Thursday, 4 June 2026

मुझे बहुत कुछ अच्छा लगता है

मुझे बहुत कुछ अच्छा लगता है 
पर उस पर अमल करू??
मुझे बच्चें अच्छे लगते हैं 
इसका यह मतलब नहीं कि  बच्चें जनू 
मुझे बगिया और फूल अच्छे लगते हैं 
इसका यह मतलब नहीं कि मैं उनकी देखभाल करू 
उनको खाद - पानी दूं 
मुझे लोगों का सजना - संवरना अच्छा लगता है 
लेकिन मैं खुद सजू - संवरु यह भाता नहीं 
मेरी ईश्वर पर अटूट श्रद्धा है 
पर मैं कोई व्रत  - उपवास,  मनौती , पूजा - पाठ उतना नहीं करती 
मुझे पर्यटन स्थल अच्छे लगते हैं 
पर मैं आराम पसंद व्यक्ति 
भटकना मेरी फितरत नहीं 
मुझे बात करना अच्छा लगता है 
पर हर व्यक्ति से बात नहीं कर सकती 
प्रेम मैं बहुत लोगों से करती हूँ 
पर विश्वास सब पर नहीं 
मुझे बड़ी - बड़ी बातें अच्छी लगती है 
पर मैं उनके जैसे बनूं , यह नहीं हो सकता 
मुझे सर पर पल्लू रखी भारतीय नारी अच्छी लगती है 
पर मुझे अपने सर पर रखना कभी भाया नहीं 
बिछिया , बिंदी , चूड़ी में मेरा दम घुटता है 
मुझे सूर्योदय भाता है 
पर सुबह उठकर टहलना 
किरणों का आस्वाद लेना नहीं 
मुझे पशु - पक्षी भी अच्छे लगते हैं 
पर मैं उनका पालन करू ऐसा नहीं होता 
मुझे पड़ोसी भी अच्छे लगते हैं 
पर किसी की दखलअंदाजी  पसंद नहीं 
मैं सबसे प्रेम से बात करती हूँ 
पर अगर वह नहीं करें तो मैं देखती भी नहीं 
हवा तो अच्छी लगती है 
समुद्र की लहरे भी अच्छी लगती है 
पर मैं उनके साथ उड़ू 
उनमें जाकर डुबकी लगाऊ??
मुझे नृत्य भी अच्छा लगता है 
पर अपने पैर कभी थिरकाएं नहीं 
मुझे गांव भी अच्छा लगता है 
पर वहाँ रहना नहीं 
बहुत सी बातें जो अच्छी लगती है 
वह करना जरूरी तो नहीं 

Wednesday, 3 June 2026

अपना कौन लगता

चांद इतना दूर
फिर भी लगता पास है
वह अपना लगता है
लगता जैसे बतियाता है
अपनी शीतल चांदनी देता है
तारों के खेल दिखाता है
कहते हैं उसमें दाग है
वह तो हममें भी है
कोई भी तो पूर्ण नहीं
कमजोरियाँ और दोष सभी में
इसके साथ भी तो चांद को पूजा जाता है
उससे सुहागिने करवा चौथ के दिन दुआ मांगती है
बच्चों को उसमें मामा दिखाई देता है
अपना प्यारा चंदा मामा

सूरज तो बहुत पास है
फिर भी लगता दूर है
उसका इतना तेज कि
ऑखे भी उठाकर कुछ देर नहीं देख सकते 
पूर्ण प्रकाश से भरपूर
उर्जावान
कोई कमी नहीं
सबको प्रकाश के साथ जीवन भी देता
फिर भी वह करीबी नहीं लगता
मन में शीतलता नहीं आती
डर लगता है

यही बात तो रिश्तों में भी है
कुछ रिश्ते बहुत संपन्न 
बहुत बडे , बहुत नामचीन
बहुत इज्जतदार
पर उनका हमें क्या फायदा
वह कहने के लिए रिश्ते
उससे करीब महसूस किया जाता
कुछ अजनबियों से
कुछ बिना नाम वाले रिश्तों से
जहाँ विश्वास होता है
ये कुछ न कुछ हमारे लिए जरूर करेंगे
कुछ नहीं तो हमारे मन की बात सुनेंगे
हमें समझेंगे
अपनी हैसियत से हमारी तुलना नहीं करेंगे
वह सूर्य भले हो चमकता
पर हमारे किस काम का

Tuesday, 2 June 2026

मां

किन शब्दों में वर्णन करू माँ तुम्हारी
यहाँ तो शब्द ही निशब्द
जहाँ शब्द असमर्थ
वही से तुम
तुम क्या हो
भूखे पेट का पहला कौर
अंधेरे में पहला प्रकाश
वेदना में पहली पुकार
तपते सूरज में पहली आग
सुलाने में तुम्हारी गोद
सर पर हाथ फेरने वाली ममता
हर कुछ तुमसे
तुमसे इतनी अपेक्षा उतनी ईश्वर से भी नहीं
जब सब असमर्थ तब तुम समर्थ
पता है 
वह ना न कहेंगी
हर फरियाद भी तुम्ही से
सारा रोष भी तुम पर 
सारी कुंठा और निराशा भी तुम पर
सारी शिकायत भी तुम्हीं से
पता है
सारा विष स्वयं पी जाओगी
अमृत मुझे दे दोगी
ईश्वर तो नहीं हो तुम
अगर ईश्वर की जगह तुम होती
तब ऐसा भाग्य लिखती
संतान को दुख का साया भी न पडने देती

Sunday, 31 May 2026

अब भी संभल जाओ

अब भी संभल जाओ
मंदिर और मूर्ति को छोड़ अस्पताल निर्माण करो
पूजाघर कम रहेंगे तब भी कोई बात नहीं
ईश्वर के दर्शन कर लेंगे
जीवित रहेंगे तभी न
आज अस्पताल खुले है
पूजास्थल बंद है
अस्पताल की संख्या कम पड रही है
हर कस्बे , गाँव और कुछ कुछ दूरी पर धार्मिक स्थल
पर हर जगह अस्पताल नहीं
जनसंख्या के अनुपात से अस्पताल नहीं के बराबर
महान विभूतियों के स्टेच्यू बनाए जा रहे हैं
करोडों रूपए खर्च
भव्य से लेकर छोटे छोटे तक
न जाने कितने
जिन पर पक्षियों का बसेरा
बीट पडे हुए
जो उनका भी अपमान
इससे अच्छा तो मानव सेवा की खातिर
उसी जगह में उनके ही नाम से छोटा दवाखाना होता
आज संकट काल में महसूस हो रहा है
किसकी आवश्यकता है
ऐसा नहीं कि पहले से नहीं है
बीमार होने पर अस्पताल में कैसे एडमिट होंगे
कौन सा और कितना खर्चीला
लेंगे कि नहीं
यह भी सोचना पडता है
हर एक दो किलोमीटर के दायरे में अस्पताल हो
बीमार होने पर यह चिंता न करनी पडे
स्वस्थ रहेंगे तभी ईश्वर का दर्शन भी करेंगे
जिंदा रहेंगे तभी पूजा-पाठ भी करेंगे
कहते हैं न
भक्त से ही भगवान है