Sunday, 26 July 2026

स्त्री-पुरुष

श्रंगार कि संघर्ष 
कामकाजी या घरेलू 
भागती - दौड़ती या आराम पसंद 
तेज तर्रार या सीधी सादी 
विरोध में खड़ी होने वाली या हर बात में सहमति 
आत्मनिर्भर या दूसरों पर निर्भर 
पढ़ी - लिखी या अनपढ़ 
स्वतंत्र या गुलाम 
हार न मानने वाली 
परिस्थिति का सामना करने वाली या फिर कुछ न कर सकने वाली 
निडर या डरपोक 
सुंदर या साधारण 
गोरी या सांवली 
समझदार या लड़ाकू 
आप कैसी स्त्री को पसंद करेंगे 
पुरुष के कंधे से कंधा मिलाने वाली 
अपनी जायज- नाजायज मांग मनवाने वाली 
सुसंस्कृत,  सभ्य और समझदार 
घरनी से घर 
तब उसे चलाने वाली कैसी हो ??
पसंद या नापसंद आपकी च्वाइस 
रहना - निभाना आपको 
तब चुनाव भी गलत - सही जो हो 
उसके जिम्मेदार आप 
और कोई नहीं 

कौन हारा कौन जीता

कौन हारा कौन जीता 
किसका इस्तीफा हुआ 
सरकार झुकी ??
विपक्ष की मंशा पूरी हुई 
आंदोलन खत्म हुआ 
मुद्दा यह नहीं है 
शिक्षा सबका मौलिक अधिकार है 
उस पर सबका हक है 
उसे तो बख्श दिया जाए 
उसमें तो मिलावट न की जाए 
राजनीति न की जाए 
छात्र देश का भविष्य हैं 
उन्हें कमजोर नहीं करना है 
युवा पीढ़ी है 
जब यह आक्रोशित हो जाती है 
तभी क्रांति भी होती है 
सत्ता पलटने की ताकत है इनमें 
न्याय उनका हक है 
वह उनको मिलना चाहिए 
ये वह जोशीले लोग हैं 
जो आगा - पीछा नहीं देखते 
जब अपने पर उतर आए 
इसका एक नमूना तो अभी हमने देखा 
तो इन्हें इग्नोर कर काम नहीं चल सकता 
हाथों में पत्थर होठों पर नारा 
यह उनकी तस्वीर नहीं होनी चाहिए 
इनके हाथ में तो कलम - किताब शोभता है 
लैपटॉप और कम्प्यूटर अच्छे लगते हैं 
मजबूर नहीं मजबूत हो हमारी युवा पीढ़ी 
हमारे कंधे तो झुक रहे हैं 
मजबूती से इनको खड़ा होना है 
हार - जीत मसला नहीं 
योग्यता की कद्र हो 
इसमें कुछ भी आड़े न आए 
न धर्म न जाति न राजनीति

Friday, 24 July 2026

यह वादा रहा

सावन के झूले पड़ने लगे हैं 
सावन आ रहा है 
त्योहारों का मौसम शुरू हो गया है 
आनंद ही आनंद 

हंसी आ गई 
आनंद हो या न हो 
हम इन्हीं के बहाने आनंदित होने की कोशिश करते रहते हैं 
नहीं तो किस बहाने ??

लगता है 
हम जिंदगी को धता बता रहे हैं 
कह रहे हैं 
तू कितना भी झूला झुला ले 
हिचकोले खिलवा ले 
हम भी हार मानने वालों में नहीं 
चढ़ाव - उतार तो आते रहेंगे 
हम भी झूलते - झूलते 
जीवन नैया पार ही लगा लेंगे 
डर के मारे झूले से उतरने वाले नहीं 
यह वादा रहा 

पिता का घर

एक घर पिता का होता है
जहाँ अपनापन और अधिकार होता है
एक घर भाई का होता है
जहाँ हम मेहमान सरीखे होते हैं 
कुछ भी छूने से डर लगता है

एक घर पिता का होता है
जहाँ हम जिद करते हैं 
अपनी बात मनवा कर ही छोड़ते हैं 
खाने में ना - नुकुर करते हैं 
एक घर भाई का होता है
जहाँ हम समझदार हो जाते हैं 
जो मिला वह खा लेते हैं 
ना - नुकुर की कौन कहे 
रसोई में जाने पर भी डर लगता है

एक घर पिता का होता है
जहाँ हम जब चाहे आ - जा सकते हैं 
विचरण कर सकते हैं 
परमीशन की जरूरत नहीं 
एक घर भाई का होता है
जहाँ सोचना पडता है 
मौका और वक्त  देखना पडता है

एक घर पिता का होता है
जहाँ हम राजकुमारी होते है
राजदुलारी  होते हैं 
एक घर भाई का होता है
जहाँ हम सिर्फ उस घर की बेटी होते हैं 
नाज - नखरे नहीं कर सकते
उसे उठाने वाला कोई नहीं 
हर भाई पिता समान नहीं हो सकता

पिता तो पिता ही होता है
उसकी जगह कोई नहीं ले सकता 
न किसी का दिल इतना बडा होता है
अपना सर्वस्व लुटाकर भी हमारे चेहरे पर मुस्कान हो 
यह तो पिता ही कर सकता है।