Sunday, 5 July 2026

मेरी अम्मा का मजबूत शस्त्र

अम्मा कब रोती नहीं ??
बचपन से देखा 
ऑख में ऑसू ही गाहे - बगाहे 
कारण कभी-कभार पता भी नहीं चलता था 
दुख और पीड़ा में तो रोती ही 
खुशी के पल में भी ऑसू छलक जाते थे 
कभी अतीत को याद कर रोती 
कभी अपनों को याद कर रोती 
कहती कुछ नहीं बस ऑसू छलकाती  
कभी हमारी गलती पर रोती 
न डाटती न मारती बस रोती 
और हम गलती करने पर पछताते 
बड़ी ताकत है इन ऑसूओं में 
आज भी बात करती मोबाइल पर तब रोती 
यह एक इमोशनल ब्लेकमेल जैसा हुआ 
अब तो ऐसा लगता है 
कभी हंसते हुए देखा नहीं 
रोता देख कभी अच्छा नहीं लगता 
फिर एक दिन समझ आया 
रोना मतलब नार्मल है 
न रोये तो खतरा है 
क्या मां ऐसी ही होती है 
आशीर्वाद देते भी ऑख में पानी भर आना 
कभी बच्चों को याद कर रोती है 
कभी उनकी चिंता में ईश्वर से प्रार्थना कर रोती है 
ईश्वर भी उसके ऑसूओं पर पसीज जाता होगा 
कहते हैं जहाॅ 
शब्द असमर्थ हो जाते हैं वहाँ ऑंसू काम आते हैं 
बड़ी ताकत है इन आंसुओं में 
मैं भी मां हूँ पर अम्मा जैसी नहीं 
यहाँ ऑंसू कम गुस्सा ज्यादा 
शब्द ज्यादा 
जो कभी-कभार बात को बिगाड़ भी देते हैं 
अम्मा के ऑंसू का पावर
अब भी है बरकरार 
सब हो जाते उसके आगे निरूत्तर 

विधवा ???

विधवा ??
विधवा यह शब्द चुभता है
असहायता का प्रतीक  लगता है
विधवा शब्द सुनते ही
एक मुर्ति  जेहन में उभरती है
रंगहीन जीवन का
सफेद साडी में लिपटी 
न हाथ में चूडियां 
न माथे पर बिंदी 
न गले में मंगल सूत्र 
न मांग में सिंदूर 
न शरीर पर गहना
रंगों  से टूटा नाता
रंगहीन जीवन 
यही था विधवा का रूप
पति ही परमेश्वर 
वह नहीं तो सब सून
इसलिए सती हो जाओ
आग में जल जाओ
मरना आसान था जीना मुश्किल 

आज समय बदला 
अब वह हालात वह विचार न रहें 
अब उसको भी जीवन जीने का  हक
पहनने - ओढने  
खाने - पीने
घूमने- फिरने की आजादी 
वह अब सक्षम है 
उसका जीवन पति के साथ खत्म नहीं हुआ है
वह विधवा है इसलिए दया का पात्र है
यह न समझा जाएं 
जमाना बदला है
तब नजरिया भी बदला जाएं 

विधवा शब्द को ही भूला दिया जाएं 
विधवा है
परित्यक्ता  है
इन शब्दों की जरूरत ही क्या है
बस व्यक्ति ही रहने दिया जाएं 
लाचारी और विवशता तथा सहानुभूति 
इसकी कोई आवश्यकता नहीं 
वह पैरों पर खड़ी हो
आत्मनिर्भर हो
केवल ब्याह - शादी के मापदंड पर न मापा जाएं।

Saturday, 4 July 2026

मन में रह गई

जो कहना था वह तो रह गया 
न जाने कितनी बातें थी 
वह मन में रह गई 
जब - जब कहना चाहा 
जुबां ने साथ नहीं दिया 
कहना चाहा कुछ कहा कुछ
एक कसक मन में रह गई 

एक माता - पिता का दर्द

तुम तो चले गए 
हमको रोता - बिलखता छोड़कर 
न जाने क्या-कुछ सपने देखे थे 
सब कुछ खत्म हो गया 
हमारे लिए तो वक्त ही ठहर गया 
हर वक्त हर पल तुम पर था वारा 
तुमको अपनी जान से ज्यादा चाहा था 
तुम जान थे हमारी 
दिल की धड़कन थे 
दिल खुश रहता था तुमको देख - देख कर
हमारी ऑखों  के तारें 
तुम हमसे दूर तारों की दुनिया में चले गए 
हमसे तो जीते - जी हमारी जिंदगी छीन ली 
अब किसको दे उलाहना 
उस ऊपर वाले को 
जिसने हमारी गोद में तुमको डाला था 
हमें माता - पिता बनाया था 
तुम्हारे जन्म पर खूब जश्न मनाया था 
छठी - बरही में अपनों को खिलाया था 
सोहर गीत गवाया था 
घर गूंज उठा था 
तुम्हारी किलकारी से 
वंश के दीपक थे 
नहीं सोचा था 
यह दीपक इस तरह बूझ जाएगा 
हमको इस हालत में छोड़ जाएंगा 
अपने साथ हमारी सब खुशियां ले जाएंगा 
अब क्या करेंगे जीकर 
रोना ही है जीवन भर 
वक्त ने वह मार मारा है 
अब तो संभलना मुश्किल है 
क्या करेंगे क्या न करेंगे 
कैसे रहेंगे कैसे जीएंगे कैसे सहेजेगे
 कहना मुश्किल 
अब तो आँख के आंसू भी कभी न सूखेंगे 
होठों पर हंसी भी न आएगी 
सारी इच्छाएं मर गई 
तुम नहीं मरे 
हम जीते जी मर गए 
अब इससे बड़ा दुख क्या होगा 
अपनी ही संतान को कांधा  देना 
जिस पर कभी हमको जाना था वह हमसे पहले चला गया 
किसको दोष दें 
ईश्वर को 
भाग्य को 
समझ नहीं आ रहा 
अब तो शरीर बचा है 
सांस चल रही है 
अंतर्मन मर चुका 
चूक कहाँ हुई 
सोच रहे हैं 
कैसे हुई 
कारण को ढूंढ रहे हैं 
इससे क्या हासिल 
जो होना था वह तो हो गया 
हमारा जीवन आधार हमको निराधार कर गया 
हम कुछ न कर पाए 
बस पत्थर बन 
हम विवश देखते रह गए