ना जाने कब से
कब सब ठीक होगा
मैं इत्मीनान से कह सकूं
अब सब ठीक है
वह समय अब तक आया ही नहीं
एक खत्म कि दूसरा शुरू
जिंदगी कुछ न कुछ लेकर उपस्थित हो जाती है
मैं फिर जुट जाती हूँ
उनका निवारण करने
समाधान ढूंढने
इसी जद्दोजहद में जिंदगी आखिरी सफर पर आ गई
वह किनारे पर खड़ी है
मैं किनारा न पा सकी
प्रतीक्षारत हूँ
कब सब ठीक होगा
कारण भी है
मैं अकेली नहीं हूँ ना
मुझसे कुछ लोग जुड़े हैं
ले मेरे जीवन का अभिन्न अंग हैं
यू कहा जा सकता है
वे जीवन ही है मेरा
यहाँ अकेला कोई नहीं
आता भी कहते हैं कि अकेला आया
कहाँ कोई अकेला आता है
मां के नाल से गर्भ में ही जुड़ जाता है
बाहर आकर ना जाने कितने लोगों से जुड़ता है
बचपन से वृद्ध तक यह क्रम जारी रहता है
आपके पास मकान है
आपके अपनों के पास नहीं है
आपके पास भोजन है
अपनों के पास भरपूर नहीं है
आपके पास पैसा है
अपनों के पास अभाव है
तब आप कैसे खुश रह सकते हैं
आपके पास ना हो
उनके पास हो
तब भी आप खुश रह सकते हैं
वह हुआ ही नहीं अब तक
तब खुश कैसे रहा जा सकता है
ना अकेले आए
ना अकेले जाएगे
इंतजार में हूँ
कब कह सकूं
अब सब ठीक है जीवन में