Saturday, 2 April 2016

एक और आंनदी की मौत - हँसती -खेलती बालिका की बलि

प्रत्यूषा बनर्जी यानि बालिका वधू की आंनदी की मौत फिर एक बार न जाने कितने सवाल खडा कर गया है
एक मात्र २४ साल की लडकी का इस मुकाम तक पहुंचना कि हर घर में उसकी पैठ होना
हर कोई को उसका इंतजार रहना
घर - घर की प्यारी आंनदी इस तरह लोगों को रूला कर चली जाएगी ,किसी ने सोचा भी न था
हमारे इन कलाकारों की वास्तविक जिंदगी का सच क्या होता है
परदे के पीछे की इनकी जिंदगी
जिया खान ,विवेका बाबाजी ,और अब प्रत्यूषा तथा इनके पहले भी कितने
कहीं न कहीं इनके पीछे इनके ब्वाय फ्रेंड का हाथ रहा है ,फिर वह भावनात्मक हो ,मानसिक हो या फिर कुछ और हो
पर क्या समस्या का हल केवल मौत ही है
प्रत्यूषा की मौत पर राखी सॉवत का जवाब काबिले तारीफ है उनका कहना कि भाड में जाए ब्वायफ्रेंड
किसी के लिए मरने की क्या जरूरत है
सही है जिस लडकी ने इस मुकाम पर आने के लिए न जाने कितनी लडाइयॉ लडी होगी
एक झटके से अपनी जान दे देना.
अपना और अपने माता- पिता के अरमानों का गला घोट देना
वह व्यक्ति तो चला जाता है पर अपने लोगों को जीते जी मार जाता है
और यह अच्छी पढी लिखी डॉक्टर, इंजीनियर ,प्रोफेसर तक कर रही है
इनसे तो वह अनपढ अच्छी है जो डट कर परिस्थितियों का सामना करती है
नारी आगे बढ रही है ,सब जगह लोहा मनवा रही है
पर भावनात्मक स्तर पर हार जा रही है
यहॉ भी उसे मजबूत होना पडेगा
विकास करना है तो यह सब तो होगा ही
यहॉ ही वह पुरूष के सामने क्यों झुक जाती है
वक्त को वक्त दे ,वह हर घाव का मरहम है
इसके अलावा परिवार तथा समाज का साथ
हम सोचते हैं बच्चे बडे हो गये
पर उम्र तो अभी नादान ही है उनको अपनों के साथ की जरूरत है
प्रत्यूषा की मौत कई सवाल छोड गई है
आखिर इतनी कम उम्र में शोहरत और नाम हासिल करने वाली को इतना मजबूर होना पडा कि उसके सामने खुदकुशी के सिवाय और कोई रास्ता बचा ही नहीं
लडका हो या लडकी ,हर माता - पिता को अपने बच्चों के साथ खडा रहने की जरूरत है
बच्चे दूर रहते हैं ,कमा रहे हैं पर उनको आधार की जरूरत है
आज नारी पुरूष साथ काम कर रहे हैं तो रिश्तों और प्यार की परिभाषा भी बदल रही है
जिसको हर किसी को स्वीकार करना पडेगा
जान देना किसी समस्या का हल नहीं है

Friday, 1 April 2016

ईश्वर के दरबार में प्रवेश करने के लिए भी संघर्ष

आज औरतें और महिलाएं बडे -बडो पदों पर आसीन है और सफलता पूर्वक अपना लोहा भी मनवा रही है
पर हर जगह अपने अधिकार पाने के लिए लडाई
चाहे वह घर हो या भगवान का मंदिर
कानून में तो उनको समान अधिकार दिया है
पर सच में ऐसा है क्या?
क्यों उनके ऊपर ही पांबदी कि
यह काम करना है और यह काम नहीं
आज महिला पुरोहित भी है और साध्वी भी
धार्मिक परम्पराओ को बनाने वाले कौन है
मानव जाति ही
पुराण और धार्मिक ग्रंथों का हवाला दिया जाता है
और यह हर धर्म में है
औरत को ही परदे में क्यों रहना है
सब जगह परिवर्तन हो रहा है तो पुरानी मान्यवताओं में भी ,उनको पकड कर रखना यह कहॉ की समझदारी है
पहले परदे में रहने वाली महिला आज दुनियॉ की सैर करा रही है
और फौज में बंदूक लेकर भी खडी है
अब वह अबला नहीं है ,अपने पैरों पर खडी है
और हर जगह अपनी भागीदारी चाहती है और वह उचित भी है
अगर उसको शनि शिंगणापूर या फिर त्रंयबंकेश्वर के गर्भगृह में प्रवेश करना है तो मनाही क्यों?
और यह उस हक को पाने के लिए लड रही है
और पाकर ही रहेगी
घर से बाहर तक हर लडाई उन्होंने की है
चाहे वह शिक्षा का हो या नौकरी का
अब वह पुरूषों की दासी नहीं कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है और
कुछ जगहों पर तो उनसे भी आगे निकल गई है
समाज तभी उन्नति करेंगा जब सब उन्नति करें
आधी आबादी को अधिकार से वंचित कर कोई भी समाज ,देश उन्नति नहीं कर सकता
अपनी मानसिकता में बदलाव लाना चाहिए
और उनकी क्षमताओं का उपयोग करने में ही सभी की भलाई है

