Tuesday, 12 May 2026

समय बड़ा बलवान

आज जब समय कुछ नासाज है
तब लगता है
हमारी आवश्यकताए क्या है
सबसे बडी प्राथमिकता पेट भर भोजन
रहने को छत
पहनने के लिए कुछ कपड़े
घर में है
इसलिए ताम झाम नहीं
जीवन सरल और सादा भी हो सकता है
सब कुछ बटोरता है 
साथ कुछ नहीं ले जाता
सब यही रह जाता है
यादें भी धीरे-धीरे धूमिल पड जाती है
दिन  , महीने और ज्यादा हुआ तो कुछ वर्षों तक
अपनों को छोड़कर
पर वहाँ भी जब नई पीढ़ी का प्रवेश होता है
तब उनको उससे कोई सरोकार ही नहीं
क्योंकि वे उस इंसान से अनभिज्ञ होते हैं
उन्हें क्या मतलब किसने क्या त्याग किया
समय के साथ तो सत्य की परिभाषा भी बदल जाती है
आज गाँधी और नेहरू पर भी ऊंगली उठाई जा रही है
वे कितने साल जेल में रहे
क्या क्या किया
वह कोई मायने नहीं
और यह केवल एक की बात नहीं
पूरे विश्व में ही है यह नजरिया
दीवार टूटी
मूर्ति ढहा दी गई
वर्तमान ही सत्य है
जो हो रहा है
कल कोई आपको याद नहीं रखेंगा
वह परिवार हो 
वह समाज हो
वह व्यक्ति हो
देश हो
सब भूला दिया जाता है
योगदान भूला दिया जाता है
सही है न
    सिकंदर ने पौरंष से की थी लडाई
तो हम क्या करें

Sunday, 10 May 2026

मेरी मां

मैंने उस फौलाद को देखा है 
जो लाख आंधी - तूफानों में भी डटकर खड़ी रही 
कभी हार नहीं मानी 
मेहनत को उसने अपना भाग्य बनाया 
हमेशा सबको देती रही 
हर सुख - दुख में सबके साथ खड़ी रही 
कभी उसके मुख से तेज आवाज भी नहीं सुनी 
कभी अपने बच्चों पर हाथ भी नहीं उठाया 
बच्चें ही उसकी पूंजी असली धन 
वह ज्यादा पढ़ी - लिखी नहीं 
तब भी ककहरा तो उसने ही सिखाया 
शिक्षा को सर्वोपरि माना 
बच्चों के लिए सपना ही नहीं देखा उन्हें साकार भी किया 
वह देहात - गांव की थी 
फिर भी कभी उसके मुख से एक फूहड़ शब्द या ताने नहीं सुने 
न हमको कभी सिखाया 
वह बाहर की दुनिया से अंजान रही 
रसोई में ही उसकी दुनिया सिमटी रही 
अन्नपूर्णा का साक्षात अवतार 
कभी उसके दर से खाली पेट कोई नहीं गया 
सबको देती रही उसके बदले शायद उसको कभी कुछ मिला नहीं 
ईश्वर पर अपार आस्था 
कुछ ऐसे अवसर भी आएं जीवन में 
जहाँ उसे टूटना चाहिए था 
बिखरना चाहिए था 
वह तब भी वैसे ही अडिग रही 
उसने अपनी बांहों पर भरोसा किया 
जितना प्यार देना था दिया 
वह पैसे से भले संपन्न नहीं थी मन से तो बहुत थी 
गजब का साहस और हिम्मत 
पूरे परिवार की धूरी 
अपने दम पर परचम फहराने वाली 
उस घरेलू और हिम्मती मां को मैंने देखा है 
बेटी - बहन - बहू - भाभी - चाची - दादी - नानी - मामी - फुआ 
हर रिश्ता क्या बखूबी निभाया 
कभी किसी के मुख से मां के बारें में कुछ अनुचित सुना नहीं 
दुश्मन को भी ऊंचा पीढ़ा देने की बात करना 
अनगढ़ पत्थर को भी तराश कर रूप देना 
नारी के सारे गुण 
स्नेह - दया - प्रेम - त्याग- सौंदर्य की मूर्ति 
सादा जीवन उच्च विचार धारण करने वाली 
अपने आंसू को अस्र बनाने वाली 
उस फौलादी मां को सलाम 
एक चुप्पा सौ को हराए का सिद्धांत 
हमें कभी-कभार कोफ्त होता था 
पर यह उसका अपना जीने का अंदाज 
कभी न किसी के सामने हाथ फैलाया न मांग की 
समय फिर भी बड़ा बलवान है 
उम्र के आखिरी कगार पर है 
देख कर दुख होता है 
मां का बुढ़ापा 
सहन नहीं होता है 
उसे उसके उसी फौलादी रुप में देखने की आदत जो है 
मैं तुम्हें क्या दूंगी 
जो कुछ भी हूँ वह तो तुम्हारें ही कारण हूँ 
तुम्हारा अंश हूँ 
कुछ प्रतिशत भी वैसे हो जाए तो खुशनसीबी हमारी 
तुम्हारें बारे में कुछ कहना या लिखना 
सूर्य को दीया दिखाना हुआ 
बहुत दिया तुमने 
बहुत बांटा प्रेम और अपनापन 
अब तो ईश्वर तुम्हारी भक्त तुम पर ही निर्भर 
बहुत कुछ विस्मरण होने लगा है 
भूलने लगी है 
शायद यह अच्छा भी है 
दुखद स्मृतियां जुड़ी है 
बस अपने बच्चों को मत भूलना 
हमेशा सुबह चार बजे भोर में प्रार्थना करती रहती थी 
वह क्रम कभी न टूटे 
क्योंकि तुम कहती थी ना 
मेरे बच्चों को कोई प्रेम दे या न दें 
मैं कोई कमी नहीं होने दूंगी 
फर्श से लेकर अर्श तक खड़ा करने वाली माता 
तुम्हें शत शत प्रणाम 

