Saturday, 9 May 2026

ऐ जिंदगी

जीना तो कुछ और तरह से चाहती थी 
वैसा कुछ हुआ नहीं 
बड़े अरमान और सपने भी न थे 
बस छोटी - छोटी ख्वाहिशें थी 
वह भी मयस्सर नहीं हुई 
स्वाभिमान को भी ताक रखना पड़ा 
न जाने किस - किसके सामने झुकना पड़ा 
बिना दोष के भी दोषी बनना पड़ा 
कोई न समझ पाया न समझने को तैयार 
बिन कारण भी बातें सुननी पड़ी 
परायों की तो क्या कहें अपनों की भी 
हर जगह बस समझौता 
बस निभाना 
बोलने का अधिकार नहीं 
अपना पक्ष भी रख न सकी 
कभी-कभार मन में आता है 
क्या ऐसा ही जीवन होता है 
या हमारे हिस्से में ही 
प्यार बहुत करते हैं मेरे अपने 
अपना कर्तव्य भी निभाते हैं
बहुत कुछ किया है और करते भी हैं 
लेकिन स्वतंत्रता नहीं दिखती है उसमें 
एक बंधन और जकड़न सी है 
लगता है जबरदस्ती बांधा गया है 
बंधी हुई कोई भी चीज मन को आनंदित नहीं करती 
हर जगह आपको परीक्षा देना पड़े 
अपने को सही सिद्ध करना पड़े 
विश्वास दिलाना पड़े 
तब जीवन का वह मजा नहीं 
जहाँ बोलने के पहले सोचना पड़े 
वहाँ अपनापन ही क्या 
जहाँ मन न खोल सके 
बस कमियां निकाली जाए 
यह तो ऐसा पिंजरा है 
जहाँ से न बाहर निकला न जा सकता है 
न अंदर शांति से बैठा जा सकता है 
सबको जोड़ते- जोड़ते टूटता रहा अंदर कुछ 
फिर वही पूछते हैं 
क्या हुआ 
सब कुछ तो अच्छा चल रहा है 
इसे अच्छा चलाने के लिए गिरते रहे हैं 
गिड़गिड़ाते रहे हैं 
झूठी हंसी बिखेरते रहे हैं 
फिर भी कोई कभी बात पर बतंगड़ बनाया तो कभी आवाज पर
अब तो डर लगता है सबसे 
कहीं कोई गलती न हो जाए 
कोई संबंध न तोड़ लें 
बचने की कोशिश रहती है हर दम
इंसान ही हैं हम 
कभी - कभी खुशी में अपनी औकात भूल जाते हैं 
लेकिन यह ज्यादा समय टिकता नहीं 
औकात दिला ही दी जाती है 
फिर वापस अपनी दुनिया में लौट आते हैं 
मन में विचार उमड़ते - घुमड़ते हैं 
बाद में बादल बन बरसते हैं 
उनको भी छुपाना पड़ता है 
बस अकेले में व्यक्त करना पड़ता है 
हंसी आती है ऐसे जीवन पर
दिखता कुछ होता कुछ 
शायद ऐसा जीवन तो नहीं चाहा था 
पर मिला और हमने भी शिद्दत से निभाया 
कोई साक्षी हो न हो 
जिसने यह जीवन दिया है वह तो है 
तभी तो हर कठिन को आसान बनाया 
जो लोगों ने किताबों में पढ़ी है वह हमने जी है 
मलाल कतई नहीं 
कुछ बात तो हममें भी थी 
वरना सबको कहाँ ऐसी मिलती है 

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