Friday, 18 September 2026

अंदर - बाहर

बाहर कितना कुछ बदला 
लोग बदले 
परिस्थिति बदले 
अंदर कितना बदला 

बाहर सब दिखावा है 
एक तरह का छलावा है 
अंदर का अंदर रह जाता है 
बाहर कभी आ ही नहीं पाता 
बंधनों में बंधा 
यह अंदर - बाहर 
कभी एक सा हो नहीं पाता 
एक - दूसरे से मिल नहीं पाता 

खुशी ???

रिश्ता तो था बहुत खास 
खास बात नहीं समझ पाए 
कुछ बहुत अपने होते हैं 
फर्क इतना कि 
उनसे अपने मन की बात नहीं कह पाते 
कहने जाए तो सुनना भी नहीं चाहते 
उनके लिए यह सामान्य सी बात है 
सबकी परिस्थिति एक सी होती नहीं 
यह बात हमको भी पता है 
हंसो - खिलखिलाओ 
पार्टी मनाओ 
इससे खुशी नहीं मिलती 
चार घड़ी बैठ कर बात करने का 
सुख - दुख बांटने का समय नहीं 
उस झूठमूठ की हंसी में रूदन अंदर ही अंदर टीसता रहता है 
कब तक बनावटी रहेंगे 
मन की भावना चेहरे पर आ ही जाती है 
तब सब फिजूल लगता है 
मन खुश तो सब खुश 
मन नहीं खुश तो सब फीका 
स्वयं खुश रहें तभी दूसरों की खुशी भी भाती है 

क्या गम है तुम्हें 
इसकी किसी को क्या खबर 
सब अपनी खबर बताने में मशगूल 
किसी को क्या पड़ी 
तुम्हारी खैरियत की 

यह रह गया - वह रह गया

वैसे जीवन में बहुत ज्यादा महत्वकांक्षा कभी रही नहीं 
जो मिला जैसा मिला बस उसी में संतोष कर लिया 
ऐसा नहीं था कि आसपास ऐसे लोग नहीं थे 
सहकर्मीं नहीं थे दोस्त नहीं थे 
पर पता नहीं स्वभाव ही ऐसा था 
किसी चीज ने आकर्षित नहीं किया 
न सजने संवरने का शौक 
न मंहगे - कपड़ो- गहनों का शौक 
न गाड़ी - बंगले का शौक 
न मंहगे होटल में खाना और घूमने का शौक
एक अदद साधारण सी जिंदगी जी मैंने 
शायद परवरिश भी उसी तरह हुई 
हाॅ कभी पीछे मुड़कर देखती हूँ 
तब कहीं न कहीं कुछ छूटा सा लगता है 
जो उस समय नहीं लगा 
बच्चों को भी उसी हिसाब से ढाला 
ऐसा नहीं था कि कंगाली थी 
शौकीन लोग कर्ज लेकर भी शौक पूरा करते हैं 
मैं पता नहीं किस मिट्टी की बनी हुई 
कभी-कभार वैसे अवसर भी मिले 
पर मैंने उसका लाभ नहीं उठाया 
आज जब सब है 
तब न वह उम्र बची है न वैसी शक्ति
शौक जरूर रखे 
उसे पूरा भी करें 
ज्यादा नहीं सीमा में 
अपने बच्चों की इच्छाओं को भी मारे नहीं 
उनको सब भरपूर अपनी सामर्थ्य नुसार देने का प्रयास करें 
ताकि जब अतीत को देखे तो आपको मलाल न हो 
अरे यह रह गया 
वह रह गया 

Thursday, 17 September 2026

ठहराव

कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है 
अपनों को छोड़कर दूर जाना पड़ता है 
यही प्रकृति का नियम है 
पेड़ अपने पुराने पत्तें गिराता है 
तभी उसमें नये पत्तें आते हैं 
सांप भी अपनी केंचुली उतार कर नया धारण करता है 
आना - जाना लगा रहता है 
नदी भी पहाड़ को छोड़कर निकलती है 
तभी पूजी जाती है 
जीवनदायिनी बन जाती है 
गोपाल भी गोकुल छोड़कर गए 
द्वारिकाधीश बने 
पांडवों के विधाता बने 
राम वन गए तभी अपना परचम फहराया 
जीवन सजीव है 
चलायमान है 
रूक गया तो वही ठहर गया 
तो चलते रहे 
ऐसे भी यहाँ हमेशा के लिए कोई नहीं आया है 
जीवन भी छोड़ना पड़ता है 
तब गांव क्या 
शहर क्या 
अपने क्या 
दोस्त- रिश्तेदार क्या 
सब छूटते जाते हैं 
नए जुड़ते जाते हैं 
ठहरिए मत 
ठहराव कभी ऊपर नहीं ले जा सकता