Thursday, 18 June 2026

साबित करना पड़ता है

नेपटोजिम कह लीजिए
भाई भतीजावाद कह लीजिए
भाषावाद कह लीजिए
जातिवाद कह लीजिए
प्रांतवाद कह लीजिए
रंगवाद कह लीजिए
यह तो हर जगह विद्यमान है
कोई इससे अछूता नहीं
न फिल्मी जगत
न राजनीति का क्षेत्र
न और कोई जगह
हाँ कहीं कम ज्यादा
पर है तो अवश्य
आज से नहीं 
बहुत पहले से
कोई नेता जब मुख्यमंत्री बनता है
तब अपनी जाति के लोगों को नौकरी की राह आसान कर देता है
कोई नेता जब प्रधानमंत्री बनता है तब अपने गृहक्षेत्र का विकास
कहीं इंटरव्यू में उन्हीं को प्रधानता जो उसी प्रांत के है
उनके भाषाभाषी है
पर लोगों ने अपना स्थान बनाया है अपनी काबिलियत से
ऊपर भी पहुंचे है
जो आपको पसंद नहीं करते उनके भी दिलों आ जगह बनाई है
यहाँ तो सबको आसानी से सब कुछ हासिल नहीं होता
वैसे तो कुछ ही भाग्यवान होते हैं
हमको तो खुद हमें साबित करना है 
हम क्या है
जब रेल में लोकल ट्रेन में धक्का मुक्की कर घुसते हैं तब कोई नहीं चाहता
आप अंदर आए
पर आप धकेल धुकुल कर अंदर आते हैं
लोगों को गुस्सा भी आता है जैसे ट्रेन उनके बाप की हो
हिकारत से देखते हैं
मजाक उड़ाते हैं
बैठने को जगह नहीं देते हैं
पर कुछ ही दिनों बाद ये आपके दोस्त बन जाते हैं
आप कहीं भी जाइए
आपका बांहे फैलाकर कोई स्वागत नहीं करेंगा
आपको बताना पडेगा
आपको समझाना पडेगा
भाई मैं ऐसा हूँ
मुझमें यह काबिलियत है
कभी-कभी सालों लग जाते हैं
कुछ समझ पाते कुछ नहीं
क्या फर्क पडता है
आप नीरमा थोड़े ही हैं जो सबकी पसंद हो
यह तो होता है
हमारे साथ भी हुआ है
आपके साथ भी हुआ होगा
कितने तो मूर्ख ही सिद्ध कर देते हैं
पर आप तो हो नहीं
कोई सीढी लगाने वाला नहीं 
खेचने को तैयार रहते हैं
कोई बात नहीं
आप अपना काम कीजिए
उनको उनका काम मुबारक

Monday, 15 June 2026

थोड़ा ठहर जाओ

थोड़ा रूक जाओ 
थोड़ा ठहर जाओ
थोड़ा इंतजार भी कर लो
जल्दबाजी क्या है
जाना तो है सबको ही
थोड़ा सोच लो
क्या बस यही एक रास्ता
इतनी मेहनत 
इतनी कामयाबी
शोहरत - दौलत भी
दिमाग बुद्धि भी
शिक्षा भी
कितनी मेहनत लगी होगी
यह सब हासिल करने में
चौंतीस साल लग गए
नष्ट करने में चौंतीस सेकंड भी नहीं
इतना स्वार्थी कैसे हो गए
बस अपनी सोचा
अपना परिवार
माता-पिता
भाई - बहन
शिक्षक - पाठशाला
दोस्त - मित्र
पडोसी - समाज
सबका हक
यह जिंदगी केवल तुम्हारी नहीं
सबकी मेहनत 
सबका प्रयास
सबकी आशा
इसे खत्म करने का हक केवल तुमको नहीं
जब मन में आए 
यह ख्याल
तब थोड़ा थमो
पीछे मुड़कर देखों
मैं नहीं तो 
उनका क्या
जिनकी जान हूँ मैं
तब उनकी जान लेने का हक तुम्हें अकेले नहीं
जीते जी उनको जीवित लाश बना देना
इससे बडा पाप कोई नहीं
न अपने लिए जीओ
अपनों के लिए तो जीओ
बहुमूल्य जीवन को इस तरह से खत्म तो न करों

