Sunday, 13 September 2026

विधाता का विधान

जन्म और मृत्यु??
किसी का आगमन किसी का प्रस्थान 
किसी की ऑख खुली 
कोई हमेशा के लिए सो गया 
किसी पर गाजे - बाजे और बधाई 
किसी पर चार कंधों का सहारा 
किसी पर हंसी - खुशी 
किसी पर रूदन - दुख 
किसी से आशा - आकाक्षा 
किसी से घनघोर उदासी - निराशा 
किसी के आने की प्रतीक्षा 
किसी के जाने की प्रतीक्षा
किसी के आने से हर्ष की लहर
किसी के जाने से गमगीन सब
आने पर खुशी से भोज बरही बारह दिन पर
जाने पर भी दुख में भोज तेरही तेरह दिन पर
एक गर्भ से बाहर आ रहा 
एक इस लोक से बिदा ले रहा 
इस आवागमन को रोका नहीं जा सकता 
सब ऊपर वाले के हिसाब से 
बड़े - बड़े शूरमा  कुछ न कर पाए 
स्वर्ग तक की सीढ़ी बनाते - बनाते स्वर्ग की राह हो लिए 
इच्छामृत्यु का वरदान पाकर भी मृत्यु को वरण कर लिया 
अश्वत्थामा भी यहाँ कोई नहीं बनना चाहता 
जीना सब चाहते हैं 
अमरता कोई नहीं 
यही प्रकृति का नियम है 
एक भूतकाल है 
दूसरा भविष्य की धरोहर है 
आते हैं सब रोते हुए 
जाते हैं रुलाते हुए 
सबका अंत होना निश्चित है 
यह विधाता का विधान है 
जिस पर किसी का कोई वश नहीं 

Friday, 11 September 2026

मरने दो ??

मरना तो तय है 
सबको तो मरना ही है एक दिन 
फिर क्या फर्क पड़ता है 
क्यों मरे 
कभी कोचिंग क्लास में आग लगने के कारण 
कभी गेस्ट हाउस के ढहढहाकर गिरने के कारण 
कभी बेरोजगारी के कारण 
कभी रैंगिग के कारण 
कभी गढ्ढे में गिरने के कारण कंस्ट्रक्शन साइट पर
कभी फेल होने पर
कभी अंक कम आने पर
कभी एडमिशन न मिलने पर
कभी किसी दूसरे की बेपरवाही से एक्सीडेंट 
और भी कारण है 
यह हमारा युवा वर्ग है 
देश का भविष्य 
किस राह पर 
समझ नहीं पाए रहा 
उपरोक्त कारण के जिम्मेदार कौन ??
सरकार - प्रशासन??
मरने दो 
पहले ही मर गये ???

Wednesday, 9 September 2026

पाषाण ???

कभी-कभार मन में ख्याल आता है 
पत्थर को कठोर कहा जाता है 
आखिर क्यों ??
वह जो हर परिस्थिति में अडिग रहता है 
जरूरत पड़ने पर अपने को मोड़ भी लेता है 
उस पर छेनी - हथौड़ी चलती है 
उसका कलेजा छलनी होता है 
तब भी वह अपने को उस मूर्ति में ढाल लेता है 
उस पर खुदाई की जाती है 
नाम उकेरे जाते हैं 
अपने को मिटाकर दूसरों का नाम चमकाता है 
मंदिर में स्मारक पर 
टूटता भी है बिखरता भी 
समुंदर के लहरों के थपेड़े सह रेत बन जाता है 
कण - कण टूटता है 
इतना होने पर भी पाषाण है 
कठोर है 
उपमा मिल गया है 
उसको उसी रूप में देखना 
औरों की खातिर 
         उसने स्वयं को मिटाया 
औरों ने उसे पाषाण कहा 
               न जाना उसकी महत्ता 
जो सदियों से अपनी छाती पर 
           उनकी महत्ता दर्शा रहा 

Tuesday, 8 September 2026

पुत्र और पुत्री

कान्हा का जन्म तो सबको याद रहा
याद रहना भी चाहिए 
जगत के पालनहार का जन्मदिन था
उत्सव मनाने का दिन था
उस दिन एक और शिशु का भी जन्म हुआ था
वह थी योगमाया 
कान्हा तो गोकुल पहुँच गए 
मामा कंस के कोप का भाजन बनी थी वह बेटी
जिसने कहा था
तुम्हारा काल तो गोकुल में जन्म ले चुका है
बेटा - बेटी दोनों ही संतान 
तब खुशी के हकदार तो दोनों ही
वह योगमाया ही थी जिनको बदलकर वसुदेव कृष्ण को ले गए थे
कृष्ण की जीवन रक्षा का कारण वह बनी
सबको जीवन देने वाले का जीवन बनी
कन्हैया के साथ उनका भी स्मरण करना जरूरी है 
देवकी की आठवीं संतान तो पुत्र ही था यह तो नियति लिखित था 
कंस वध तो उनके द्वारा ही होना था पर जन्मते तो वध नहीं करते 
मनुष्य लीला करनी थी 
उस दिन भी एक पुत्र को बचाने के लिए पुत्री को सामने किया गया था
दोनों का जीवन बहुमूल्य ही था