Friday, 7 August 2026

साड़ी से परहेज ???

समय बदलता है 
एक वक्त जो जरूरी लगता था आज वह भार लगता है 
वह है उसमें से एक साड़ी 
जो धीरे - धीरे हो गई भारी 
कभी बहाने बनाए जाते थे 
अवसर ढूंढा जाता था 
अवसर की  दुहाई देकर नई साड़ियाँ खरीदी जाती थी 
आज वह साड़ी अलमारी की शोभा बढ़ा रही है 
अब न पहनने के सौ बहाने ढूंढे जाते हैं 
एक समय की पसंद आज नहीं भाती 
मन से उतर रही है 
कारण कुछ भी हो लेकिन यही हो रहा है 
ऐसा लगता है 
यह धीरे- धीरे लुप्त हो जाएगी 
व्यक्ति का स्वभाव है 
जो उसे आरामदायक लगे 
कम्फरटेबल महसूस हो 
इसका एक अनुभव स्वयं का 
हमारे कार्यस्थल में कभी साड़ी अनिवार्य थी 
कुछ सालों बाद लोगों की मांग 
आना - जाना , भागा - धापी , बारिश 
बड़ी मुश्किल होती है 
परमीशन मिल गई 
अब आलम यह है 
नोटिस आती है कि कल यह पोग्राम है 
साड़ी पहनना है 
सबने सलवार- सूट को अपना लिया 
क्या नये क्या पुराने 
संस्कृत हमारी अपनी भाषा है 
पर वह आज मरने की कगार पर है 
सांस ले रही है क्योंकि वह आम आदमी के लिए क्लिष्ट है 
वही हाल साड़ी का हो रहा है 
यह हमारी भारतीय पहचान है 
फिर भी छूटी जा रही है 
साड़ी का स्थान दूसरे परिधानों ने ले लिया है 
सभी को कम्फर्ट जोन चाहिए 
साड़ी उसमें फिट नहीं बैठती है 
उसको भी कुछ तो बदलना पड़ेगा 
तभी शायद वह स्थान ले पाएगी 
हम जानते है और मानते भी हैं 
साड़ी तो अपने आप में बेमिसाल है 
उसके जैसा परिधान कोई नहीं 
फिर क्यों पकड़ छूटती जा रही है 
कभी शरीर की शोभा बनने वाली 
अलमारी की शोभा बढ़ा रही है 
यह हमारी पहचान है 
इसे इस तरह से उपेक्षित नहीं करना है 
पहनिए सब 
पर साड़ी से परहेज न हो 

Thursday, 6 August 2026

यही तो है संसार

सांझ होने की तरफ
सूरज धीरे - धीरे ढलान पर
बहुत समय लग रहा है 
सब इंतजार में हैं 
कब इनका प्रस्थान हो 
आभा कम हो रही है 
जाते - जाते मद्धिम होते जाते हैं 
प्रकाश धीमी गति लेने लगता है 
अंधकार का साम्राज्य घिरने वाला है 
प्रतीक्षारत में सब
कभी प्रकाश का स्वागत 
कभी अंधकार का इंतजार 
इनके बीच में जग डोलता 
कभी उजाला कभी अंधेरा 
जीवन का यही है खेला 
यही तो है संसार 

अपनी - अपनी समझ

क्या करें 
हम सबको समझ नहीं आते हैं 
क्यों ??
समझ नहीं पाए 
ऐसा नहीं कि आप समझ न पाए 
नासमझ आप भी नहीं 
हम भी नहीं 
समझदार हम भी समझदार आप भी
अब समझना ना चाहे तो बात और है 
यह सब समझ समझ का फेर है 
जो हमको समझ गए 
हम उनके होकर रह गए 
जो नहीं समझे उनसे किनारा कर लिया 
हमें अपना स्वयं प्यारा है 
किसी और से कुछ नहीं अपेक्षा
बस हमको समझे 
दिखावट हमें पसंद नहीं 
जो है जैसे हैं 
उसी में अपना लो 
अन्यथा रास्ता नाप लो 
तुम अपने रास्ते 
हम अपने रास्ते 

Tuesday, 4 August 2026

क्या बात हुई??

मैं जा रही थी 
तुमने मुझे जाने के लिए नहीं कहा था 
मैं स्वयं गई 
तुमने मुझे रूकने के लिए भी तो नहीं कहा 
पूछा भी तो नहीं 
क्यों जाना है 
क्या हुआ 
कुछ नहीं बात
कोई नहीं प्रतिक्रिया 
घर तुम्हारा था 
गलतफहमी मेरी थी 
मैंने उसे अपना माना था 
किसी और के चीज को अपना मानना 
यह तो सरासर बेवकूफी है 
हो सकता है 
तुम चाहते हो कि मैं चली जाऊ 
संकोच वश कभी बोल नहीं पाए 
इधर-उधर की बात होती रही 
मुद्दों पर बात हुई नहीं 
हंसी - मजाक में टाल दिया गया 
हर बार मजाक नहीं भाता 
जिंदगी भी मजाक करती है तब 
तब सब कुछ खत्म कर देती है 
हंसना नहीं आता 
वह ऐसा झटका देती है कि चारो खाने चित्त 
कुछ नहीं सूझता है 
सब प्लान धरा का धरा रह जाता है 
तब न तुम कुछ कह पाते हो 
न मैं कुछ कह सकती 
बस सोचते रह गए 
क्या बात हुई  ???