Saturday, 13 June 2026

वैसा गांव तो नहीं है

हम तो आए थे अपने घर
महसूस हुआ 
वह घर नहीं
जो हम छोड़ गए थे
वह गांव नहीं 
जो हम छोड़ आए थे
अब तो यहाँ भी अपनापा
भाईचारा तो है गायब
घर में ही सब अलग अलग
तब एक कमाता था
खाते सब समान थे
सबका हक उतना ही
आज वह बात नहीं
अब यहाँ भी पैसा बोलता है
आमदनी के हिसाब से
रिश्तों का मूल्य
अब नहीं कोई जाता किसी के द्वार
अब तो द्वार भी सूनसान
सब अपने अपने घरों में
नीम के नीचे नहीं
अब पंखे की हवा भाती है
खाना सब एक साथ नहीं
अपने अपने कमरों में खाते हैं
नहीं बतियाता कोई
सब मोबाइल में मशगूल
नई बयार है
नया जमाना है
नए-नए शौक है
अब बारात में वह बात नहीं
आना और जाना 
बस रस्म निभाना
किसी के पास समय नहीं
अब घर के बुजुर्गों का वह रूतबा नहीं
वह तो किसी एक कोने में चारपाई डाल पडे हुए
कहने को तो सब संयुक्त है
पर सब अलग अलग
अब दातून नहीं ब्रश है
अब पोखर नहीं हैंडपम्प है
अब मिट्टी के बर्तन 
पीतल तांबा कांसा नहीं
चमचमाता स्टील है
अब राख से नहीं रगडना
साबुन से चमकाना है
सबको शहर प्यारा है
गाँव में रहना नहीं गंवारा है
अब तो कुछ बचे खुचे हैं
खेती क्यों करें
अब तो मनरेगा है
सस्ता अनाज
गेहूं चावल 
ऊपर से बैंक में आता सरकारी रूपया
बिजली और गैस मुफ्त
कर्ज लेना मजबूरी नहीं शौक
आज नहीं तो कल माफ
साइकिल और पैदल तो दूर
अब सबके पास मोटरसाइकिल है
क्या जरूरत काम की
रहना है आराम से
वह गाँव जो हम  छोड़ आए थे
वह ऐसा तो नहीं था

क्या सच में जमाना बदल गया

कहते हैं 
जमाना बदल गया
सुनते हैं
जमाना बदल गया
जमाना नहीं
इंसान बदल गया
हमारा जमीर बदल गया
इमान बदल गया
नैतिकता रही बची खुची
उसके भी पैमाने बदल गए
सत्य शाश्वत है
उसकी भी परिभाषा बदल गई
दोस्ती , प्रेम अब वैसे नहीं रहे
रिश्ते भी मतलबी हो गए
अब कोई यू ही बिना कारण मिलता नहीं
मिलने में भी नफा नुकसान देखा जाता है
अब त्योहार पहले जैसे नहीं रहे
दिखावट का आवरण ओढ रखा है
अब हर चीज दौलत से मापी जाती है
प्रतिष्ठा और शोहरत का बोलबाला है
अब वह प्यार नहीं
अब वह अपनापन नहीं
अब वह दया और करुणा नहीं
अब वह भी मशीन है
शरीर इंसान का
मन मशीन का
अब वह पहले जैसा धडकता नहीं है
बडे सोच समझ कर फैसला लेता है
हर चीज का हिसाब रखता है
बहुत बारीकी से गुणा भाग करता है
ध्यान से जोड़ता और घटाता है
कहाँ मुनाफा
कहाँ घाटा
इस चक्कर में अपनों को भूल जाता है
कहते हैं
जमाना बदल गया 
जमाना नहीं जनाब
इंसान बदल गया है

Friday, 12 June 2026

ऐसा तो न था

पहले भी वही लोग
वही जगह 
पर ऐसा तो न था
कोई किसी की ताई
कोई किसी की भौजी
कोई किसी की बेन
कोई किसी की खाला
कोई किसी की आंटी
सब अपने से लगते थे
पूरनपोली
कचौरी
ढोकला
सिवैया
केक
सबके स्वाद भी अपने घर के लगते थे
अब वह बात नहीं रही
अब तो व्यंग के सिवा और कुछ नहीं
नजरिया बदल गया 
अब प्रेम नहीं वैमनस्य ने घर कर लिया है
अब पडोसी नहीं
प्रांतीय और धार्मिक 
अब वह होली और दीवाली
गणेशोत्सव , क्रिसमस और ईद 
की रौनक पहले जैसे नहीं
त्योहार तो वही
पर हम बदल गए हैं
सोच बदल गई है
भाईचारे की भावना गायब हो गई है
चाॅल संस्कृति की जगह फ्लैट संस्कृति ने ले ली है
जहाँ सब अपने अपने घरों में बंद
प्राइवेसी हो गई है
सामुदायिक भावना तो कब की गायब हो गई है
अब लोग        हम   से    मैं 
हो गए हैं
पहले भी वही लोग
वही जगह
पर ऐसा तो न था

Thursday, 11 June 2026

यदि ऐसा होता तो

यदि ऐसा होता तो
यदि वैसा होता तो
होता तब न
हुआ नहीं
हम इसी यदि के चक्कर लगाते रहते हैं
हासिल कुछ नहीं
सिवाय पछताने के
दुखी और निराशा के गर्त में डूबने के
देखा जाय तो
नियति जब खेलती है
तब सब कुछ पलट जाता है
जीती हुई बाजी भी हम हार जाते हैं
एक ही पल में सब कुछ उलट पुलट हो जाता है
सोचा हुआ हो जाता
तब क्या कहना
यदि , लेकिन , परन्तु , फिर भी
यह केवल शब्द नहीं है
बहुत कुछ इनमें ही छिपा है
जीवन का राज
मैंने सोचा था 
बीस साल में सब कुछ व्यवस्थित हो जाएगा
पचास पचपन तक सब जिम्मेदारी से मुक्त
पर वह हो न सका
इस यदि ने ऐसा टांग अडाया
जिंदगी औंधे मुंह आ गिरी
अब न समझ आ रहा है
न सूझ रहा है
यह क्या से क्या हो गया
कहाँ से चले थे
कहाँ पहुँच गए
यदि वैसा हुआ होता तो
परन्तु वैसा हुआ नहीं 
लेकिन ऐसे हो गया 
फिर भी जीना तो है
मरना तो किसी समस्या का समाधान नहीं
हार मानकर चुपचाप बैठ नहीं सकते 
तब ठीक है
फिर से कमर कसकर उठ खडे हो जाओ
यदि वैसा हो गया
तब फिर क्या गम