Sunday, 31 May 2026

अब भी संभल जाओ

अब भी संभल जाओ
मंदिर और मूर्ति को छोड़ अस्पताल निर्माण करो
पूजाघर कम रहेंगे तब भी कोई बात नहीं
ईश्वर के दर्शन कर लेंगे
जीवित रहेंगे तभी न
आज अस्पताल खुले है
पूजास्थल बंद है
अस्पताल की संख्या कम पड रही है
हर कस्बे , गाँव और कुछ कुछ दूरी पर धार्मिक स्थल
पर हर जगह अस्पताल नहीं
जनसंख्या के अनुपात से अस्पताल नहीं के बराबर
महान विभूतियों के स्टेच्यू बनाए जा रहे हैं
करोडों रूपए खर्च
भव्य से लेकर छोटे छोटे तक
न जाने कितने
जिन पर पक्षियों का बसेरा
बीट पडे हुए
जो उनका भी अपमान
इससे अच्छा तो मानव सेवा की खातिर
उसी जगह में उनके ही नाम से छोटा दवाखाना होता
आज संकट काल में महसूस हो रहा है
किसकी आवश्यकता है
ऐसा नहीं कि पहले से नहीं है
बीमार होने पर अस्पताल में कैसे एडमिट होंगे
कौन सा और कितना खर्चीला
लेंगे कि नहीं
यह भी सोचना पडता है
हर एक दो किलोमीटर के दायरे में अस्पताल हो
बीमार होने पर यह चिंता न करनी पडे
स्वस्थ रहेंगे तभी ईश्वर का दर्शन भी करेंगे
जिंदा रहेंगे तभी पूजा-पाठ भी करेंगे
कहते हैं न
भक्त से ही भगवान है

बदलाव

कुछ नहीं बदला है 
समाज वहीं का वहीं खड़ा है 
उसकी सोच भी वैसी ही है 
बस दिखावा रहता है 
सोच वैसी की वैसी है 
औरत के प्रति नजरिया 
बदला नहीं है 
विवाह की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है 
सब कुछ छिन्न भिन्न 
क्योंकि जिस पर दारोमदार था 
वह ही बदल रही है 
अपना महत्व समझ रही है 
और जहाँ अपने लिए सोचा 
वहाँ त्याग की बातें बेमानी 
बदलाव पर खड़ा समाज 
क्या होगा 
राम जाने 

Saturday, 30 May 2026

बाप तो बाप होता है

बाप तो बाप होता है
हर हाल में बच्चों का भार ढोता है
अपने स्वयं कपडे पुराने पहनता
बच्चों को नया पहनाता
दिन रात एक करता
अपना निवाला उनके मुंह में डालता
सर पर बोझ लेकर चलता
बैल की जगह खुद भी जूत जाता
श्रम पसीना एक करता
संतान के भविष्य को बनाता
कहना बहुत कुछ चाहता
कह नहीं पाता
उसकी कठोरता संतान को नहीं भाता
उसके अंदर की कोमलता कोई देख नहीं पाता
वह भी चाहता तो आराम से रहता
वह ऐसा नहीं करता
वह दशरथ की तरह पुत्र मोह में प्राण भी देता
वह धृतराष्ट्र की तरह इतिहास में बदनाम भी होता
वह किसी से नहीं हारता
अपनी संतान से हारता
कितना प्रेम करता
वह नहीं किसी को दिखता
माता का प्रेम जग-जाहिर
पिता का प्रेम उसका उल्लेख कहीं नहीं
आसमान की छत्रछाया है पिता
धरती डोलती है
आसमान नहीं डोलता
नदी पिघलती है
पर्वत नहीं पिघलता
वह प्रहरी बन हमेशा खडा रहता
टूट जाता है
पर झुकता नहीं
वह पिता है
संतान से उपेक्षित
फिर भी उसके लिए चिंतित
घर का कर्ता धर्ता
सब कुछ पिता
सब निश्चिंत होते
जब तक साथ रहता पिता का
अपने से ज्यादा संतान को प्यार करता
बाप तो बाप होता है
हल हाल में बच्चों का भार ढोता है

