Sunday, 23 August 2026

हर युवा को यह समझना होगा

ले लिया एक मोबाइल ने जान 
वह भी एक नहीं तीन - तीन
मां - पिता और युवा 
मोबाइल न दे पाए अपनी युवा औलाद को 
वह पहाड़ी पर चढ़ गया जान देने 
मनाने की कोशिश हुई नहीं माना 
आखिर में सबकी जान चली गई 
आज लोगों की जान मोबाइल में टिकी है 
बचपन से हाथ में मोबाइल 
यह ऐसा खिलौना है जो जिंदगी लील रहा है 

एक जमाना था 
जब बच्चें अपने पालक की परिस्थिति को समझते थे 
कुछ भी नहीं मांगते थे 
हर बात की जिद नहीं करते थे 
हमने ब्लेक - व्हाइट टेलीविजन के लिए दूसरों के घर जाते थे 
दुत्कारना जाते थे 
भगाए जाते थे 
हंसते हुए बाहर आ जाते थे 
कभी मांग नहीं की 
यहाँ तक कि पढ़ने के लिए पुस्तक की भी मांग नहीं की 
लाइब्रेरी से किताब लेकर नोट्स बनाए कर पढ़ते थे 
प्रेमचंद की ईदगाह कहानी में इसका बखूबी चित्रण है 
हामिद को मिठाई के लिए दादी पैसे देती है 
तो वह चिमटा लेकर आता है ताकि दादी के हाथ रोटी बनाते हुए नहीं जले 
उसका भी बालमन मचलाता है 
मिठाई और खिलौने के लिए 
बेटी होने के कारण बेटियां सब दुख सह लेती थी पर जाहिर नहीं करती थी 
बेटा अपने आंसू छिपा लेता था ताकि मां की आँखों में आंसू न आए 
शिक्षक से मार खा लेते थे पर घर पर नहीं बोलते थे 
पड़ोसी भी डांट लगा देते थे 
दो कपड़ों में पूरा वर्ष निकाल देते थे 
घर के पकवान वो भी त्योहार में खाकर मस्त रहते थे 

आज जरूरतें बढ़ गई है 
हर बच्चें को मोबाइल और बाइक चाहिए 
उसको भराने के लिए भी पैसा चाहिए 
आमदनी है नहीं न काम करना है 
माता - पिता सामर्थ्य वान न हो तब 
पढ़े - लिखे और अपनी कमाई से अपने शौक पूरे 
यह युवाओं को समझना होगा 
इतना अमूल्य जीवन यू ही गंवाना 
मजबूर न करें अपने पालक को 
परिस्थिति को समझे 
छोटी - छोटी बात पर जान देना लगता है फैशन हो गया है 
आए दिन ऐसी घटनाएं हो रही है 
क्षुद्र कारणों से जान देना 
जीना सीखिए 
प्यार में धोखा 
मोबाइल,  मोटरसाइकिल,  इन सब के लिए जान देना 
जिंदा रहेंगे तभी तो मोबाइल चलाएंगे 
दूसरों की कहानियां देखने की अपेक्षा अपनी कहानी खुद लिखे 
अपने जीवन की 
मां - बाप के सपनों को 
अपने सपनों को साकार करें 
जान मत दें 
जान है तो जहान है 
आप तो चले जाएंगे 
अपने पीछे जो प्रियजन है उनको जीते - जी मार जाओगे 
मत करो ऐसा 

Saturday, 22 August 2026

देखना है होता क्या है

दो तिनके नदी में बहते जा रहे थे 
नदी का प्रवाह तेज था 
एक तिनका नदी की धारा के साथ ही बह रहा था 
उसने सोच लिया था 
जहाँ ले जाएगी चला जाऊंगा 
अपने को भाग्य भरोसे छोड़ दिया 
दूसरा तिनका यह मानने को तैयार नहीं था 
जद्दोजहद कर रहा था 
लड़ रहा था 
कोशिश कर रहा था 
वह नदी की धारा के अनुसार बहने को तैयार नहीं 
अब तो दोनों का दृष्टिकोण अलग- अलग 
कौन सही कौन गलत ???
यह भी तो नहीं कहा जा सकता 
एक जा रहा है जहाँ उसको ले जाया जा रहा है 
वह संघर्ष भी नहीं करना चाहता 
न विरोध भी करना चाहता 
दूसरे को यह स्वीकार नहीं 
किसका क्या हश्र होगा 
कौन कहाँ जाएगा 
क्या हासिल होगा 

एक बूंद की आपबीती 
जो ऊपर से तो गिरती है 
कहाँ जाएगी वह यह नहीं जानती 
सीप का मोती बनेगी 
किसी की प्यास बुझाएगी 
समंदर में मिल अपने को खारा करेंगी 
नदी - कुएं में मिल मीठा जल बनेगी 
खेतों को सींचेगी 
पेड़ - पौधों को लहलहाएंगी 
गंदी नाली में गिरेगी 
अब तो वह बादलों को छोड़ निकल चुकी है 
जो होगा वह देखा जाएगा 
उसे बादलों की बंदिश स्वीकार नहीं 
चल पड़ी है 
देखना है होता क्या है 

जीवन का फंडा

घर से निकली 
अचानक बारिश होने लगी 
आज छाता घर पर ही छोड़कर आई थी 
पछतावा होने लगा 
अचानक मन में ख्याल आया 
बारिश को क्या मैं रोक सकती हूँ 
अपनी इच्छानुसार चला सकती हूँ 
उत्तर मिला   नहीं 
छाता तो ओढ़ सकती हूँ 
कुछ हद तक तो अपने को बचा सकती हूँ 
शायद जीवन भी ऐसा ही है 
परिस्थिति पर तो हमारा नियंत्रण नहीं है 
पर उसका मुकाबला तो हमें करना ही है 
कुछ न कुछ तो बचाव करना है 
पूर्ण रूप से तो नहीं कुछ हद तक ही सही 
मुसीबत जब आए
प्रयास नहीं छोड़ सकते 
बचाव रूपी छाता तो तानना ही चाहिए 
सब कुछ भाग्य और परिस्थिति पर नहीं छोड़ना 
यह बारिश भी हमेशा की नहीं है 
आई है तो जाएंगी भी 
मौसम बदलते हैं 
समय बदलता है 
एक सा कुछ भी नहीं रहता 
आज कुछ तो कल कुछ 
यही है जीवन का फंडा 

Friday, 21 August 2026

हे मेरे भोलेनाथ

हे मेरे भोलेनाथ 
मैं क्या तुझको अर्पित करू 
हाथ में जल हो मन पवित्र हो 
बस अपनी भक्ति का आशीर्वाद देना 
अपनी चिंता तुझे सौंप तेरे ही चिंतन में रमू 
जीवन धन्य हो जाएगा

मैं क्या तुझसे मांगू 
सब कुछ तो है तुझे ज्ञात 
नहीं तुझसे कुछ अंजान 
आज तक बहुत कुछ दिया आपने 
अपनी कृपा बनाए रखना 
हे कृपानिधान 

मैं अंकिचन 
हाथ जोड़कर प्रार्थना है 
मेरे परिवार पर रखना 
अपनी कृपा अपरंपार