Wednesday, 3 June 2026

अपना कौन लगता

चांद इतना दूर
फिर भी लगता पास है
वह अपना लगता है
लगता जैसे बतियाता है
अपनी शीतल चांदनी देता है
तारों के खेल दिखाता है
कहते हैं उसमें दाग है
वह तो हममें भी है
कोई भी तो पूर्ण नहीं
कमजोरियाँ और दोष सभी में
इसके साथ भी तो चांद को पूजा जाता है
उससे सुहागिने करवा चौथ के दिन दुआ मांगती है
बच्चों को उसमें मामा दिखाई देता है
अपना प्यारा चंदा मामा

सूरज तो बहुत पास है
फिर भी लगता दूर है
उसका इतना तेज कि
ऑखे भी उठाकर कुछ देर नहीं देख सकते 
पूर्ण प्रकाश से भरपूर
उर्जावान
कोई कमी नहीं
सबको प्रकाश के साथ जीवन भी देता
फिर भी वह करीबी नहीं लगता
मन में शीतलता नहीं आती
डर लगता है

यही बात तो रिश्तों में भी है
कुछ रिश्ते बहुत संपन्न 
बहुत बडे , बहुत नामचीन
बहुत इज्जतदार
पर उनका हमें क्या फायदा
वह कहने के लिए रिश्ते
उससे करीब महसूस किया जाता
कुछ अजनबियों से
कुछ बिना नाम वाले रिश्तों से
जहाँ विश्वास होता है
ये कुछ न कुछ हमारे लिए जरूर करेंगे
कुछ नहीं तो हमारे मन की बात सुनेंगे
हमें समझेंगे
अपनी हैसियत से हमारी तुलना नहीं करेंगे
वह सूर्य भले हो चमकता
पर हमारे किस काम का

Tuesday, 2 June 2026

मां

किन शब्दों में वर्णन करू माँ तुम्हारी
यहाँ तो शब्द ही निशब्द
जहाँ शब्द असमर्थ
वही से तुम
तुम क्या हो
भूखे पेट का पहला कौर
अंधेरे में पहला प्रकाश
वेदना में पहली पुकार
तपते सूरज में पहली आग
सुलाने में तुम्हारी गोद
सर पर हाथ फेरने वाली ममता
हर कुछ तुमसे
तुमसे इतनी अपेक्षा उतनी ईश्वर से भी नहीं
जब सब असमर्थ तब तुम समर्थ
पता है 
वह ना न कहेंगी
हर फरियाद भी तुम्ही से
सारा रोष भी तुम पर 
सारी कुंठा और निराशा भी तुम पर
सारी शिकायत भी तुम्हीं से
पता है
सारा विष स्वयं पी जाओगी
अमृत मुझे दे दोगी
ईश्वर तो नहीं हो तुम
अगर ईश्वर की जगह तुम होती
तब ऐसा भाग्य लिखती
संतान को दुख का साया भी न पडने देती

Sunday, 31 May 2026

अब भी संभल जाओ

अब भी संभल जाओ
मंदिर और मूर्ति को छोड़ अस्पताल निर्माण करो
पूजाघर कम रहेंगे तब भी कोई बात नहीं
ईश्वर के दर्शन कर लेंगे
जीवित रहेंगे तभी न
आज अस्पताल खुले है
पूजास्थल बंद है
अस्पताल की संख्या कम पड रही है
हर कस्बे , गाँव और कुछ कुछ दूरी पर धार्मिक स्थल
पर हर जगह अस्पताल नहीं
जनसंख्या के अनुपात से अस्पताल नहीं के बराबर
महान विभूतियों के स्टेच्यू बनाए जा रहे हैं
करोडों रूपए खर्च
भव्य से लेकर छोटे छोटे तक
न जाने कितने
जिन पर पक्षियों का बसेरा
बीट पडे हुए
जो उनका भी अपमान
इससे अच्छा तो मानव सेवा की खातिर
उसी जगह में उनके ही नाम से छोटा दवाखाना होता
आज संकट काल में महसूस हो रहा है
किसकी आवश्यकता है
ऐसा नहीं कि पहले से नहीं है
बीमार होने पर अस्पताल में कैसे एडमिट होंगे
कौन सा और कितना खर्चीला
लेंगे कि नहीं
यह भी सोचना पडता है
हर एक दो किलोमीटर के दायरे में अस्पताल हो
बीमार होने पर यह चिंता न करनी पडे
स्वस्थ रहेंगे तभी ईश्वर का दर्शन भी करेंगे
जिंदा रहेंगे तभी पूजा-पाठ भी करेंगे
कहते हैं न
भक्त से ही भगवान है

बदलाव

कुछ नहीं बदला है 
समाज वहीं का वहीं खड़ा है 
उसकी सोच भी वैसी ही है 
बस दिखावा रहता है 
सोच वैसी की वैसी है 
औरत के प्रति नजरिया 
बदला नहीं है 
विवाह की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है 
सब कुछ छिन्न भिन्न 
क्योंकि जिस पर दारोमदार था 
वह ही बदल रही है 
अपना महत्व समझ रही है 
और जहाँ अपने लिए सोचा 
वहाँ त्याग की बातें बेमानी 
बदलाव पर खड़ा समाज 
क्या होगा 
राम जाने