Thursday, 28 May 2026

रफ बुक

रफ बुक 
परिवार  में  रहना और निभाना
त्याग  और बलिदान 
सबको समेट  कर  चलना
इतना  आसान  नहीं  होता 

हम पढते समय रफ  बुक का उपयोग  करते  हैं 
शुरुआत  में  ही  स्कूल- काॅलेज  में  पहले दिन ही
हाथ में  जो होती  है  वह एक बुक
और सब बाद में  बनती है
हर विषय  की अलग-अलग 
कवर के साथ साफ - सुथरा 
कभी भूल गए  ले जाना
रफ नोट बुक में  लिख लिया 
उसके बिना काम  नहीं  चलने वाला 

परिवार  में  भी कोई  न कोई  ऐसा होता है
जो सबको अपने  में समाहित  करता  है 
उसकी मदद  से सब काम  हो जाते हैं 
जिसको भी जरूरत  पडती है
वह उसके  पास आता है

ऐसे व्यक्ति  की वैल्यू  नहीं  होती 
न समझ में  आती  है 
जैसे रफ बुक 
वह न हो तो सारा गणित  गडबडा जाएंगा
मुखिया  का महत्व  तो जग-जाहिर है 
पर उस व्यक्ति  का ??

Monday, 18 May 2026

मां उदास है

माॅ है कि वह खुश नहीं रहती
जब देखो उदास
ऑखों में ऑसू
क्या कमी है
समय पर खाना पीना
दवाई और जरूरत का सामान
वैसे ज्यादा किसी चीज की जरूरत नहीं है
फिर ऐसा क्यों ??
माॅ के मन को कैसे समझेगा कोई
उसे प्यार चाहिए
सम्मान चाहिए
अपनापन चाहिए
बतियाना चाहिए
वह तो मिलता नहीं
सब अपना कर्तव्य निभा रहे हैं
मैने भी तो कर्तव्य निभाया है 
खुशी खुशी
बडा किया
लिखाया पढाया
आत्मनिर्भर बनाया
पर कभी जताया नहीं
बच्चों की खुशी के आगे स्वयं को तवज्जों नहीं दी
रसोई में लगी रही
सुस्वादु भोजन बनाने में
फरमाइश पूरा करने में
बच्चों को खाते देख स्वयं तृप्त
आज तो मेरे चेहरे की तरफ भी देखने की फुर्सत नहीं
बात करने की तो छोड़ो
समय नहीं है
यह तो बहाना है
अगर चाहे तो समय क्यों नहीं
सब काम समय से
बस मेरे पास दो घडी बैठने का समय नहीं
मैने तो अपनी जिंदगी न्योछावर की है
तुम लोग थोड़ा सा समय नहीं दे सकते

Saturday, 16 May 2026

परिवार

परिवार  तो परिवार  होता है
अपने  तो अपने  होते हैं 
नोक - झोंक  , लडाई  - झगड़ा 
यह तो होता  ही रहता है
इनके  बिना तो जीने का मजा भी जाता रहता है 
प्रेम  और अपनापन  भी होता है
संपूर्ण  अधिकार  होता है
जताना और बताना नहीं  पडता 
मन की डोर एक - दूसरे से बंधी रहती  है 
हर रिश्ते का एक नाम होता है
ननिहाल  ,ददिहाल, मायका ,ससुराल 
एक माता का और एक पिता का
दोनों  के रिश्तों  से बंधे सारे रिश्ते 
चचेरा ,ममेरा  ,फुफेरा 
सब रक्त  संबंधों  में  लिपटे
इनको अपने आप से लिपटाना 
संबंधों  की  अहमियत  समझना 
इनको जीवित रखना
अगर वेंटिलेटर  पर है
सांस है तब मरने नहीं  देना है
अभी भी बचाया जा सकता है
कुछ  भूले कुछ  याद करें 
खट्टी  मीठी यादों  में  विचरण  करें 
कडवाहट  को  दूर करें 
चार दिन की जिंदगी 
इसके दायरे को असीमित  करें 
अपने ही परिवार  नहीं  औरों  को भी  साथ जोड़े 
जोड़ने  में  जो मजा वह तोड़ने  में  कहाँ 
मिलने में  जो आनंद  हैं  वह बिछुड़ने  में  कहाँ
अपनाने में  जो मजा है वह छोड़ने  में  कहाँ 
सबको साथ लेकर चलने में  जो मजा वह अकेले में कहाँ

