होता हूँ
सारी दुनिया की जलालत सहता हूँ
बाॅस की बातें सुनता हूँ
ट्रेन के धक्के खाता हूँ
सुबह से रात तक पीसता रहता हूँ
तब जाकर रोटी का इंतजाम कर पाता हूँ
घर को घर बना पाता हूँ
किसी की ऑखों में ऑसू न आए
इसलिए अपने ऑसू छिपा लेता हूँ
सबके चेहरे पर मुस्कान आए
इसलिए अपनी पीड़ा छुपा लेता हूँ
पल पल टूटता हूँ
पर एहसास नहीं होने देता
मैं ही श्रवण कुमार हूँ
जो अंधे माता पिता को तीर्थयात्रा कराने निकला था
मैं ही राजा दशरथ हूँ
जो पुत्र का विरह नहीं सह सकता
जान दे देता हूँ
माँ ही नहीं पिता भी पुत्र को उतना ही प्यार करता है
मैं राम भी हूँ
जो पत्नी के लिए वन वन भटक रहे थे
पूछ रहे थे पेड और लताओ से
तुम देखी सीता मृगनयनी
मैं रावण भी हूँ 
जो बहन शूपर्णखा के अपमान का बदला लेने के लिए साक्षात नारायण से बैर कर बैठा
मैं कंडव  त्रृषि हूँ जो शकुंतला के लिए गहस्थ बन गया
उसको बिदा करते समय फूट फूट कर रोया था
मेनका छोड़ गई 
मैं माॅ और पिता बन गया
मैं सखा हूँ 
जिसने अपनी सखी की भरे दरबार में चीर देकर लाज बचाई
मैं एक जीता जागता इंसान हूँ
जिसका दिल भी प्रेम के हिलोरे मारता है
द्रवित होता है
पिघलता है
मैं पाषाण नहीं पुरुष हूँ

मैं किसान हूँ

किसान हूँ
किसी का दिया नहीं खाता हूँ
परिश्रम करता हूँ
खेतों में हल और ट्रेक्टर चलाता हूँ
धूप में पसीना बहाता हूँ
ठंडी और गर्मी के थपेडे  सहता हूँ
बारिश के अंधड - तूफान का सामना करता हूँ
प्रकृति के प्रकोप सहता हूँ
बंजर मिट्टी को उपजाऊ बनाता हूँ

मैं अन्नदाता हूँ
अन्न उगाता हूँ
पूरे संसार का पेट भरता हूँ
मैं किसी की दया नहीं
अपना हक चाहता हूँ
मुझे उचित मूल्य मिले मेरी फसल का
उचित मुआवजा मिले

मैं कोई सरकार का नौकर नहीं
वेतन और बोनस नहीं लेता हूँ
मेहनत मैं करता हूँ
लाभ दूसरे उठाते हैं
मुझसे टमाटर दो रूपये किलो 
बाजार में चालीस रूपये
सब दूसरे की जेब में

मैं व्यापारी नहीं हूँ
पर किसान जरूर हूँ
मेरी जरूरत सभी को है
मैं मिट्टी में सोना उगाता हूँ
सोनार नहीं हूँ
तभी तो उस सोने को औने पौने दामों में बेच देता हूँ

अब तक तो मैं अंजान था
अब मुझे अपनी कीमत समझ आ रही है
अब मुझे फंसना नहीं है
ज्यादा नहीं पर 
हक और उचित मूल्य जरूर चाहिए
अब मैं चुप नहीं बैठूगा
मुझे लाचार और कमजोर न लेखा जाए
मेरी काबिलियत का मूल्यांकन होना चाहिए

