Sunday, 9 August 2026

सब पर जाहिर न करें

थोड़ा धूप अपने लिए भी छुपा रखना 
न जाने कब उसकी जरूरत पड़ जाए 
थोड़ी यादें मन के एक कोने में दबाकर रखना 
न जाने कब मन उसमें रमने का मन करें 
कुछ बातें अपने मन में छिपा कर रखिए 
समय आएगा तो बताना अभी इतनी जल्दी क्या है 
हर खुशी दूसरों के सामने जाहिर न करें 
क्या जाने किस की बुरी नजर लग जाए 
अपनी बातें अपनी यादें 
अपना सुख - दुख अपने तक सीमित रखिए 
ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता क्या है 
जीवन व्यक्तिगत है सार्वजनिक नहीं 
हर बात का ढोल बजाना 
उचित नहीं 
यहाँ सब आँख गड़ाए बैठे हैं 
घात लगाए बैठे हैं 
शिकारी जैसे शिकार पर झपट्टें को तैयार हैं 
बस कुछ सुनने में आना चाहिए 
बाकी सब तो वो खुद कर लेंगे 
एक चेहरे पर कई मुखौटें लगाए हुए हैं 
चेहरे पर मुस्कान दिल में जहर भरे बैठे हैं 
पग - पग पर सांप और बिच्छू सरीखे 
डंक मारने - डसने को तैयार हैं 
उनको मौका क्यों देना है 
थोड़ा चालाक भी बनना है 
हमारा सब हमारे तक ही सीमित रहे 
सब पर जाहिर न हो 

Saturday, 8 August 2026

वह बहुत अच्छा है

वह कहती अक्सर अपने सहेलियों से 
अपने परिवार- रिश्तेदारों से 
उसका लाईफ पार्टनर बहुत अच्छा है 
उसकी सब जरूरतें पूरी करता है 
हर फर्माइश पूरा करता है 
सर ऑंखों पर बिठाकर रखता है 
किसी चीज की कमी नहीं होने देता 
बस वह अपनी ईच्छा से कुछ नहीं कर सकती 
कोई निर्णय नहीं ले सकती 
कहीं आ - जा नहीं सकती 
किससे बात करनी किससे नहीं 
किससे दोस्ती करनी किससे नहीं 
कपड़े कैसे पहनना कैसे नहीं 
खाना क्या बनाना क्या नहीं 
यह सब वह डिसाइड करता है 
हाॅ वैसे वह बहुत अच्छा है 
दिल का साफ है 
बस कभी-कभार गुस्सा आ जाता है 
हाथ उठा देता है 
लग जाए ज्यादा तो डाॅक्टर के पास ले जाता है 
देखभाल करता है 
दवाई अपने हाथ से खिलाता है 
हाॅ वैसे वह बहुत अच्छा है 
बस उसको जो करता है करने दो 
उसको रोको - टोको मत 
सलाह मत दो 
उसे पसंद नहीं किसी की बात सुनना 
उससे बस काम की बात हो तो करो 
अन्यथा उसे कुछ सुनने में रूची नहीं 
उसकी बात चुपचाप सुन लो 
अपनी बात मत रखो 
तुम हमेशा हंसती रहो 
वह गुस्सा हो , जलील करें तब भी 
तुम्हें रूठने - नाराज होने का हक नहीं 
किसी को मनाना उसकी फितरत नहीं 
उसकी हर बात पत्थर की लकीर
समझौता उसके स्वभाव में नहीं 
आर या पार
थोड़ा डर कर रहो 
मुंह बंद कर रहो 
आज्ञानुसार चलो 
हाॅ वह बहुत अच्छा है 
बस उसको जानने - समझने की जरूरत है 
एक बार समझ लो ऐसे व्यक्ति को 
फिर सब कुछ अच्छा 
जीवन जेल में कैदी जैसा हो तो क्या हुआ 
खाना - पीना मिल रहा है 
आराम से जीवन यापन हो रहा है 
और क्या चाहिए 
तभी तो सबसे कहती फिरती है 
वह बहुत अच्छा है 

Friday, 7 August 2026

साड़ी से परहेज ???

समय बदलता है 
एक वक्त जो जरूरी लगता था आज वह भार लगता है 
वह है उसमें से एक साड़ी 
जो धीरे - धीरे हो गई भारी 
कभी बहाने बनाए जाते थे 
अवसर ढूंढा जाता था 
अवसर की  दुहाई देकर नई साड़ियाँ खरीदी जाती थी 
आज वह साड़ी अलमारी की शोभा बढ़ा रही है 
अब न पहनने के सौ बहाने ढूंढे जाते हैं 
एक समय की पसंद आज नहीं भाती 
मन से उतर रही है 
कारण कुछ भी हो लेकिन यही हो रहा है 
ऐसा लगता है 
यह धीरे- धीरे लुप्त हो जाएगी 
व्यक्ति का स्वभाव है 
जो उसे आरामदायक लगे 
कम्फरटेबल महसूस हो 
इसका एक अनुभव स्वयं का 
हमारे कार्यस्थल में कभी साड़ी अनिवार्य थी 
कुछ सालों बाद लोगों की मांग 
आना - जाना , भागा - धापी , बारिश 
बड़ी मुश्किल होती है 
परमीशन मिल गई 
अब आलम यह है 
नोटिस आती है कि कल यह पोग्राम है 
साड़ी पहनना है 
सबने सलवार- सूट को अपना लिया 
क्या नये क्या पुराने 
संस्कृत हमारी अपनी भाषा है 
पर वह आज मरने की कगार पर है 
सांस ले रही है क्योंकि वह आम आदमी के लिए क्लिष्ट है 
वही हाल साड़ी का हो रहा है 
यह हमारी भारतीय पहचान है 
फिर भी छूटी जा रही है 
साड़ी का स्थान दूसरे परिधानों ने ले लिया है 
सभी को कम्फर्ट जोन चाहिए 
साड़ी उसमें फिट नहीं बैठती है 
उसको भी कुछ तो बदलना पड़ेगा 
तभी शायद वह स्थान ले पाएगी 
हम जानते है और मानते भी हैं 
साड़ी तो अपने आप में बेमिसाल है 
उसके जैसा परिधान कोई नहीं 
फिर क्यों पकड़ छूटती जा रही है 
कभी शरीर की शोभा बनने वाली 
अलमारी की शोभा बढ़ा रही है 
यह हमारी पहचान है 
इसे इस तरह से उपेक्षित नहीं करना है 
पहनिए सब 
पर साड़ी से परहेज न हो 

Thursday, 6 August 2026

यही तो है संसार

सांझ होने की तरफ
सूरज धीरे - धीरे ढलान पर
बहुत समय लग रहा है 
सब इंतजार में हैं 
कब इनका प्रस्थान हो 
आभा कम हो रही है 
जाते - जाते मद्धिम होते जाते हैं 
प्रकाश धीमी गति लेने लगता है 
अंधकार का साम्राज्य घिरने वाला है 
प्रतीक्षारत में सब
कभी प्रकाश का स्वागत 
कभी अंधकार का इंतजार 
इनके बीच में जग डोलता 
कभी उजाला कभी अंधेरा 
जीवन का यही है खेला 
यही तो है संसार