Monday, 27 April 2026

मैं कौन ???

मैं पुरूष हूँ
यह बात तो सौ प्रतिशत सत्य
पर मैं और कुछ भी हूँ
एक पुत्र हूँ
एक भाई हूँ
एक पति हूँ
एक पिता हूँ
और न जाने क्या - क्या हूँ
मेरे पास भी दिल है
मैं कठोर पाषाण नहीं
जो टूट नहीं सकता
मैं बार बार टूटता हूँ
बिखरता हूँ
संभलता हूँ
गिरकर फिर उठ खडा होता हूँ
सारी दुनिया की जलालत सहता हूँ
बाॅस की बातें सुनता हूँ
ट्रेन के धक्के खाता हूँ
सुबह से रात तक पीसता रहता हूँ
तब जाकर रोटी का इंतजाम कर पाता हूँ
घर को घर बना पाता हूँ
किसी की ऑखों में ऑसू न आए
इसलिए अपने ऑसू छिपा लेता हूँ
सबके चेहरे पर मुस्कान आए
इसलिए अपनी पीड़ा छुपा लेता हूँ
पल पल टूटता हूँ
पर एहसास नहीं होने देता
मैं ही श्रवण कुमार हूँ
जो अंधे माता पिता को तीर्थयात्रा कराने निकला था
मैं ही राजा दशरथ हूँ
जो पुत्र का विरह नहीं सह सकता
जान दे देता हूँ
माँ ही नहीं पिता भी पुत्र को उतना ही प्यार करता है
मैं राम भी हूँ
जो पत्नी के लिए वन वन भटक रहे थे
पूछ रहे थे पेड और लताओ से
तुम देखी सीता मृगनयनी
मैं रावण भी हूँ 
जो बहन शूपर्णखा के अपमान का बदला लेने के लिए साक्षात नारायण से बैर कर बैठा
मैं कंडव  त्रृषि हूँ जो शकुंतला के लिए गहस्थ बन गया
उसको बिदा करते समय फूट फूट कर रोया था
मेनका छोड़ गई 
मैं माॅ और पिता बन गया
मैं सखा हूँ 
जिसने अपनी सखी की भरे दरबार में चीर देकर लाज बचाई
मैं एक जीता जागता इंसान हूँ
जिसका दिल भी प्रेम के हिलोरे मारता है
द्रवित होता है
पिघलता है
मैं पाषाण नहीं पुरुष हूँ

Tuesday, 21 April 2026

वक्त और अपने

वक्त के साथ आॅसू भले ही सूख जाए
पर अपनो को भूलाना आसान नहीं होता
चिता के साथ शरीर तो जल जाता है
पर वह अशरीर हमेशा पास रहता है
जिसके साथ जीवन के सुनहरे पल कांटे हो
लडे हो ,झगड़े हो
रूठे हो ,नाराज हुए हो
मानमनौवल किया हो
सुख दुख बांटे हो
हंसा और खिलखिलाया हो
उसकी नादानियो पर मुस्कराया हो
उसकी हर गलती माफ की हो
जम कर गुस्सा उतारा हो
थपेडे दिए हो
गले से लगाया हो
जी भर कर प्रेम लुटाया हो
अपना सर्वस्व लुटाया हो
पूरा अधिकार जताया हो
जिसके अलग होने की कल्पना से ही रूह कांप उठी हो
वह अपना अजीज जब छोड़कर जाता है
तब वह अपने साथ हमारा मन भी ले जाता है
हमें रिक्त कर जाता है
वह घाव दे जाता है
जो कभी नहीं भरता
मन के किसी कोने में छिपा रहता है
समय समय पर टीसता रहता है
यह दर्द हर कोई नहीं समझ सकता
वही समझ सकता है
जिसने अपने को खोया हो

Sunday, 12 April 2026

विवश मानव

आज मन विचलित है
नींद नहीं आ रही
दिमाग में कुछ उमड घुमड रहा है
विचारों का झुंड है
पर विषय एक ही है
  करोना
समाचार देख 
मोबाइल देख
टेलीविजन पर खबर
हर जगह हाहाकार
परमाणु बम बनाने वाला यह मानव
आज कितना विवश
सब विवश
कब कहाँ से और कैसे आक्रमण
यह समझना मुश्किल
हाथ पर हाथ धोएं जा रहे हैं
मास्क लगा रहे हैं
दूरी बना रहे हैं
फिर भी डर तो समाया
यहाँ तक कि सपने में भी
कितना खौफ
क्या है जीवन
क्या है इसका सार
मौत के मुहाने पर खडा मानव
लडता रहता है 
सभी आपदाओं से
कभी अकाल
कभी भूकंप
कभी बाढ 
कभी महामारी
और युद्ध भी
जिसका रचनाकार तो वह स्वयं
जीवन की जद्दोजहद के बीच
हम फंसे रहते हैं
क्या यही मानव की अहमियत
हमेशा डरा और सहमा
मृत्यु के नाम पर

Wednesday, 8 April 2026

हिम्मत

घना अंधेरा हो तब भी क्या 
दूर से आ रही एक रोशनी की किरण काफी है
लाख घने बादल छाए हो 
उसमें से एक इंद्रधनुष की पतली रेखा काफी है 
मरूस्थल में भी पौधे पनपते हैं 
जीवन की हर एक सांस बहुमूल्य है 
स्थायी यहाँ कुछ भी नहीं 
अंधेरा कब तक रहेगा 
बादल कब तक छाए रहेंगे 
उनको तो जाना ही है 
बस आशा रखना है 
वक्त- वक्त की बात है 
अच्छा भी आएंगा 
हिम्मत नहीं हारना है