बहुत खास
दिल के पास
मन हमेशा मिलने को बेताब
मुलाकात होती नहीं थी व्यस्तता में
कभी-कभार त्योहार- अवसर पर
देख कर दिल खुश हो जाता था
दूसरे ही क्षण डर भी जाता था
मन सर्तक हो जाता था
संभल कर रहना है
कुछ बोलना नहीं है
कोई कुछ भी कहे
मजाक उड़ाए तब भी
हंसते रहना है
स्वयं का कष्ट हो तब भी
जाहिर नहीं करना है
कुछ समय की तो बात है
लेकिन होता कुछ और ही
ऐसा कुछ हो जाता
सब दोष मुझ पर आ जाता
सारी तैयारी - आवभगत,
सब धरी की धरी रह जाती
वो तो लोग खा - पीकर इंजॉय कर चले जाते
मैं एकाध हफ्ते वही सब सोचती रहती
मेरी क्या गलती हुई
तब तक फिर दूसरा अवसर आ जाता
सालोंसाल यही चलता रहा
अब तो डर लगता है
मिलने में
देखने में
जहाँ आप अपने मन की बात न रख सको
अपनी सफाई न दे सको
प्रत्युत्तर न दे सको
सब एक तरफ
मिलकर आपकी कमियां गिनाने में जुटे
परिवार की कमियां
खानदान की कमियां
परिस्थिति की कमियां और मजाक
वो शायद उनका भी है
वो कैसा अपना जहाँ बोलने से पहले सोचना
वह कैसा परिवार जो पल - पल बदले
उससे तो हिटलर जैसा बाॅस भी अच्छा
जहाँ सतर्क रहता है इंसान
सर काटे और बाल की रक्षा करें
ऐसे में मिठास कहाँ
ऐसा रिश्ता अपना नहीं औपचारिक होता है
कहने को संबंध खून के पर वह पानी से भी पतला होता है
जबरदस्ती का थोपा हुआ लगता है
वह ईश्वर प्रदत्त जो है
समाज को दिखाने के लिए
अपनी महत्ता जताने के लिए
सब ठीक लगता है होता कुछ नहीं
हर समय एहसास दिलाया जाता हो
वह रिश्ता टूटा हुआ जोड़ लगा हुआ
कब तक निभेगा
आज हर जगह यही है
रिश्ता नहीं व्यापार है
एक हाथ ले एक हाथ दे
तुम अगर सक्षम नहीं
तुम्हारी जरूरत नहीं
तब बस दिखावा तक सीमित
विडंबना यह भी कि ईश्वर से प्रार्थना भी उन्हीं के लिए
उनकी परेशानी बर्दाश्त नहीं
उनके लिए बुरा सोचना सपने में भी नहीं
शरीर के अंग जैसे
अगर कांटा चुभा पैर में
तकलीफ होगी मन भी दुखी होगा
सलामत रहें सब
रिश्ता रखे या न रखे
सुरक्षित रहें वह