Tuesday, 15 September 2026

बस उसे खुश देखना चाहती हूँ

बेटियां तो बहुत होती है 
पर मेरी बेटी जैसी कोई नहीं 
वह कभी पापा की परी नहीं रही 
न माॅ की नाजुक कोमल गुड़िया 

वह फौलाद सी मजबूत है 
मैं उसको संभालना चाहती थी 
न जाने कब उसने संभालना शुरू कर दिया 
उसका हाथ पकड़कर रास्ता दिखाते कब वह मुझे रास्ता दिखाने लगी 
उम्र से पहले ही समझदार हो गई 
मेरे कंधों के बोझ को अपने कंधों पर ले लिया 

मैंने बहुत से सपने देखे थे 
उसकी राह कभी मुश्किल न हो 
ऐसा सोचा था 
दुनियाभर का हर सुख और खुशी मिले यह हर मां की तरह मेरी भी इच्छा थी 
मेरे जीवन जैसा जीवन न मिले 
कभी लाचार और मायूस न हो 

वैसे हर परिस्थिति पर मात करना सिखाया है 
फूल और नाजुक कली जैसा नहीं पोसा है 
हद दर्जें की मेहनती 
वर्कोहलिक लगती है 
कभी सोचती हूँ 
मैं थोड़ा भी इसकी तरह मेहनती होती 
लोग मां से सीखते हैं 
मैं उससे सीखती हूँ 

माँ भी बन जाती है मेरी 
डरती भी हूँ 
कुछ गलत तो नही कर दिया 
अपने पालकत्व पर अभिमान होता है 
गलत बर्दाश्त नहीं उसे 

बस ईश्वर से यही प्रार्थना 
मैं तो कुछ न कर पाई 
तुम तो अपनी कृपा बनाए रखना 
मेरे जीवन के अच्छे कर्मों का फल उसकी झोली में डाल देना 
मैं और कुछ नहीं चाहती 
बस उसे खुश देखना चाहती हूँ 

आप स्वयं

व्यक्ति कुछ न कुछ करने में लगा है 
उसे अपने से ज्यादा दूसरों की चिंता है 
उसे प्रभावित करना है दूसरों को 
किसी को सुंदर दिखना है 
किसी को धनी दिखना है 
किसी को बुद्धिमान दिखना है 
किसी को शालीन और परोपकारी दिखना है 
किसी को धार्मिक दिखना है 
किसी को कर्तव्य वान बनना है 
किसी को सबकी नजर में अच्छा दिखना है 
सबके लिए तो ठीक है 
अपनी नजर में ??
दूसरों को प्रभावित करने से क्या हासिल होगा ??
हम अपने लिए जीने आए हैं 
ना कि दूसरों के लिए 
लोगों की परवाह करते - करते ऐसा तो नहीं कि हम अपने को पीछे छोड़ रहे हैं 
ये वे लोग हैं जो कभी भी छोड़ सकते हैं आपको 
स्वयं को आगे रखे 
बाकी सबको पीछे 
आप आगे रहेंगे तो सब आएगे पीछे 
आप पीछे रहेंगे तो कोई मुड़कर नहीं देखने वाला 

Monday, 14 September 2026

जो साथ चले थे

साथ चले थे न जाने कितने 
नए भी जुड़े पुराने भी रहे 
सबने अपनी राहें बाद में अलग-अलग कर ली 
पता नहीं कहाँ हैं 
कुछ का पता कुछ का नहीं 
सबकी अपनी जिंदगी 
सबकी अपनी सोच 
सबकी अपनी जरूरतें 
सबकी अपनी मजबूरी 
किसी की नौकरी किसी का परिवार 
किसी का घर किसी का शहर 
समय बदलता है तो लोग भी बदलते हैं 
बचपन से लेकर अब तक न जाने कितने मिले 
कितने बिछुड़े 
उसका हिसाब ही नहीं है 
कुछ जेहन में आज भी है 
कुछ विस्मरण हो गए 
सबका अपना वजूद था 
अपना प्रभाव था 
अंत तक साथ कोई नहीं देता 
अंत तक जो साथ दें बस वहीं असली साथी 
ऐसे बस कुछ ही होते हैं 
सबको नहीं आता साथ निभाना 
वैसे भी सृष्टि का नियम है 
मिलना और बिछुड़ना 
आना और जाना 
यह नवीन सृजन की मांग है 
पतझड़ होगा तभी तो वसंत आएगा 
पुराना जाएगा तभी तो नया आएगा 
संबंधों पर भी यही बात लागू होती है 

वक्त

सुना है वक्त एक सा नहीं रहता 
बदलता जरूर है 
इस बदलने की प्रक्रिया में न जाने क्या-कुछ छूट जाता है 
कभी - कभी तो ठहर ही जाता है 
यह ठहराव बहुत इंतजार करवाती है 
तब वक्त भी वह नहीं रहता जैसा पहले था 
वक्त की ये भी तो खासियत है 
गया वक्त वापस नहीं लौटता 
अंधकार की सुबह भी निश्चित ही है 
पर उसमें भी ग्रहण लग जाता है 
वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता 
पर वक्त पर वक्त भी तो नहीं रहता