Sunday, 20 September 2026

मैं चांद हूँ

मैं चांद हूँ
नीरव और शांत
शुभ्र और चलायमान
मेरी रोशनी मद्धिम-मद्धिम
किसी की ऑखों में चुभती नहीं
मुझमें सूर्य जैसा तेज नहीं
वह प्रकाश नहीं
फिर भी मैं हूँ
मेरा अस्तित्व है
मैं गतिशील हूँ
मेरी भी प्रतीक्षा होती है
मैं सुकून देता हूँ
कोई भी मुझसे नाराज नहीं होता
सबको साथ लेकर चलता हूँ
छोटे छोटे तारों को भी टिमटिमाने देता हूँ
मुझमें भी दाग है
फिर भी सौदर्य की बात हो 
तब मेरी ही उपमा दी जाती है
कोई भी परिपूर्ण नहीं
तब मैं कैसे
कभी घटता हूँ
कभी बढता हूँ
कभी संभलता हूँ
मैं जो हूँ
जैसा हूँ
सबका प्यारा हूँ
बच्चों का मामा हूँ
सुहागिनो का प्यारा हूँ
प्रेमियों का साथी हूँ
कवियों का दुलारा हूँ
शिवजी की जटा पर विराजमान हूँ
ईद की छटा में शोभायमान हूँ
मेरे बिना तो तारे भी अधूरे
मैं अंधकार में सहारा हूँ

मैं तुम्हारा प्यारा चांद हूँ

Saturday, 19 September 2026

मां हूँ

आज बहुत थकान लग रही है
मन विचलित हो रहा है
कुछ करने का मन नहीं है
घुटनों का दर्द बढ गया है
आज पूरा दिन आराम करूँगी
यह सोच चादर ओढ लिया

अचानक आवाज आई
माॅ माॅ माॅ
दरवाजा खोलो जल्दी
बहुत भूख लगी है
खाने को कुछ दो

अरे तू तो कल आने वाला था
तब फिर
आज काम हो गया तो गाडी पकड़ ली
घर पर चल भर पेट खाऊँगा
और जी भर कर सोऊँगा
आज बस आराम करना है
अभी फ्रैश होकर आता हूँ

आराम गया तेल लगाने
चलो किचन में
कुछ बनाओ 
इतनी दूर से आया है 
थका हारा , भूखा प्यासा

अरे तुम्हारे दर्द का क्या 
आराम का क्या
अचानक अंदर से आवाज आई
हंसते हुए कहा
सब काफूर हो गया
मैं माॅ हूँ न
मेरा दर्द क्या और आराम क्या ??

शुक्रिया

मैंने देखा आज 
एक खूबसूरत गुलाब का फूल
पेड़ - पौधों को झूमते
मैंने देखा आज 
सूर्योदय की लालिमा को 
कुनकुती धूप को 
मैंने देखा आज
शुभ्र नीले आकाश को 
बादल को भ्रमण करते 
मैंने देखा आज 
हवा को लहराते- झूमते 
समुद्र के उठान - चढ़ाव को 
मैंने देखा आज
चिड़ियों को चहचहाते 
मुर्गे को बाग देते 
सुबह का संदेश देते 
मैने देखा आज
अपने को आईने में 
मुस्करा कर बोला जैसे वो 
क्यों इतनी मायूसी क्यों चेहरे पर
फिर दिन हुआ है 
नया जीवन मिला है 
सांस चल रही है 
सब कुछ सही - सलामत है 
एक शुक्रिया तो अदा कर दो 
जिंदगी देने वाले का

Friday, 18 September 2026

अंदर - बाहर

बाहर कितना कुछ बदला 
लोग बदले 
परिस्थिति बदले 
अंदर कितना बदला 

बाहर सब दिखावा है 
एक तरह का छलावा है 
अंदर का अंदर रह जाता है 
बाहर कभी आ ही नहीं पाता 
बंधनों में बंधा 
यह अंदर - बाहर 
कभी एक सा हो नहीं पाता 
एक - दूसरे से मिल नहीं पाता