Saturday, 1 August 2026

मैं सूर्य

मैं सूर्य था 
जग को प्रकाशित करना मेरा कार्य 
अंधेरा दूर करने को प्रतिबद्ध 
कुंती तो विवश थी 
लोकलाज का डर था उसे 
वह कुंवारी माता बनी जिसे समाज स्वीकार नहीं करता 
दो कुल का भार था उस पर
पर मैंने क्या किया 
क्या कर्ण के जन्म का भागीदार मैं नहीं था 
मैं उसे अपमानित होते देखता रहा 
कुंती ही अकेले उसकी जिम्मेदार नहीं थी 
मुझ पर क्यों कोई लांछन नहीं लगा 
सारा अपमान कुंती पर
कोसा उसे गया 
बताती तो कुल्टा कहलाती 
कैसी मां जो बच्चें को नदी में बहा दिया 
वह रोती रही बिलखती रही 
उसकी पीड़ा - मजबूरी को किसी ने समझा 
कर्ण ने भी उसे लताड़ा 
स्वाभाविक भी था 
बच्चा तो दोषी नहीं था 
उसका कोई कुसूर भी न था 
कुंती महलों की महारानी बनी रही 
पांच महारथी में स्नेह बांटती रही 
मैं देवता बना रहा 
पूजन करवाता रहा 
मैं सारे संसार में प्रकाश बांटता रहा 
कर्ण के जीवन का अंधेरा 
महाभारत के युद्ध का कारणों में एक था 
माता - पिता की पहचान के बिना नाजायज संतान 
धर्म को जानते हुए भी अधर्मी दुर्योधन के साथ खड़े रहना 
योग्यता की कद्र नहीं 
पहचान के लिए तरसना 
महाभारत को कौन टाल सकता था 
अन्याय और अधर्म पर खड़ा समाज 
उसे खत्म होना ही था 
द्वारिकाधीश को अवतरित ही होना था 
दोषी तो सब थे 
अकेला दुर्योधन नहीं 
वह तो वह नैया थी जो डूबने की कगार पर थी 
नाविक का अता - पता नहीं 
कोई वचनबद्ध तो कोई धर्म राज तो कोई तन - मन से नेत्रहीन 
धर्म हिचकोले खा रहा था 
दुर्योधन ने डुबो दिया 
अच्छा ही हुआ 
कहीं तो खत्म होना था नई शुरुआत के लिए 


मेरा हमसफर

तेरी शरारतों का अंदाज निराला 
तेरी बातों में गजब का जादू 
किसी के आगे न झुकने वाली 
हर बात में अपनी मनमानी करने वाली 
किसी की छोटा सी बात और मजाक भी नागवार 
वही शख्स तेरी हर बात पर हार मानता 
अपने को सरेंडर कर देता 
तेरा गुस्सा भी प्यारा लगता 
तेरे बिना मेरा मन भी सूना 
तू ही तो मेरी हमसफर 
कब मेरी उंगली छोड़ मेरा हाथ पकड़ने लगी 
मुझे रास्ता पार करवाने लगी 
मेरा बोझ अपने कंधों पर उठाने लगी 
मुझे दुनिया घुमाने लगी 
मुझे रहने का सलीका सिखाने लगी 
मुझे अच्छे कपड़े दिलाने लगी 
मंहगे से मंहगे होटलों में ले जाने लगी 
वह सब दिखाया जो मैंने कल्पना भी न की थी 
अपने बल पर मैं तो यह कभी करती नहीं 
हमसफर जरूरी नहीं जीवन साथी हो 
हमसफर हमारे बच्चें भी तो है 
कभी हमने उनको राह दिखाया 
आज वो हमें राह दिखा रहे हैं 
साथ लेकर चल रहे हैं 
हमने उनको वह सब नहीं दिया 
आज वो दे रहे हैं 
हमने उनकी इच्छा को दबाया 
वो हमारी इच्छा पूरी कर रहे हैं 
ईश्वर मेरे इन हमसफर और हमराही को ऐसा बनाए 
हम उन्हें देख खुश होते रहें 
जो हम न कर पाए 
वो करते रहें 
सफलता का परचम फहराते रहें 
ईश्वर से यही पार्थना 
उनकी राह आसान हो 
उन्नत हो 
प्रगतिशील हो 
खुश और सुखी हो 
इन्हें देख और कोई खुशी नहीं 
इनके चेहरे पर मुस्कान ही मेरी खुशी 
अगर खुदा आकर खुद कहें 
चलो हमारे साथ स्वर्ग 
मैं इन्कार कर दूंगी 
नहीं जाना है यही रहना है 
इनको देख जीना है 
आँसू ठीक है , मिटना ठीक है 
तभी तो 
मन कह उठता है 
                    रहने दो हे देव , मेरा मिटने का अधिकार 
वह जीवन ही क्या जिसमें अपनों की कहानी न हो 


