Saturday, 15 August 2026

आज हवा भी स्वतंत्र है

आज हवा भी स्वतंत्र है
झूम झूम कर कह रही है
झंडा ऊंचा रहे हमारा 
यह पेड़ भी सरसरा रहे हैं 
हरियाली से भरे भरे
खडे हैं ठाठ से
सूरज भी सिंदूरी आभा फैला रहा है
आसमान भी शुभ्र सफेद बादलों के साथ 
लगता है धरती से आसमान 
सफेद , हरा और केसरिया 
सब झंडे का स्वागत कर रहे हैं 
भारत की स्वतंत्रता के साक्षी 
देशभक्ति का गान चारों तरफ
बच्चे से बूढे सब उत्साहित- आनंदित 
नये - नये  कपडे पहने सब 
सलामी दे रहे 
हमारे प्यारे झंडे को
राष्ट्र धुन बज रही है
शहीदों को याद किया जा रहा है
लगता है वक्त यही ठहर जाएं 
झंडे को देखते रहें 
सबसे ऊंचा सबसे अच्छा 
इसकी तो छटा ही निराली 
हमारा भाग्य 
हमारा कर्म 
हमारा धर्म 
सब इसमें ही संचित 
न जाने क्या- क्या बलिदान देना पडा है
आज उनको भी याद किया जा रहा है
ऑख भर आ रही है
मुख पर मुस्कान 
एक अलग ही तरह के तेज से ओत-प्रोत 
हर शख्स हर भारतीय 
हमारी सांस 
हमारी धड़कन 
सब इसमें समाई 

जब तक यह है 
तब तक हम है 
     जय हिन्द 
              जय हिन्द की सेना

Friday, 14 August 2026

कान्हा से द्वारिकाधीश तक का सफर

कान्हा और द्वारिकाधीश
मुरलीधर से सुदर्शनचक्रधारी तक के सफर में कृष्ण ने बहुत कुछ खोया भी है। उसका दर्द बयां करता एक छोटा सा प्रसंग।

कृष्ण और राधा स्वर्ग में विचरण करते हुए 
अचानक एक दुसरे के सामने आ गए

विचलित से कृष्ण- 
प्रसन्नचित सी राधा...

कृष्ण सकपकाए, 
राधा मुस्काई

इससे पहले कृष्ण कुछ कहते 
राधा बोल उठी-

"कैसे हो द्वारकाधीश ??"

जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी
उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया

फिर भी किसी तरह अपने आप को संभाल लिया

और बोले राधा से ...

"मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ
तुम तो द्वारकाधीश मत कहो!

आओ बैठते है ....
कुछ मै अपनी कहता हूँ 
कुछ तुम अपनी कहो

सच कहूँ राधा 
जब जब भी तुम्हारी याद आती थी
इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी..."

बोली राधा - 
"मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ
ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा
क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे जो तुम याद आते

इन आँखों में सदा तुम रहते थे
कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ
इसलिए रोते भी नहीं थे

प्रेम के अलग होने पर तुमने क्या खोया
इसका इक आइना दिखाऊं आपको ?

कुछ कडवे सच , प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?

कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए
यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए ?

एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर भरोसा कर लिया 
और
दसों उँगलियों पर चलने वाळी
बांसुरी को भूल गए ?

कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो ....
जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी
प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली
क्या क्या रंग दिखाने लगी ? 
सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी

कान्हा और द्वारकाधीश में
क्या फर्क होता है बताऊँ ?

कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते
सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता

युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है
युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं
और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं

कान्हा प्रेम में डूबा हुआ आदमी
दुखी तो रह सकता है
पर किसी को दुःख नहीं देता

आप तो कई कलाओं के स्वामी हो
स्वप्न दूर द्रष्टा हो
गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो

पर आपने क्या निर्णय किया
अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी?
और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया ?

सेना तो आपकी प्रजा थी
राजा तो पालाक होता है
उसका रक्षक होता है

आप जैसा महा ज्ञानी
उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन
आपकी प्रजा को ही मार रहा था
आपनी प्रजा को मरते देख
आपमें करूणा नहीं जगी ?

क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे

आज भी धरती पर जाकर देखो

अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को
ढूंढते रह जाओगे 
हर घर हर मंदिर में
मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे

आज भी मै मानती हूँ

लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं
उनके महत्व की बात करते है

मगर धरती के लोग
युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं, i.
प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं

गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है, 
पर आज भी लोग उसके समापन पर " राधे राधे" करते है". 🙏 COPY PEST
    

     कृष्ण का राधा को जवाब

नहीं राधा मैं तुम्हे भूला ही कहा था
मैं तो स्वयं को तुम्हारे पास ही छोड़ गया था
मुझे मथुरा तो जाना ही था
माता -पिता का कर्ज चुकाना था
उनको जेल में कैसे रहने देता
मामा कंस के अत्याचार से मुक्त करना था
प्रजा के प्रति कर्तव्य पूर्ण करना था
यमुना तो आज भी याद आती हैं
बचपन को कैसे भूल सकता हूँ

राजा का कर्तव्य था
बांसुरी कैसे बजाता
सुदर्शन चक्र को उठाना पड़ा
पांडव को अन्याय से बचाना था
बुआ कुंती को धीरज बंधाना था
राजसभा मे पांचाली का चीरहरण
यह समस्त नारी का अपमान
राधा यह कैसे देखता
मैं कैसे गोकुल मे बैठा रास रचाता

