Friday, 28 August 2026

Happy raksha bandhan

दिन पर दिन यह बंधन मजबूत हो 
रिश्तों में मिठास बनी रहे 
भाई-बहन के दिल में प्यार बना रहे 
ऐसे ही ताउम्र रक्षाबंधन का त्योहार मनाते रहे
कुछ नहीं तो इसी बहाने मिल ले 
कुछ कह - सुन ले 
बचपन को ताजा कर ले 
वह उम्र जो गुजरी है साथ- साथ 
उसमें गोते लगा ले 
हंस ले मुस्करा ले 
गिले - शिकवे कर ले 
आया है तो जी भर मना ले 
सभी भाई-बहन को शुभकामना 

Thursday, 27 August 2026

मौसम बदलने वाला है

धैर्य रखिए 
मौसम बदलने वाला है 
सब कुछ सुहावना लगने वाला है 
आसमान कह रहा है 
तुम उड़ान भरो मैं तुम्हारें साथ हूँ 
बिजली का क्या 
वह तो कड़क - फड़क कर चली जाएगी 
तूफान भी कहाॅ हमेशा कायम रहने वाला है 
अंधेरा छूटने वाला है 
प्रभात दस्तक दे रहा है 
अपनी राह पर चलते रहना है 
मंजिल भी मिलना ही है 
यह समय भी ऐसा नहीं रहने वाला है 
नयी उम्मीद नयी आशा रखना है 
कल्पना करना और सपना भी देखना है 
उसको साकार भी करना है 
हार मान कर नहीं बैठना है 
जीवन से साक्षात्कार करना है 
उसमें सफल भी होना है 
सब कुछ होगा 
धैर्य रखिए 
मौसम बदलने वाला है 

Wednesday, 26 August 2026

जिंदगी यू ही गुजरती रही

20 से 65 वर्ष की उम्र 
पता नहीं कैसे गुजर गई 
बेटी - बहन - पत्नी - माॅ की भूमिका निभाते - निभाते अपने को भूल गई 
हर रिश्ता दिल से निभाया पर पता नहीं क्या कमी रह गई 
किसी के दिल के करीब न हो पाई 
सब मुझमें कुछ न कुछ कमियां निकालते रह गए 
मैं अब तक अपने को सुधारते रह गई 
उसका कोई हल तो निकला नहीं बस मैं लोगों से दूर होती गई 
प्यार मुझे सब करते हैं किया भी 
मां - पिता भी पति भी 
वहाँ स्वतंत्रता होकर भी नहीं थी 
पहले उनके अनुसार बाद में उनके अनुसार 
एक समाज थे 
एक सास- नन्द - जेठानी से बढ़कर था 
सब उसमें ही समाए हुए 
कभी किसी ने मुझे मनाया नहीं 
रूठना भी मुझे ही मानना भी मुझे ही 
परिस्थिति के जिम्मेदार ये नहीं केवल मैं 
सबने मुझ पर एहसान किया 
उनका अपना धर्म और कर्म कुछ नहीं 

आज पीछे मुड़कर देखती हूँ 
तब सब कुछ कैसा ही लगता है 
मन से मैंने कुछ नहीं किया ??
जबरदस्ती किया शायद 
आज पढ़ाई भी की होती ढंग से 
प्रोफेसर होती बड़ी 
आज बच्चों पर ध्यान दिया होता 
तब वो और कुछ होते 

जीवन ढर्रे पर चलता रहा 
हम कभी यहाँ कभी वहाँ ढालते रहें 
सबके बीच पड़ते रहे 
हासिल कुछ नहीं हुआ 
बस नाम खराब हुआ 
अपने लिए कभी सोचा ही नहीं 
अपना वजूद कभी अह्सास कराया ही नहीं 
आज जब कोशिश की 
तब सब कुछ बदला - बदला 
न वह समय न वह परिस्थिति 
अब तो बस मजाक लगता है सब 
वह जो पहले नहीं लगता था 

न कभी किसी से कुछ मांग 
न ईश्वर से कुछ शिकायत 
हुई भी तो बस थोड़े समय के लिए 
उसको लोगों ने कुछ और समझ लिया 
परेशानी कभी सुनी नहीं 
सबको सब अच्छा सुनना 
कुछ बोलने की कोशिश तो उपहास 
जो जिम्मेदार थे असली 
वह तो मस्त रहें 
मैं बस त्रस्त रही 