Sunday, 14 June 2026

पहले वाली बात नहीं रही

समय बदल गया है
उम्र ढल गई है
अब वह पहले वाली बात नहीं रहीं
तब बात बात पर झगड़ा करते थे
रूठते थे और मनाते थे
सैर पर निकलते थे
मीलों चलते थे
घंटों बतियाते थे
झटपट झटपट काम कर डालते थे
किसी का मुंह नहीं ताका करते थे
ढेरों कहानियाँ और उपन्यास पढते थे
कभी-कभी तो पूरा करके ही दम लेते थे
क्या रात और क्या दिन
घंटों सोते थे
जी भर कर हंसते थे
मन भर कर खाते थे
चाट पकौड़ी और भेल
किसी की परवाह न करते थे
बस अपनी धुन में मस्त रहते थे
ज्यादा सोचते नहीं थे
जो समझ आता वहीं करते थे
आज वह पहले वाली बात नहीं रहीं
अब तो बंदिशो में जकड़ी जिंदगी
समय से उठना
समय से खाना
समय से सोना
समय से बाहर निकलना
ज्यादा पढना नहीं
दिमाग पर जोर डालना नहीं
खाने में परहेज करना
हम तो वही है जो थे
अब वह पहले वाली बात नहीं रहीं
अब केशों में सफेदी
ऑखों पर चश्मा
कदमो का लडखडाना
बोलने में अटकना
लगता है अब हिम्मत नहीं बची
अब हर बात में सोचना और समझना है
हर कदम को सावधानी से उठाना है
समय बदल गया है
उम्र ढल गई है
अब वह पहले वाली बात नहीं रहीं

Saturday, 13 June 2026

वैसा गांव तो नहीं है

हम तो आए थे अपने घर
महसूस हुआ 
वह घर नहीं
जो हम छोड़ गए थे
वह गांव नहीं 
जो हम छोड़ आए थे
अब तो यहाँ भी अपनापा
भाईचारा तो है गायब
घर में ही सब अलग अलग
तब एक कमाता था
खाते सब समान थे
सबका हक उतना ही
आज वह बात नहीं
अब यहाँ भी पैसा बोलता है
आमदनी के हिसाब से
रिश्तों का मूल्य
अब नहीं कोई जाता किसी के द्वार
अब तो द्वार भी सूनसान
सब अपने अपने घरों में
नीम के नीचे नहीं
अब पंखे की हवा भाती है
खाना सब एक साथ नहीं
अपने अपने कमरों में खाते हैं
नहीं बतियाता कोई
सब मोबाइल में मशगूल
नई बयार है
नया जमाना है
नए-नए शौक है
अब बारात में वह बात नहीं
आना और जाना 
बस रस्म निभाना
किसी के पास समय नहीं
अब घर के बुजुर्गों का वह रूतबा नहीं
वह तो किसी एक कोने में चारपाई डाल पडे हुए
कहने को तो सब संयुक्त है
पर सब अलग अलग
अब दातून नहीं ब्रश है
अब पोखर नहीं हैंडपम्प है
अब मिट्टी के बर्तन 
पीतल तांबा कांसा नहीं
चमचमाता स्टील है
अब राख से नहीं रगडना
साबुन से चमकाना है
सबको शहर प्यारा है
गाँव में रहना नहीं गंवारा है
अब तो कुछ बचे खुचे हैं
खेती क्यों करें
अब तो मनरेगा है
सस्ता अनाज
गेहूं चावल 
ऊपर से बैंक में आता सरकारी रूपया
बिजली और गैस मुफ्त
कर्ज लेना मजबूरी नहीं शौक
आज नहीं तो कल माफ
साइकिल और पैदल तो दूर
अब सबके पास मोटरसाइकिल है
क्या जरूरत काम की
रहना है आराम से
वह गाँव जो हम  छोड़ आए थे
वह ऐसा तो नहीं था