Sunday, 4 October 2026

बेटी , बेटी ही होती है

बेटी , बेटी होती है
वह दलित या उच्च जाति की हो
क्या फर्क पडता है
फर्क पडता है
सोच से
संस्कार से
नजरिया से
बेटी किसी की भी हो
उसके मान और सम्मान की जिम्मेदारी सबकी बनती है
हमारी बेटी हो
तुम्हारी बेटी हो
पडोसी की बेटी हो
अपनी सोच का दायरा बढाया जाय
उसे इंसान समझा जाए
बराबरी का दर्जा दिया जाए
अपराधी कोई भी हो
हेय नजर से नारी ही देखी जाती है
वह किसी की माँ
किसी की बहन 
किसी की पत्नी तो है ही
एक नागरिक भी है
सभ्य सोसायटी में अपनी तरह रह सकें
जी सकें
उन्नति कर सकें
अपनों के और अपने सपने साकार कर सकें
वह तब होगा
जब बेटी सुरक्षित रहेंगी
उसे खिलौना न समझा जाए
उस पर राजनीति न की जाए
न्याय मिलें
सब प्रयत्नशील होंगे तभी यह संभव है
नारी पर अत्याचार
उसका परिणाम रामायण और महाभारत
राजघरानों की जब यह हालत
तब सामान्य नारी की क्या बिसात
यह परंपरा चली आ रही है
उसे ध्वस्त करना होगा
बेटी , बेटी होती है
वह दलित हो
वह ब्राह्मण हो
वह हिन्दू हो 
वह मुस्लिम हो
वह गरीब हो
वह अमीर हो
है तो वह व्यक्ति ही
सम्मान से जीने का हक उसको भी है

Friday, 2 October 2026

हम

हम ठहरने वालों में से नहीं 
जरा किनारे कुछ पल सुस्ता लें 
उसके बाद फिर जोश से खड़े होंगे 
दरिया का सीना चीर किनारे तक पहुंच ही जाएंगे
तूफानों से घबराना हमने सीखा नहीं 
भंवर में से भी बाहर निकलना आता है 
मंजिल कितनी भी दूर हो 
पाकर ही दम लेंगे

गांधी बनना आसान नहीं

गांधी को दोष देना आसान है 
गांधी होना मुश्किल 
मोहनदास करमचंद  से महात्मा बनना इतना सरल नहीं 
कोट - सूट - पैंट को छोड़कर धोती आधे टांग की धारण करना 
कोठी छोड़कर झोपड़ी में वास करना 
विदेश छोड़कर स्वदेश में वास करना 
अपनी गलतिया पर   पर्दा नहीं उसे स्वीकार करना 
अपने परिवार को तवज्जों न देकर देश के लिए जीवन समर्पित 
विरोध का एक अलग ही हथियार 
सत्य और अहिंसा 
नमक और कपड़ा 
सामान्य से महान की दूरी ऐसे ही नहीं तय की थी 
विरोध का वह स्वर उसी दिन चिंगारी का रूप धारण कर चुका था 
जब उनको रेल के डिब्बे से उतारा गया था या कह लीजिए फेंका गया था 
कर्म का सिद्धांत गांधी से 
यह वही कर्म है 
जो एक  ग्वाले को गोकुल छोड़ मथुरा प्रस्थान कराता है 
यह वही कर्म है 
जो एक राजकुमार को राजमहल छोड़ वनवासी बनाता है 
यह वही कर्म है 
जो एक बैरिस्टर मोहनदास करमचंद को महात्मा बनाता है 
छोड़ना पड़ता है सब कुछ 
गांधी ने बहुत कुछ छोड़ा 
अपने लिए नहीं देश के लिए 
करो या मरो , अंग्रेज भारत छोड़ो 
यह मूलमंत्र एक दुबला - पतला सा व्यक्ति देने वाला 
जिसने हर भारतीय को फांसी पर चढ़ने और जान देने को प्रेरित कर दिया 
हर घर में आजादी का संदेश नमक के माध्यम से 
अफ्रीका से शुरुआत की 
हर गुलामी से जकड़े देश को संदेश दिया 
भेद-भाव से परे 
हर जन को स्वीकार किया 

वैष्णव जन तो तेने कहिए 
पीर पराई जाने रे 

रघुपति राघव राजा राम 
पतित पावन सीता राम 

मृत्यु के समय पर भी मुख से 
राम - राम - राम 

तभी तो किसी एक राष्ट्राध्यक्ष ने उनकी मृत्यु पर कहा था 
आज एक अच्छा हिन्दू इस दुनिया से रुखसत कर गया 


भारत माता के दो लाल

भारत माता के दो लाल
एक मोहनदास तो दूसरा लालबहादुर
नाज हुआ माता को
जब ये सपूत जन्म लिए उसकी कोख में
उस दिन माँ भी इतराई होगी
उसकी मिट्टी धन्य हो गई होगी
एक अहिंसा का पुजारी
दूसरा ईमानदारी की मिसाल
एक राष्ट्रपिता दूसरा प्रधानमंत्री
दोनों ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई
एक की आधी धोती ने बांध लिया जग को
एक के छोटे कद ने सबको बौना कर दिया
अहिंसा ने हिंसा को चित्त किया
अंग्रेजों को भागने पर मजबूर किया
रगो में जोश है 
रंग लाल है लाल बहादुर से
दो अक्टूबर को जन्मे थे ये
यह कभी न भूलें हम 
इनके योगदान को याद करें
आज के दिन को तो यादगार बनाए
मन से श्रंद्धांजलि अर्पित करें माता के इन सपूतो को