अभी भी सब खत्म नहीं हुआ 
गाहे - बगाहे सुनना पड़ता है 
कभी-कभार तो बिन कारण के 
कुछ भी दोष मढ़ दिया जाता है 
अपने रवैया किसी को याद नहीं
मेरी हर बात सबको याद है 
चटकारे ले किस्से सुनाए जाते हैं 
सुनाने वाले भी अपने सुनने वाले भी अपने 
ऐसा लगता है जीवन व्यर्थ किया मैंने 
फिर लगता है नहीं 
मैने कीचड़ में से मोती निकाला है 
अपना एक मुकाम कायम किया है 
दोष लगाने वाले भी पूछते हैं मुझी से 
निर्णय लेना इतना आसान नहीं होता ना 
दूर खड़े हो तमाशा देखना आसान है 
काम करना अलग बात है 
कभी अपनों की कभी गैरों की 
सुनती रही 
उलझती रही 
जिंदगी यू ही गुजरती रही 
गुजर रही 
बहुत कुछ देखा - सुना 
लगता है 
अभी भी बहुत कुछ बाकी है 
ये उम्र सब छोड़ने की 
कुछ छूट नहीं पा रहा 
देखे कब तक चलता है 

Monday, 24 August 2026

ऐसा रिश्ता जो होता दिखावा

वे लोग मेरे अपने थे 
बहुत खास 
दिल के पास 
मन हमेशा मिलने को बेताब 
मुलाकात होती नहीं थी व्यस्तता में 
कभी-कभार त्योहार- अवसर पर 
देख कर दिल खुश हो जाता था 
दूसरे ही क्षण डर भी जाता था 
मन सर्तक हो जाता था 
संभल कर रहना है 
कुछ बोलना नहीं है 
कोई कुछ भी कहे 
मजाक उड़ाए तब भी 
हंसते रहना है 
स्वयं का कष्ट हो तब भी 
जाहिर नहीं करना है 
कुछ समय की तो बात है 
लेकिन होता कुछ और ही 
ऐसा कुछ हो जाता 
सब दोष मुझ पर आ जाता 
सारी तैयारी - आवभगत, 
सब धरी की धरी रह जाती 
वो तो लोग खा - पीकर इंजॉय कर चले जाते 
मैं एकाध हफ्ते वही सब सोचती रहती 
मेरी क्या गलती हुई 
तब तक फिर दूसरा अवसर आ जाता 
सालोंसाल यही चलता रहा 
अब तो डर लगता है 
मिलने में 
देखने में 
जहाँ आप अपने मन की बात न रख सको 
अपनी सफाई न दे सको 
प्रत्युत्तर न दे सको 
सब एक तरफ
मिलकर आपकी कमियां गिनाने में जुटे 
परिवार की कमियां 
खानदान की कमियां 
परिस्थिति की कमियां और मजाक 
वो शायद उनका भी है 
वो कैसा अपना जहाँ बोलने से पहले सोचना 
वह कैसा परिवार जो पल - पल बदले 
उससे तो हिटलर जैसा बाॅस भी अच्छा
जहाँ सतर्क रहता है इंसान 
सर काटे और बाल की रक्षा करें 
ऐसे में मिठास कहाँ 
ऐसा रिश्ता अपना नहीं औपचारिक होता है 
कहने को संबंध खून के पर वह पानी से भी पतला होता है 
जबरदस्ती का थोपा हुआ लगता है 
वह ईश्वर प्रदत्त जो है 
समाज को दिखाने के लिए 
अपनी महत्ता जताने के लिए 
सब ठीक लगता है होता कुछ नहीं 
हर समय एहसास दिलाया जाता हो 
वह रिश्ता टूटा हुआ जोड़ लगा हुआ 
कब तक निभेगा 
आज हर जगह यही है 
रिश्ता नहीं व्यापार है 
एक हाथ ले एक हाथ दे 
तुम अगर सक्षम नहीं 
तुम्हारी जरूरत नहीं 
तब बस दिखावा तक सीमित 
विडंबना यह भी कि ईश्वर से प्रार्थना भी उन्हीं के लिए 
उनकी परेशानी बर्दाश्त नहीं 
उनके लिए बुरा सोचना सपने में भी नहीं 
शरीर के अंग जैसे 
अगर कांटा चुभा पैर में 
तकलीफ होगी मन भी दुखी होगा 
सलामत रहें सब 
रिश्ता रखे या न रखे 
सुरक्षित रहें वह