Tuesday, 28 November 2023

समय सब भूला देता है


कमोबेश सभी पार्टियों का यही हाल है

एक कहानी सुनी थी अपनी माँ से
एक व्यक्ति था उसकी बेटी विवाह योग्य हो गई थी ।कोई अच्छा वर नहीं मिल रहा था । गरीब की बेटी और ऊपर से सुंदर।  एक दिन वह परेशान हो बेटी को लेकर निकल गया
चलते चलते दूर निकल गए। वहाँ एक मकान दिखाई दिया रात हो ही रही थी सोचा यहाँ आसरा मिल जाएंगा । अंदर गए तो एक कमरे से किसी के कराहने की आवाज आ रही थी । झांक कर देखा तो एक व्यक्ति जिसके पूरे बदन में सुई चुभी थी  व्यक्ति अपनी बेटी को वही छोड़ चला गया
तेरे भाग्य में यही है इसकी सेवा कर और रह ।  
         युवती रोज नहा - धोकर ईश्वर की पूजा कर दो सुइयां निकालती। इसी तरह महीने बीत गए।  अब बस ऑख की सुई निकालनी बाकी थी ।उस घर में एक दासी थी वह यह सब देख रही थी ।उसने क्या किया कि वह भी नहा धोकर , पूजा पाठ कर आखिरी दोनों सुइयां  उससे पहले ही निकाली । इस व्यक्ति ने समझा यही है जिसने मेरी सेवा की है आज से यह मेरी दासी नही रानी है।
यह व्यक्ति एक राजा था जिसे शाप मिल गया था ।कहानी आगे भी है पर उस पर चर्चा नहीं
    कभी-कभी ऐसा भी होता है करता कोई और है ।सालों
की मेहनत और प्रयास।  लाभ किसी और को ।सेहरा किसी और के सिर पर 
राजनीति में तो यह अक्सर देखने को मिलता है ।आपने क्या किया  यह कोई याद नहीं रखता।  आप क्या हैं यह सब याद रखते है। जिसके हाथ में सत्ता उसी का गुणगान।
असली लोग हाशिए पर ।
यह किसी एक पार्टी की बात नहीं है कमोबेश सभी पार्टियों का यही हाल हैं  

राजनीति क्या परिवार में भी यही हाल है । लोग चले जाते हैं समय बदल जाता है ।नयी पीढ़ी आ जाती है ।

तुम्हारा किया - धरा सब भुला दिया जाता है। 

चमचा हर युग की जरूरत

चमचा हर युग की जरूरत
चमचा बिना तो सब अधूरा
पतीले में व्यंजन लाजवाब पडे हैं
बिना चमचो तक उन तक पहुंच नहीं
चमचा से हिलाना पडेगा
चमचा से निकालना पडेगा
चमचा से खाना पडेगा
तब जाकर उसका स्वाद समझ में आएगा

कटोरी तो खैर छोटी सी
उसमें तो हाथ डालकर खा सकते हैं
ग्लास से लेकर भगोना
हर गहरे चीज में पहुंचना है
तो आवश्यक है चमचा

बडे बडे काम
बडे बडे अफसर
इन तक पहुंचना इतना आसान नहीं
चमचा तो जरूरी है
बिचौलिया बिना तो डायरेक्ट पहुँच नहीं
यह तो इंसान है
ईश्वर तक पहुंचने के लिए भी
पंडे - पुजारी की शरण

इनके रूप अलग अलग हो सकते हैं
नाम अलग-अलग हो सकते हैं
आकार अलग - अलग हो सकते हैं
हाँ इनकी जरूरत सभी को
साधारण आदमी से लेकर सत्ताधीशो तक
बहुरूपिये से लेकर राज दरबारियों तक
इनकी चमक फीकी नहीं पड रही
समय के साथ मांग भी बढ रही
तोड जोड़ करना हो
बिठाना - गिराना हो
ये माहिर खिलाडी है
इनसे दुश्मनी लेना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना
अगर सब कुछ सुचारु रूप से हो
हमारा कार्य सिद्ध हो
तब तो चमचा को बार-बार चमकाना पडेगा
कुछ हिस्सा देना पडेगा
नहीं तो आप ताकते रह जाएंगे
चमचा मुंह चिढाता रह जाएंगा