भगवतगीता का उपदेश केवल अर्जुन के लिए नहीं
यह समस्त मानव जाति के लिए था
सुदामा को भी मैं भूला नहीं
उनको तो मै सब कुछ बिन मांगे दे दिया
मित्रता को नया आयाम दिया
आज भी हमारी मिसाल दी जाती है

समाज को नई दिशा देनी थी
मैं युद्ध से कैसे दूर रहता
फिर भी मैंने शस्त्र नहीं उठाया
माता गांधारी का शाप भी मुझे मिला
जीत पांडवों की दोषी मैं बना

कर्म का महत्व जगत को समझाने वाला
मैं एक राजा का कर्म कैसे नहीं करता
मुझे दूख हो रहा था 
पर महाभारत का युद्ध तो निश्चित था
जब -जब धर्म की हानि होगी
मुझे तो आना ही पड़ेगा
वहाँ गोवर्धन उठाया था उंगली पर
यहाँ सुर्दशन घूमा रहा था

मैं तुमको कैसे भूलता
मेरी मुस्कराहट मे तुम ही तो थी
गीता मे तुम भले ही न हो
पर आज भी मैं राधे श्याम ही के नाम से जाना जाता हूँ
राधा बिना तो मैं अधूरा ही हूँ।

यह जवाब मेरे द्वारा लिखा गया है

Sunday, 9 August 2026

सब पर जाहिर न करें

थोड़ा धूप अपने लिए भी छुपा रखना 
न जाने कब उसकी जरूरत पड़ जाए 
थोड़ी यादें मन के एक कोने में दबाकर रखना 
न जाने कब मन उसमें रमने का मन करें 
कुछ बातें अपने मन में छिपा कर रखिए 
समय आएगा तो बताना अभी इतनी जल्दी क्या है 
हर खुशी दूसरों के सामने जाहिर न करें 
क्या जाने किस की बुरी नजर लग जाए 
अपनी बातें अपनी यादें 
अपना सुख - दुख अपने तक सीमित रखिए 
ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता क्या है 
जीवन व्यक्तिगत है सार्वजनिक नहीं 
हर बात का ढोल बजाना 
उचित नहीं 
यहाँ सब आँख गड़ाए बैठे हैं 
घात लगाए बैठे हैं 
शिकारी जैसे शिकार पर झपट्टें को तैयार हैं 
बस कुछ सुनने में आना चाहिए 
बाकी सब तो वो खुद कर लेंगे 
एक चेहरे पर कई मुखौटें लगाए हुए हैं 
चेहरे पर मुस्कान दिल में जहर भरे बैठे हैं 
पग - पग पर सांप और बिच्छू सरीखे 
डंक मारने - डसने को तैयार हैं 
उनको मौका क्यों देना है 
थोड़ा चालाक भी बनना है 
हमारा सब हमारे तक ही सीमित रहे 
सब पर जाहिर न हो 

Saturday, 8 August 2026

वह बहुत अच्छा है

वह कहती अक्सर अपने सहेलियों से 
अपने परिवार- रिश्तेदारों से 
उसका लाईफ पार्टनर बहुत अच्छा है 
उसकी सब जरूरतें पूरी करता है 
हर फर्माइश पूरा करता है 
सर ऑंखों पर बिठाकर रखता है 
किसी चीज की कमी नहीं होने देता 
बस वह अपनी ईच्छा से कुछ नहीं कर सकती 
कोई निर्णय नहीं ले सकती 
कहीं आ - जा नहीं सकती 
किससे बात करनी किससे नहीं 
किससे दोस्ती करनी किससे नहीं 
कपड़े कैसे पहनना कैसे नहीं 
खाना क्या बनाना क्या नहीं 
यह सब वह डिसाइड करता है 
हाॅ वैसे वह बहुत अच्छा है 
दिल का साफ है 
बस कभी-कभार गुस्सा आ जाता है 
हाथ उठा देता है 
लग जाए ज्यादा तो डाॅक्टर के पास ले जाता है 
देखभाल करता है 
दवाई अपने हाथ से खिलाता है 
हाॅ वैसे वह बहुत अच्छा है 
बस उसको जो करता है करने दो 
उसको रोको - टोको मत 
सलाह मत दो 
उसे पसंद नहीं किसी की बात सुनना 
उससे बस काम की बात हो तो करो 
अन्यथा उसे कुछ सुनने में रूची नहीं 
उसकी बात चुपचाप सुन लो 
अपनी बात मत रखो 
तुम हमेशा हंसती रहो 
वह गुस्सा हो , जलील करें तब भी 
तुम्हें रूठने - नाराज होने का हक नहीं 
किसी को मनाना उसकी फितरत नहीं 
उसकी हर बात पत्थर की लकीर
समझौता उसके स्वभाव में नहीं 
आर या पार
थोड़ा डर कर रहो 
मुंह बंद कर रहो 
आज्ञानुसार चलो 
हाॅ वह बहुत अच्छा है 
बस उसको जानने - समझने की जरूरत है 
एक बार समझ लो ऐसे व्यक्ति को 
फिर सब कुछ अच्छा 
जीवन जेल में कैदी जैसा हो तो क्या हुआ 
खाना - पीना मिल रहा है 
आराम से जीवन यापन हो रहा है 
और क्या चाहिए 
तभी तो सबसे कहती फिरती है 
वह बहुत अच्छा है