Monday, 18 May 2026

मां उदास है

माॅ है कि वह खुश नहीं रहती
जब देखो उदास
ऑखों में ऑसू
क्या कमी है
समय पर खाना पीना
दवाई और जरूरत का सामान
वैसे ज्यादा किसी चीज की जरूरत नहीं है
फिर ऐसा क्यों ??
माॅ के मन को कैसे समझेगा कोई
उसे प्यार चाहिए
सम्मान चाहिए
अपनापन चाहिए
बतियाना चाहिए
वह तो मिलता नहीं
सब अपना कर्तव्य निभा रहे हैं
मैने भी तो कर्तव्य निभाया है 
खुशी खुशी
बडा किया
लिखाया पढाया
आत्मनिर्भर बनाया
पर कभी जताया नहीं
बच्चों की खुशी के आगे स्वयं को तवज्जों नहीं दी
रसोई में लगी रही
सुस्वादु भोजन बनाने में
फरमाइश पूरा करने में
बच्चों को खाते देख स्वयं तृप्त
आज तो मेरे चेहरे की तरफ भी देखने की फुर्सत नहीं
बात करने की तो छोड़ो
समय नहीं है
यह तो बहाना है
अगर चाहे तो समय क्यों नहीं
सब काम समय से
बस मेरे पास दो घडी बैठने का समय नहीं
मैने तो अपनी जिंदगी न्योछावर की है
तुम लोग थोड़ा सा समय नहीं दे सकते

Saturday, 16 May 2026

परिवार

परिवार  तो परिवार  होता है
अपने  तो अपने  होते हैं 
नोक - झोंक  , लडाई  - झगड़ा 
यह तो होता  ही रहता है
इनके  बिना तो जीने का मजा भी जाता रहता है 
प्रेम  और अपनापन  भी होता है
संपूर्ण  अधिकार  होता है
जताना और बताना नहीं  पडता 
मन की डोर एक - दूसरे से बंधी रहती  है 
हर रिश्ते का एक नाम होता है
ननिहाल  ,ददिहाल, मायका ,ससुराल 
एक माता का और एक पिता का
दोनों  के रिश्तों  से बंधे सारे रिश्ते 
चचेरा ,ममेरा  ,फुफेरा 
सब रक्त  संबंधों  में  लिपटे
इनको अपने आप से लिपटाना 
संबंधों  की  अहमियत  समझना 
इनको जीवित रखना
अगर वेंटिलेटर  पर है
सांस है तब मरने नहीं  देना है
अभी भी बचाया जा सकता है
कुछ  भूले कुछ  याद करें 
खट्टी  मीठी यादों  में  विचरण  करें 
कडवाहट  को  दूर करें 
चार दिन की जिंदगी 
इसके दायरे को असीमित  करें 
अपने ही परिवार  नहीं  औरों  को भी  साथ जोड़े 
जोड़ने  में  जो मजा वह तोड़ने  में  कहाँ 
मिलने में  जो आनंद  हैं  वह बिछुड़ने  में  कहाँ
अपनाने में  जो मजा है वह छोड़ने  में  कहाँ 
सबको साथ लेकर चलने में  जो मजा वह अकेले में कहाँ

Tuesday, 12 May 2026

समय बड़ा बलवान

आज जब समय कुछ नासाज है
तब लगता है
हमारी आवश्यकताए क्या है
सबसे बडी प्राथमिकता पेट भर भोजन
रहने को छत
पहनने के लिए कुछ कपड़े
घर में है
इसलिए ताम झाम नहीं
जीवन सरल और सादा भी हो सकता है
सब कुछ बटोरता है 
साथ कुछ नहीं ले जाता
सब यही रह जाता है
यादें भी धीरे-धीरे धूमिल पड जाती है
दिन  , महीने और ज्यादा हुआ तो कुछ वर्षों तक
अपनों को छोड़कर
पर वहाँ भी जब नई पीढ़ी का प्रवेश होता है
तब उनको उससे कोई सरोकार ही नहीं
क्योंकि वे उस इंसान से अनभिज्ञ होते हैं
उन्हें क्या मतलब किसने क्या त्याग किया
समय के साथ तो सत्य की परिभाषा भी बदल जाती है
आज गाँधी और नेहरू पर भी ऊंगली उठाई जा रही है
वे कितने साल जेल में रहे
क्या क्या किया
वह कोई मायने नहीं
और यह केवल एक की बात नहीं
पूरे विश्व में ही है यह नजरिया
दीवार टूटी
मूर्ति ढहा दी गई
वर्तमान ही सत्य है
जो हो रहा है
कल कोई आपको याद नहीं रखेंगा
वह परिवार हो 
वह समाज हो
वह व्यक्ति हो
देश हो
सब भूला दिया जाता है
योगदान भूला दिया जाता है
सही है न
    सिकंदर ने पौरंष से की थी लडाई
तो हम क्या करें

