Monday, 6 July 2026

माझी

अपना माझी खुद ही बनना होगा 
जीवन नैया को मझधार से निकाल 
किनारे पर खुद ही लाना होगा 
पतवार खुद ही चलाना होगा
नहीं कोई आएगा 
खुद ही नैया पार लगाना होगा 

अच्छा होना

क्या अच्छा होना गुनाह है 
अच्छाई ही हमेशा परेशान होती है 
उसमें उसका क्या दोष 
इसका हल क्या 
क्या अच्छाई छोड़ दें 
यह भी नहीं होगा 
संस्कार ही ऐसे नहीं है 
तब रहना तो है इसी संसार में 
सही है 
तब भी शुक्रिया करो उस ईश्वर का 
जिसने तुम्हें ऐसा मन दिया है 
तुम अच्छे हो 
किसी के बारे में बुरा नहीं सोचते 
न करते हो 
न बदला लेते हो 
न अपशब्द कहते हो 
न बद्दुआ निकलती है 
इससे अच्छा और क्या 
तुम अपना काम करो 
सब बुरे नहीं है यहाँ भी 
अच्छे लोगों की बदौलत दुनिया टिकी है 
राम भी यही और रावण भी यही 
चुनाव तुम्हारा है 
क्या बनना है 

Sunday, 5 July 2026

मेरी अम्मा का मजबूत शस्त्र

अम्मा कब रोती नहीं ??
बचपन से देखा 
ऑख में ऑसू ही गाहे - बगाहे 
कारण कभी-कभार पता भी नहीं चलता था 
दुख और पीड़ा में तो रोती ही 
खुशी के पल में भी ऑसू छलक जाते थे 
कभी अतीत को याद कर रोती 
कभी अपनों को याद कर रोती 
कहती कुछ नहीं बस ऑसू छलकाती  
कभी हमारी गलती पर रोती 
न डाटती न मारती बस रोती 
और हम गलती करने पर पछताते 
बड़ी ताकत है इन ऑसूओं में 
आज भी बात करती मोबाइल पर तब रोती 
यह एक इमोशनल ब्लेकमेल जैसा हुआ 
अब तो ऐसा लगता है 
कभी हंसते हुए देखा नहीं 
रोता देख कभी अच्छा नहीं लगता 
फिर एक दिन समझ आया 
रोना मतलब नार्मल है 
न रोये तो खतरा है 
क्या मां ऐसी ही होती है 
आशीर्वाद देते भी ऑख में पानी भर आना 
कभी बच्चों को याद कर रोती है 
कभी उनकी चिंता में ईश्वर से प्रार्थना कर रोती है 
ईश्वर भी उसके ऑसूओं पर पसीज जाता होगा 
कहते हैं जहाॅ 
शब्द असमर्थ हो जाते हैं वहाँ ऑंसू काम आते हैं 
बड़ी ताकत है इन आंसुओं में 
मैं भी मां हूँ पर अम्मा जैसी नहीं 
यहाँ ऑंसू कम गुस्सा ज्यादा 
शब्द ज्यादा 
जो कभी-कभार बात को बिगाड़ भी देते हैं 
अम्मा के ऑंसू का पावर
अब भी है बरकरार 
सब हो जाते उसके आगे निरूत्तर 

विधवा ???

विधवा ??
विधवा यह शब्द चुभता है
असहायता का प्रतीक  लगता है
विधवा शब्द सुनते ही
एक मुर्ति  जेहन में उभरती है
रंगहीन जीवन का
सफेद साडी में लिपटी 
न हाथ में चूडियां 
न माथे पर बिंदी 
न गले में मंगल सूत्र 
न मांग में सिंदूर 
न शरीर पर गहना
रंगों  से टूटा नाता
रंगहीन जीवन 
यही था विधवा का रूप
पति ही परमेश्वर 
वह नहीं तो सब सून
इसलिए सती हो जाओ
आग में जल जाओ
मरना आसान था जीना मुश्किल 

आज समय बदला 
अब वह हालात वह विचार न रहें 
अब उसको भी जीवन जीने का  हक
पहनने - ओढने  
खाने - पीने
घूमने- फिरने की आजादी 
वह अब सक्षम है 
उसका जीवन पति के साथ खत्म नहीं हुआ है
वह विधवा है इसलिए दया का पात्र है
यह न समझा जाएं 
जमाना बदला है
तब नजरिया भी बदला जाएं 

विधवा शब्द को ही भूला दिया जाएं 
विधवा है
परित्यक्ता  है
इन शब्दों की जरूरत ही क्या है
बस व्यक्ति ही रहने दिया जाएं 
लाचारी और विवशता तथा सहानुभूति 
इसकी कोई आवश्यकता नहीं 
वह पैरों पर खड़ी हो
आत्मनिर्भर हो
केवल ब्याह - शादी के मापदंड पर न मापा जाएं।