बोझ ढोता बचपन

आज पीठ पर बोझ ढो रहा है बचपन
हर गली -मुहल्ले में सुबह -सुबह बचपन को घसीटते मॉ -बाप दिखाई दे जाते हैं
मासूम बचपन को तो यह भी पता नहीं कि वह क्या कर रहे हैं
रोते -रोते चल रहे हैं
ऊपर से रास्ते में भी उन्हें स्पेलिंग रटना और पहाडे सिखाते हुए दिख जाते हैं
दो -ढाई साल से ही वह चल पडते हैं जीवन निर्माण की दिशा में
अब कहा जा रहा है बच्चों का बोझा कम करो
उनके कंधों को समय से पहले मत झुकाओ
पढाई करने के लिए होनी चाहिए
न कि परशन्टेज में तौलने के लिए
न जाने कितने फेलियर बडे-बडे मुकाम हासिल कर चुके हैं
और न जाने कितनों की राह को इस फेल और पास के चक्कर ने रोका है
डिग्री मिली भले वह नकल की हो
और कुछ जीवन भर परीक्षा ही देते रह जाते हैं
बचपन को बोझ नहीं बनने देना है
फिर वह चाहे बैग का हो या पढाई का
खुल कर जीने दे
शिक्षा जरूरी और अनिवार्य है पर कुछ खोने के लिए नहीं
पाने के लिए ,जीवन बनाने के लिए

बचपन बोझिल नहीं हर परेशानी से दूर चंचलता से परिपूर्ण हो

विजय माल्या - झूठ और फरेब का मुखौटा

आजकल विजय माल्या खूब चर्चा में है बैंकों का आठ -नव हजार के करीब कर्ज है उन पर और वे देश छोडकर परदेश में रह रहे हैं
आलीशान रहन सहन ,सुरा और सुंदरियोें के साथ ,मंहगी गाडियों का और पार्टी मनाने का शौक
बैंक से वे सेटलमेंट करने की बात कर रहे हैं और चार हजार कर्ज चुकाने को तैयार है
यह क्या अहसान जता रहे हैं
आइ पी एल ,किंग फिशर से जुडे माल्या न जाने कितने लोगों की जिंदगी से खिलवाड किया है
अपने कर्मचारियों को वेतन न देना ,उन्हें भूखमरी की कगार पर ला खडा करना यह कहॉ का न्यायसंगत है
ऐसे व्यक्ति को तो बख्शना नहीं चाहिए
ऐशभरी जिंदगी वह भी दूसरों के पैसे पर
यह वह देश है जहॉ चार हजार कमाने के लिए महीने के तीस दिन वह मेहनत करता है और अपने परिवार का भरण -पोषण करता है
अगर साधारण या आम आदमी कर्ज लेने जाता है तो बैंक के न जाने कितने चक्कर काटने पडते हैं
और माल्या जैसै लोगों को कुछ नहीं
इसमें हर किसी की मिली भगत होगी
बडे- बडे लोग डिफाल्टर घोषित कर दिए जाते हैं
अब तो माल्या सबके आदर्श बन जाएगे
किसी के मन में डर नहीं रहेंगा
मौज - मजा करो और भाग जाओ
यह व्यक्ति हमेशा कुछ सालों से सुर्खियों में रहा है
अब तो हद हो गई है
जल्द से जल्द सरकार को कोई ठोस कदम उठाना चाहिए
और आने वाले समय में भी ऐसे लोगों से सचेत रहने की जरूरत है