Happy mother's day

बिन बोले सब कुछ  जान जाती है माँ 
चेहरे के हर भाव को पढ लेती है माँ 
ध्यान  से देखती है निहारती है
पता नहीं  क्या  ढूढती  है मुझमें 

मन के भावों  को  छुपाना चाहती हूँ 
तुमसे दूर जाना चाहती  हूँ 
तुम्हारा मन न दुखे यह भरसक कोशिश  करती हूँ 
पता नहीं  कौन सी ज्योतिष  विद्या  सीखी है तुमने
सब कुछ  अपने आप जान जाती हो

नहीं  चाहती  तुम्हें  दुखी  करना
पता है न 
तुम माँ  हो भाग्य-विधाता  नहीं 
वह होती तब तो कुछ  और बात होती
सारे संसार  की खुशियाँ  तुम मेरी झोली में  डाल देती

खैर कोई  बात नहीं 
ईश्वर  न हो तब भी माँ  तो हो ही
तुम  ईश्वर  से कम थोड़े  ही हो
भगवान  से तो प्रार्थना  करनी पडती है कुछ पाने के लिए 
तुम  पर तो अधिकार  है तभी तो छीन कर ले लेते हैं 
ऊपर से चार बात भी सुनाते हैं 
इतना नखरे  कौन सहेगा
बिन स्वार्थ  के कौन पूछेगा 

वह तो बस तुम  ही हो सकती हो
मेरी सारी बुराइयों  को  नजरअंदाज कर 
मुझे  पलकों  पर  बिठाने वाली
मेरे  लिए  किसी से भी लड जाने वाली
अपनी  परवाह  न कर
हर पल मेरी खिदमत में  तत्पर 
जैसे  मैं  कोई  महारानी हूँ 
आर्डर  दू और वह तुरंत  हाजिर