Sunday, 10 May 2026

मेरी मां

मैंने उस फौलाद को देखा है 
जो लाख आंधी - तूफानों में भी डटकर खड़ी रही 
कभी हार नहीं मानी 
मेहनत को उसने अपना भाग्य बनाया 
हमेशा सबको देती रही 
हर सुख - दुख में सबके साथ खड़ी रही 
कभी उसके मुख से तेज आवाज भी नहीं सुनी 
कभी अपने बच्चों पर हाथ भी नहीं उठाया 
बच्चें ही उसकी पूंजी असली धन 
वह ज्यादा पढ़ी - लिखी नहीं 
तब भी ककहरा तो उसने ही सिखाया 
शिक्षा को सर्वोपरि माना 
बच्चों के लिए सपना ही नहीं देखा उन्हें साकार भी किया 
वह देहात - गांव की थी 
फिर भी कभी उसके मुख से एक फूहड़ शब्द या ताने नहीं सुने 
न हमको कभी सिखाया 
वह बाहर की दुनिया से अंजान रही 
रसोई में ही उसकी दुनिया सिमटी रही 
अन्नपूर्णा का साक्षात अवतार 
कभी उसके दर से खाली पेट कोई नहीं गया 
सबको देती रही उसके बदले शायद उसको कभी कुछ मिला नहीं 
ईश्वर पर अपार आस्था 
कुछ ऐसे अवसर भी आएं जीवन में 
जहाँ उसे टूटना चाहिए था 
बिखरना चाहिए था 
वह तब भी वैसे ही अडिग रही 
उसने अपनी बांहों पर भरोसा किया 
जितना प्यार देना था दिया 
वह पैसे से भले संपन्न नहीं थी मन से तो बहुत थी 
गजब का साहस और हिम्मत 
पूरे परिवार की धूरी 
अपने दम पर परचम फहराने वाली 
उस घरेलू और हिम्मती मां को मैंने देखा है 
बेटी - बहन - बहू - भाभी - चाची - दादी - नानी - मामी - फुआ 
हर रिश्ता क्या बखूबी निभाया 
कभी किसी के मुख से मां के बारें में कुछ अनुचित सुना नहीं 
दुश्मन को भी ऊंचा पीढ़ा देने की बात करना 
अनगढ़ पत्थर को भी तराश कर रूप देना 
नारी के सारे गुण 
स्नेह - दया - प्रेम - त्याग- सौंदर्य की मूर्ति 
सादा जीवन उच्च विचार धारण करने वाली 
अपने आंसू को अस्र बनाने वाली 
उस फौलादी मां को सलाम 
एक चुप्पा सौ को हराए का सिद्धांत 
हमें कभी-कभार कोफ्त होता था 
पर यह उसका अपना जीने का अंदाज 
कभी न किसी के सामने हाथ फैलाया न मांग की 
समय फिर भी बड़ा बलवान है 
उम्र के आखिरी कगार पर है 
देख कर दुख होता है 
मां का बुढ़ापा 
सहन नहीं होता है 
उसे उसके उसी फौलादी रुप में देखने की आदत जो है 
मैं तुम्हें क्या दूंगी 
जो कुछ भी हूँ वह तो तुम्हारें ही कारण हूँ 
तुम्हारा अंश हूँ 
कुछ प्रतिशत भी वैसे हो जाए तो खुशनसीबी हमारी 
तुम्हारें बारे में कुछ कहना या लिखना 
सूर्य को दीया दिखाना हुआ 
बहुत दिया तुमने 
बहुत बांटा प्रेम और अपनापन 
अब तो ईश्वर तुम्हारी भक्त तुम पर ही निर्भर 
बहुत कुछ विस्मरण होने लगा है 
भूलने लगी है 
शायद यह अच्छा भी है 
दुखद स्मृतियां जुड़ी है 
बस अपने बच्चों को मत भूलना 
हमेशा सुबह चार बजे भोर में प्रार्थना करती रहती थी 
वह क्रम कभी न टूटे 
क्योंकि तुम कहती थी ना 
मेरे बच्चों को कोई प्रेम दे या न दें 
मैं कोई कमी नहीं होने दूंगी 
फर्श से लेकर अर्श तक खड़ा करने वाली माता 
तुम्हें शत शत प्रणाम