Tuesday, 4 July 2017

प्यार का इजहार

प्रेम  का सौंदर्य को उपहार चुंबन नहीं तो और क्या है
प्रेम का  सौंदर्य को उपहार आलिंगन नहीं तो और क्या है    --- राष्ट्रकवि दिनकर की उर्वशी की ये पंक्तियॉ

          पाश्चत्य देशों में इसे अश्लील नहीं माना जाता
पर हमारे देश में तो सब परदे में रखा जाता है
ठीक है यह सब सरेआम नहीं होना चाहिए
पर अगर हुआ भी तो क्या पहाड टूट पडा
हमारी परम्परा में अभी इतना खुलापन नहीं है पर कुछ धर्मों में इसे बुराई नहीं माना जाता
वहॉ तो शादी के समय दूल्हा ,दूल्हन को चुंबन और आलिंगन देता है
इसका मतलब वे निर्लज्ज है क्या??
समाज के कुछ ठेकेदार आजकल लोगों को सताने में लगे हैं
कोई प्रेमी जोडा अगर बतिया रहा है या घूम रहा है तो उस पर मारा- पीटी कर रहे हैं
अपना दृष्टिकोण सुधारना है
कोई छोटा कपडा न पहने
मोबाईल पर बैंन
घर से बाहर न निकले
बुरके और सर पर पल्लू हो
यह सब क्या है??
यह दकियानुसी विचारधारा वाले लोगों ने लोगों को सुधारने का ठेका ले रखा है
लोग आधुनिक युग में जा रहे हैं
और ये पुराने ढर्रे पर जाने को मजबूर कर रहे हैं
युवा पीढी और पढी- लिखी पीढी इसे क्यों स्वीकार करेंगी
वह तो वेलेंटाईन डे भी मनाएगी
मॉर्डन कपडे भी पहनेगी
प्रेम का इजहार भी करेगी
नजरियॉ बदलो ,सोच बदलो, लोगों को मत बदलो

व्यक्ति और पोशाक

जब छोटी क्लास में थी तो पाठ्य पुस्तक में एक पाठ था   अल्बर्ट आइंस्टाइन का
एक समय का वाकया था कि उनको कुछ लोग मिलने आने वाले थे
उनकी उपलब्धियों पर उनका सम्मान होना था
दूनियॉ के बडे और महान लोग उनमें शुमार थे
उनकी पत्नी को उनकी आदत पता थी सीधा- सादा रहन- सहन
कपडो के प्रति कोई चाव नहीं
इसलिए उन्होंने उनके पुराने और प्यारे पैंट और शर्ट को छुपाकर रख दिया
तैयार होकर नीचे जाने का समय आया तो उनका कपडा गायब है
उनकी पत्नी उन्हें तैयार होकर नीचे आने के लिए कह मेहमानों का आवभगत करने चली गई
कुछ समय के बाद देखती क्या है कि
वे उन्हीं पुराने कपडे में नीचे उतर रहे हैं
उन्होंने अपना कपडा ढूड निकाला था
मेहमानों के जाने के बाद पत्नी के गुस्सा होने पर उनका जवाब था
जो लोग आए थे वे मुझसे मिलने आए थे न कि मेरे कपडो को देखने
पर आज समय बदल चुका है तथा हर कोई तो आईंस्टाइन नहीं हो सकता
कपडे और व्यकितत्व का प्रभाव तो पडता है
कारपोरेट जगत में काम करना है
विज्ञापन का युग है
दिखना और दिखाना तो पडेगा ही
गांधी भी नहीं बन सकते , एक धोती में काम चलाना
कपडा तो व्यक्तित्व संवारने में एक अहम भूमिका निभाता है
और उससे इन्कार नहीं किया जा सकता
कभी दो- तीन कपडो में अपनीजिंदगी गुजारा करने वाला भी आज अच्छा कपडा पहनना चाह रहा है
कपडे को तवज्जों दे रहा है
आज चाहे मध्यम वर्गीय हो या गरीब
नेता हो या अभिनेता
छात्र हो या शिक्षक
मालकिन हो या काम वाली बाई
कोई भी वर्ग इससे अछूता नहीं रह गया है
कपडा केवल तन ढाकने के लिए ही नहीं
बल्कि व्यक्तित्व निखारने के लिए भी सहायक है
उसकी महत्ता को झुठलाया नहीं जा सकता

