Monday, 14 September 2026

जो साथ चले थे

साथ चले थे न जाने कितने 
नए भी जुड़े पुराने भी रहे 
सबने अपनी राहें बाद में अलग-अलग कर ली 
पता नहीं कहाँ हैं 
कुछ का पता कुछ का नहीं 
सबकी अपनी जिंदगी 
सबकी अपनी सोच 
सबकी अपनी जरूरतें 
सबकी अपनी मजबूरी 
किसी की नौकरी किसी का परिवार 
किसी का घर किसी का शहर 
समय बदलता है तो लोग भी बदलते हैं 
बचपन से लेकर अब तक न जाने कितने मिले 
कितने बिछुड़े 
उसका हिसाब ही नहीं है 
कुछ जेहन में आज भी है 
कुछ विस्मरण हो गए 
सबका अपना वजूद था 
अपना प्रभाव था 
अंत तक साथ कोई नहीं देता 
अंत तक जो साथ दें बस वहीं असली साथी 
ऐसे बस कुछ ही होते हैं 
सबको नहीं आता साथ निभाना 
वैसे भी सृष्टि का नियम है 
मिलना और बिछुड़ना 
आना और जाना 
यह नवीन सृजन की मांग है 
पतझड़ होगा तभी तो वसंत आएगा 
पुराना जाएगा तभी तो नया आएगा 
संबंधों पर भी यही बात लागू होती है 

वक्त

सुना है वक्त एक सा नहीं रहता 
बदलता जरूर है 
इस बदलने की प्रक्रिया में न जाने क्या-कुछ छूट जाता है 
कभी - कभी तो ठहर ही जाता है 
यह ठहराव बहुत इंतजार करवाती है 
तब वक्त भी वह नहीं रहता जैसा पहले था 
वक्त की ये भी तो खासियत है 
गया वक्त वापस नहीं लौटता 
अंधकार की सुबह भी निश्चित ही है 
पर उसमें भी ग्रहण लग जाता है 
वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता 
पर वक्त पर वक्त भी तो नहीं रहता 

हिन्दी दिवस की शुभकामना

14 सितम्बर हिन्दी-दिवस 
सब मना रहे हैं  हमारी अपनी भाषा है 
हमारी पहचान है 
सत्य यह भी है 
हम बात हिन्दी की करते हैं लेकिन अंग्रेजी हर जगह छायी है
वह अपना विस्तार भी करती जा रही है
ग्रामीण अंचल में भी लोग अंग्रेजी माध्यम में भेजना पसंद कर रहे हैं 
वास्तविकता तो स्वीकार करना पडेगा 
अंग्रेजी रोजी - रोटी की भाषा है
साथ- साथ एक और विवाद छिडा है
भारत और इंडिया नाम को लेकर 
इंडिया नाम हमको नहीं चाहिए क्योंकि वह अंग्रेजी है
नाम नहीं चाहिए अंग्रेजी भाषा चाहिए 
अंग्रेज तो चले गए, अंग्रेजी रच - बस गयी है 
नींव रख कर गए है जो वह बहुत मजबूत है
हिन्दी क्या सारी भारतीय भाषाओं का कमोबेश यही हाल है
तब हिन्दी का क्या ??
उसका महत्व बताना पडेगा 
अंग्रेजी को तो छोड़ नहीं सकते 
लेकिन अपनी भाषा को भी न छोड़े 
जो अपनी माता का आदर न करें और दूसरों की माता का 
उसका क्या फायदा 
हिन्दी हमारी अपनी है
उसे बोलने में शर्म नहीं गर्व महसूस करें 
यह हमारे राष्ट्र की पहचान है
उसको कायम रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी है ।

Sunday, 13 September 2026

विधाता का विधान

जन्म और मृत्यु??
किसी का आगमन किसी का प्रस्थान 
किसी की ऑख खुली 
कोई हमेशा के लिए सो गया 
किसी पर गाजे - बाजे और बधाई 
किसी पर चार कंधों का सहारा 
किसी पर हंसी - खुशी 
किसी पर रूदन - दुख 
किसी से आशा - आकाक्षा 
किसी से घनघोर उदासी - निराशा 
किसी के आने की प्रतीक्षा 
किसी के जाने की प्रतीक्षा
किसी के आने से हर्ष की लहर
किसी के जाने से गमगीन सब
आने पर खुशी से भोज बरही बारह दिन पर
जाने पर भी दुख में भोज तेरही तेरह दिन पर
एक गर्भ से बाहर आ रहा 
एक इस लोक से बिदा ले रहा 
इस आवागमन को रोका नहीं जा सकता 
सब ऊपर वाले के हिसाब से 
बड़े - बड़े शूरमा  कुछ न कर पाए 
स्वर्ग तक की सीढ़ी बनाते - बनाते स्वर्ग की राह हो लिए 
इच्छामृत्यु का वरदान पाकर भी मृत्यु को वरण कर लिया 
अश्वत्थामा भी यहाँ कोई नहीं बनना चाहता 
जीना सब चाहते हैं 
अमरता कोई नहीं 
यही प्रकृति का नियम है 
एक भूतकाल है 
दूसरा भविष्य की धरोहर है 
आते हैं सब रोते हुए 
जाते हैं रुलाते हुए 
सबका अंत होना निश्चित है 
यह विधाता का विधान है 
जिस पर किसी का कोई वश नहीं