Monday, 4 May 2026

सब ठीक है ना

सब कुछ ठीक है
यह छोटे छोटे से शब्द कितना सुकून देते हैं
आई लव यू    से भी ज्यादा
बहुत ताकत है इनमें
अपनों की खैरियत पता चलती है
माँ दूर रहने वाले बेटे से जब पूछती है
बेटा तू ठीक है न
तब माँ के चेहरे पर तसल्ली के भाव आ जाते हैं
ससुराल में नई-नई बेटी से जब माता पिता पूछते हैं
बेटा तू ठीक है न
उसकी हाॅ सुनकर ही अंदाजा लगा लेते हैं
बेटी किस हाल में है
काम पर गए पति को देर होने पर जब पत्नी पूछती है
सब ठीक है न
आज कोई परेशानी तो नहीं
उनकी हाॅ सुनकर वह मुस्कान से भर जाती है
बच्चों को देर हो जाती है कई
स्कूल - कालेज या ऑफिस
बस यही वाक्य सुनने को बेताब रहते हैं
कोई कुछ कर तो नहीं सकता
खुदा नहीं है
पर अपनो की खैरियत की हमेशा दुआ करता है
जब तक घर का हर सदस्य घर नहीं आ जाता
तब तक चैन की नींद नहीं आती
हमारे अपने कहीं भी रहे
सुरक्षित रहे
सब यही चाहते हैं
सब ठीक है
सुनना चाहते हैं हमारे कान
सब कुछ ठीक है
चिंता मत करो
और क्या चाहिए
सब ठीक रहेगा
तभी तो प्यार 'ममता 'और उन्नति होगी
आई लव यू 
कभी-कभी बोला जाता और सुना जाता है
सब ठीक है
यह सुनने और कहने को हम हमेशा तत्पर

Sunday, 3 May 2026

पेट की भूख

भूख तो भूख होती है
वह किसी की भी हो
अमीर की हो
गरीब की हो
पढे लिखे की हो 
अनपढ़ की हो
देशी की हो या विदेशी की हो
पशु की हो
मानव की हो
सारा संसार इसी के इर्द-गिर्द
सारे जतन इसी के लिए
जब पेट की अंतडिया कुलमुला रही हो
तब स्वाद नहीं देखा जाता
पेट किसी तरह से भरे
कुछ भी मिल जाय
बस भूख मिट जाए
आज महसूस हुआ
खाने में थोड़ी देर क्या हुई
भूख से हाल बेहाल हो गया
वही किचन में सब्जी को कलछी चलाते चलाते
दो बिस्किट पानी से गटका
तब जाकर जान में जान आई
याद आई 
उन मजदूरों की जो भूखे हैं
खाने के लिए लाईन लगानी पड रही है
दूसरे पर आसरा
नहीं मिला तो भूखे
ऊपर से बीवी बच्चों के साथ
तब और मुसीबत
सोशल मीडिया पर ऐसे दृश्य देखकर
कलेजा मुंह को आ जाता है
कहावत है न
पेट की भूख जो न कराए

Monday, 27 April 2026

मैं कौन ???

मैं पुरूष हूँ
यह बात तो सौ प्रतिशत सत्य
पर मैं और कुछ भी हूँ
एक पुत्र हूँ
एक भाई हूँ
एक पति हूँ
एक पिता हूँ
और न जाने क्या - क्या हूँ
मेरे पास भी दिल है
मैं कठोर पाषाण नहीं
जो टूट नहीं सकता
मैं बार बार टूटता हूँ
बिखरता हूँ
संभलता हूँ
गिरकर फिर उठ खडा होता हूँ
सारी दुनिया की जलालत सहता हूँ
बाॅस की बातें सुनता हूँ
ट्रेन के धक्के खाता हूँ
सुबह से रात तक पीसता रहता हूँ
तब जाकर रोटी का इंतजाम कर पाता हूँ
घर को घर बना पाता हूँ
किसी की ऑखों में ऑसू न आए
इसलिए अपने ऑसू छिपा लेता हूँ
सबके चेहरे पर मुस्कान आए
इसलिए अपनी पीड़ा छुपा लेता हूँ
पल पल टूटता हूँ
पर एहसास नहीं होने देता
मैं ही श्रवण कुमार हूँ
जो अंधे माता पिता को तीर्थयात्रा कराने निकला था
मैं ही राजा दशरथ हूँ
जो पुत्र का विरह नहीं सह सकता
जान दे देता हूँ
माँ ही नहीं पिता भी पुत्र को उतना ही प्यार करता है
मैं राम भी हूँ
जो पत्नी के लिए वन वन भटक रहे थे
पूछ रहे थे पेड और लताओ से
तुम देखी सीता मृगनयनी
मैं रावण भी हूँ 
जो बहन शूपर्णखा के अपमान का बदला लेने के लिए साक्षात नारायण से बैर कर बैठा
मैं कंडव  त्रृषि हूँ जो शकुंतला के लिए गहस्थ बन गया
उसको बिदा करते समय फूट फूट कर रोया था
मेनका छोड़ गई 
मैं माॅ और पिता बन गया
मैं सखा हूँ 
जिसने अपनी सखी की भरे दरबार में चीर देकर लाज बचाई
मैं एक जीता जागता इंसान हूँ
जिसका दिल भी प्रेम के हिलोरे मारता है
द्रवित होता है
पिघलता है
मैं पाषाण नहीं पुरुष हूँ

Tuesday, 21 April 2026

वक्त और अपने

वक्त के साथ आॅसू भले ही सूख जाए
पर अपनो को भूलाना आसान नहीं होता
चिता के साथ शरीर तो जल जाता है
पर वह अशरीर हमेशा पास रहता है
जिसके साथ जीवन के सुनहरे पल कांटे हो
लडे हो ,झगड़े हो
रूठे हो ,नाराज हुए हो
मानमनौवल किया हो
सुख दुख बांटे हो
हंसा और खिलखिलाया हो
उसकी नादानियो पर मुस्कराया हो
उसकी हर गलती माफ की हो
जम कर गुस्सा उतारा हो
थपेडे दिए हो
गले से लगाया हो
जी भर कर प्रेम लुटाया हो
अपना सर्वस्व लुटाया हो
पूरा अधिकार जताया हो
जिसके अलग होने की कल्पना से ही रूह कांप उठी हो
वह अपना अजीज जब छोड़कर जाता है
तब वह अपने साथ हमारा मन भी ले जाता है
हमें रिक्त कर जाता है
वह घाव दे जाता है
जो कभी नहीं भरता
मन के किसी कोने में छिपा रहता है
समय समय पर टीसता रहता है
यह दर्द हर कोई नहीं समझ सकता
वही समझ सकता है
जिसने अपने को खोया हो