Friday, 31 July 2026

मौसम का मिजाज बदलता है

कुछ दिनों से लगातार बारिश हो रही है 
अब धरती माता तप नहीं रही है 
गर्मी से जूझ रहे लोग भी आनंदित हुए 
रात में ऑख खुली 
थोड़ा ठंड महसूस हुई 
चादर जो कितने महीनों से ऐसे ही सिरहाने पड़ा था 
उसको खोल ओढ़ लिया 
मन को सुकून मिला 
इस वर्ष की बेहिसाब गर्मी से बेहाल हो गई थी 
सहन नहीं हो रहा था 
पर क्या करें 
मौसम का मिजाज है 
रात में नींद खुलने पर जल्दी फिर नहीं आती 
विचार उमड़ते - घुमड़ते रहते हैं 
ठंड अच्छी लग रही थी 
गर्मी की तपन भूल गई 
ऐसा ही जीवन है शायद 
कभी बहुत परेशान हो जाते हैं 
कुछ वक्त के बाद वह समय भी निकल जाता है 
तब इतनी याद नहीं रहती 
सुख - दुख आनी - जानी है 
वक्त बदलता रहता है 
ठंड,  गर्म , वर्षा , अंधड़ आते रहते हैं 
चले भी जाते हैं 
उनको जाना ही है 
टिक कर रह नहीं सकते 

Thursday, 30 July 2026

यह जन्मसिद्ध अधिकार है ???

युवा पीढ़ी अपने बड़ों का आईना होती है 
उसमें जो और जैसा संस्कार डाला गया है 
वो वैसे ही होंगे 
वे आपका प्रतिबिंब हैं 
आज उनके गाली-गलौज पर उंगली उठाई जा रही है 
सीखा कहाँ से हैं उन्होंने 
कहने को तो हम सभ्य समाज से आते हैं लेकिन 
मुख पर मां - बहन - बेटी की गाली तैयार रहती है 
कुछ तो बिना बात ही गाली निकालते रहते हैं 
शहरी परिवेश में तो कुछ मर्यादा भी है 
ग्रामीण अंचल में यह सामान्य बात है 
वहाँ तो बच्चा गाली देता है तो औरतें भी हंसती हैं 
जैसे बहुत अच्छा सीख रहा हो 
स्वयं ही गंदी और भद्दी बात बतियाती रहती है 
हद की अश्लीलता 
जबान पर कोई लगाम नहीं 
शादी-ब्याह में सुनिए 
सर शर्म से झुक जाएगा 
थोड़ा-बहुत परिवर्तन आ रहा है अब
लेकिन माहौल वैसा ही 
बस अड्डे पर
दुकानों पर 
सड़क पर
अश्लील गाने बजते रहते हैं 
लोग चलते रहते हैं 
छेड़ते रहते हैं 
फब्तियां कसते रहते हैं 
और इसमें कुछ बुराई भी नहीं है 
यह जन्मसिद्ध अधिकार है