नहीं  चाहती  राज पाट
नहीं  चाहती सुख - सुविधा 
बस तुम्हारा हाथ सर पर रहें 
तुम  शतायु  हो
जीती रहो और  मेरे आसपास  डोलती रहो
ईश्वर  की शुक्रगुजार  हूँ 
वह तो साक्षात  नहीं  अवतरित  हो  सकता
तुमको भेज दिया  बस काफी  है

बरखा बिन सागर  कौन भरे 
माता बिन आदर कौन करें 

Happy Mother's day

Saturday, 9 May 2026

ऐ जिंदगी

जीना तो कुछ और तरह से चाहती थी 
वैसा कुछ हुआ नहीं 
बड़े अरमान और सपने भी न थे 
बस छोटी - छोटी ख्वाहिशें थी 
वह भी मयस्सर नहीं हुई 
स्वाभिमान को भी ताक रखना पड़ा 
न जाने किस - किसके सामने झुकना पड़ा 
बिना दोष के भी दोषी बनना पड़ा 
कोई न समझ पाया न समझने को तैयार 
बिन कारण भी बातें सुननी पड़ी 
परायों की तो क्या कहें अपनों की भी 
हर जगह बस समझौता 
बस निभाना 
बोलने का अधिकार नहीं 
अपना पक्ष भी रख न सकी 
कभी-कभार मन में आता है 
क्या ऐसा ही जीवन होता है 
या हमारे हिस्से में ही 
प्यार बहुत करते हैं मेरे अपने 
अपना कर्तव्य भी निभाते हैं
बहुत कुछ किया है और करते भी हैं 
लेकिन स्वतंत्रता नहीं दिखती है उसमें 
एक बंधन और जकड़न सी है 
लगता है जबरदस्ती बांधा गया है 
बंधी हुई कोई भी चीज मन को आनंदित नहीं करती 
हर जगह आपको परीक्षा देना पड़े 
अपने को सही सिद्ध करना पड़े 
विश्वास दिलाना पड़े 
तब जीवन का वह मजा नहीं 
जहाँ बोलने के पहले सोचना पड़े 
वहाँ अपनापन ही क्या 
जहाँ मन न खोल सके 
बस कमियां निकाली जाए 
यह तो ऐसा पिंजरा है 
जहाँ से न बाहर निकला न जा सकता है 
न अंदर शांति से बैठा जा सकता है 
सबको जोड़ते- जोड़ते टूटता रहा अंदर कुछ 
फिर वही पूछते हैं 
क्या हुआ 
सब कुछ तो अच्छा चल रहा है 
इसे अच्छा चलाने के लिए गिरते रहे हैं 
गिड़गिड़ाते रहे हैं 
झूठी हंसी बिखेरते रहे हैं 
फिर भी कोई कभी बात पर बतंगड़ बनाया तो कभी आवाज पर
अब तो डर लगता है सबसे 
कहीं कोई गलती न हो जाए 
कोई संबंध न तोड़ लें 
बचने की कोशिश रहती है हर दम
इंसान ही हैं हम 
कभी - कभी खुशी में अपनी औकात भूल जाते हैं 
लेकिन यह ज्यादा समय टिकता नहीं 
औकात दिला ही दी जाती है 
फिर वापस अपनी दुनिया में लौट आते हैं 
मन में विचार उमड़ते - घुमड़ते हैं 
बाद में बादल बन बरसते हैं 
उनको भी छुपाना पड़ता है 
बस अकेले में व्यक्त करना पड़ता है 
हंसी आती है ऐसे जीवन पर
दिखता कुछ होता कुछ 
शायद ऐसा जीवन तो नहीं चाहा था 
पर मिला और हमने भी शिद्दत से निभाया 
कोई साक्षी हो न हो 
जिसने यह जीवन दिया है वह तो है 
तभी तो हर कठिन को आसान बनाया 
जो लोगों ने किताबों में पढ़ी है वह हमने जी है 
मलाल कतई नहीं 
कुछ बात तो हममें भी थी 
वरना सबको कहाँ ऐसी मिलती है