कर भला तो हो भला

एक सज्जन थे ,थोडा घुमक्कडी स्वभाव के थे
जब भी फुर्सत मिलती ,अपना बोरियॉ- बिस्तर उठा सैर पर निकल पडते
एक बार की बात है वह कहीं गए थे ,ट्रेन से यात्रा कर रहे थे
उनको प्यास लगी ,पानी लेने के लिए नीचे उतरे
किसी से बात करने लगे
सीटी की आवाज से ध्यान भंग हुआ
भागे पकडने के लिए पर भारी शरीर कहॉ से दौड पाते ट्रेन की रफ्तार में
वीरान इलाका था पता चला कि अब दूसरी ट्रेन एक दिन के बाद है
कहॉ गुजारेगे दो दिन
कोई होटल या सराय भी नहीं था आसपास
चल पडे सामान ले इधर- उधर देखते हुए कि कहीं ठिकाना मिल जाय
अचानक चलते- चलते उनको एक झोपडी दिखाई दी
मन में कुछ आस जगी
बाहर से आवाज लगाई-- कोई है??
फटे- पुराने कपडे पहने एक व्यक्ति बाहर आया
उनहोंने अपनी परेशानी बताई
व्यक्ति ने उनको कहा कि आप मेरे यहॉ रह सकते हैं
पिछवाडे वाले भाग में उनका इंतजाम कर दिया
उनको टूटी- फूटी खटियॉ और मटमैले बिस्तर भी दिए
शाम हुई तो वह खाना लेकर आया
भूख तो लगी ही थी
उन्होंने उसकी मोटी रोटी और चटनी स्वाद लेकर खाई
ऐसा तो स्वाद पंचसितारा होटल में भी नहीं मिला था
सोचने लगे बिना कुछ मांगे यह इतना कर रहा है
अतिथि देवो भव  - इन्हीं की वजह से कायम है
सुबह ऑख खुली तभी उन्होंने देखा कि एक अच्छे कपडे पहने हुए रौबदार व्यक्ति झोपडी में प्रवेश कर रहे हैं
अंदर से खुसर- पुसर की आवाज सुनाई दे रही थी
उन्होंने पतरे के झरोखो से झॉका तो वह  अमीर व्यक्ति उसको डाट रहा था 
और यह हाथ जोडकर गिडगिडा रहा था
पैसे नहीं है साहब ,मिलते ही दे दूंगा
उसके आगे उन्हें कुछ देखने की जरूरत न रही
वह सब समझ गए
जाते समय अपने बटुए से कुछ पैसे निकाल बटुआ  वहीं रख दिया
ताकि उसको लगे कि वह भूल गए हैं
उसको पैसा भी मिल जाय और उसका स्वाभिमान भी बना रहे
बिना मांगे- विचारे ,गरीब होने पर भी उनकी मेहमान नवाजी की
उसका ईनाम तो मिलना ही था

रेलयात्रा भी बँट गई धर्म में

पहले हम जाते थे गॉव
कितना अपनापन होता था
सुख- दुख भी साझा करते थे
और खाना - पीना भी
सफर में यात्री ऐसे घुलमिल जाते थे
जैसे वर्षों का साथ हो
दो- तीन दिन का समय बतियाते - खिलखिलाते कट जाता
कोई किसी के बच्चे को गोद में उठाता
तो कोई किसी के लिए बाहर से पानी लाता
सारे धर्म और जाति वाले बस रह जाते सहयात्री
कोई पुरी- ठोकवा के साथ भरवा करेला खिलाता
तो कोई घर से लाई हुई सेवइयॉ
बातचीत में घर - परिवार से भी परिचित
उतरते समय कोई किसी का सामान उतरवाता तो कोई किसी के बुजुर्ग को
किसी के बच्चे को कोई उंगली पकडवाता
तो कोई गोद में ले लेता
यहॉ तक कि जाते- जाते पता भी नोट कर लेते
निमंत्रण दे जाते अपने घर- गॉव आने का
अब तो डर लगता है
किसी के बच्चे को इसलिए पीट कर मार डाला गया कि वह मुसलमान था
उसकी ढाढी पहचान थी
आज एक हादसा हुआ कल कोई और निशाने पर होगा
भाईचारे की भावना कहॉ गई
लोक मूकदर्शक बने रहे और बच्चा पिटता रहा
अब तो रेल में भी धर्म और जाति को देखकर रिजर्वेशन कराना पडेगा
मंदिर ,मस्जिद ,गिरजाघर ने बॉट लिया भगवान को
धरती बॉटी ,सागर बॉटा ,मत बॉटो इंसान को