नए भी जुड़े पुराने भी रहे
सबने अपनी राहें बाद में अलग-अलग कर ली
पता नहीं कहाँ हैं
कुछ का पता कुछ का नहीं
सबकी अपनी जिंदगी
सबकी अपनी सोच
सबकी अपनी जरूरतें
सबकी अपनी मजबूरी
किसी की नौकरी किसी का परिवार
किसी का घर किसी का शहर
समय बदलता है तो लोग भी बदलते हैं
बचपन से लेकर अब तक न जाने कितने मिले
कितने बिछुड़े
उसका हिसाब ही नहीं है
कुछ जेहन में आज भी है
कुछ विस्मरण हो गए
सबका अपना वजूद था
अपना प्रभाव था
अंत तक साथ कोई नहीं देता
अंत तक जो साथ दें बस वहीं असली साथी
ऐसे बस कुछ ही होते हैं
सबको नहीं आता साथ निभाना
वैसे भी सृष्टि का नियम है
मिलना और बिछुड़ना
आना और जाना
यह नवीन सृजन की मांग है
पतझड़ होगा तभी तो वसंत आएगा
पुराना जाएगा तभी तो नया आएगा
संबंधों पर भी यही बात लागू होती है