Tuesday, 12 May 2026

समय बड़ा बलवान

आज जब समय कुछ नासाज है
तब लगता है
हमारी आवश्यकताए क्या है
सबसे बडी प्राथमिकता पेट भर भोजन
रहने को छत
पहनने के लिए कुछ कपड़े
घर में है
इसलिए ताम झाम नहीं
जीवन सरल और सादा भी हो सकता है
सब कुछ बटोरता है 
साथ कुछ नहीं ले जाता
सब यही रह जाता है
यादें भी धीरे-धीरे धूमिल पड जाती है
दिन  , महीने और ज्यादा हुआ तो कुछ वर्षों तक
अपनों को छोड़कर
पर वहाँ भी जब नई पीढ़ी का प्रवेश होता है
तब उनको उससे कोई सरोकार ही नहीं
क्योंकि वे उस इंसान से अनभिज्ञ होते हैं
उन्हें क्या मतलब किसने क्या त्याग किया
समय के साथ तो सत्य की परिभाषा भी बदल जाती है
आज गाँधी और नेहरू पर भी ऊंगली उठाई जा रही है
वे कितने साल जेल में रहे
क्या क्या किया
वह कोई मायने नहीं
और यह केवल एक की बात नहीं
पूरे विश्व में ही है यह नजरिया
दीवार टूटी
मूर्ति ढहा दी गई
वर्तमान ही सत्य है
जो हो रहा है
कल कोई आपको याद नहीं रखेंगा
वह परिवार हो 
वह समाज हो
वह व्यक्ति हो
देश हो
सब भूला दिया जाता है
योगदान भूला दिया जाता है
सही है न
    सिकंदर ने पौरंष से की थी लडाई
तो हम क्या करें

Sunday, 10 May 2026

मेरी मां

मैंने उस फौलाद को देखा है 
जो लाख आंधी - तूफानों में भी डटकर खड़ी रही 
कभी हार नहीं मानी 
मेहनत को उसने अपना भाग्य बनाया 
हमेशा सबको देती रही 
हर सुख - दुख में सबके साथ खड़ी रही 
कभी उसके मुख से तेज आवाज भी नहीं सुनी 
कभी अपने बच्चों पर हाथ भी नहीं उठाया 
बच्चें ही उसकी पूंजी असली धन 
वह ज्यादा पढ़ी - लिखी नहीं 
तब भी ककहरा तो उसने ही सिखाया 
शिक्षा को सर्वोपरि माना 
बच्चों के लिए सपना ही नहीं देखा उन्हें साकार भी किया 
वह देहात - गांव की थी 
फिर भी कभी उसके मुख से एक फूहड़ शब्द या ताने नहीं सुने 
न हमको कभी सिखाया 
वह बाहर की दुनिया से अंजान रही 
रसोई में ही उसकी दुनिया सिमटी रही 
अन्नपूर्णा का साक्षात अवतार 
कभी उसके दर से खाली पेट कोई नहीं गया 
सबको देती रही उसके बदले शायद उसको कभी कुछ मिला नहीं 
ईश्वर पर अपार आस्था 
कुछ ऐसे अवसर भी आएं जीवन में 
जहाँ उसे टूटना चाहिए था 
बिखरना चाहिए था 
वह तब भी वैसे ही अडिग रही 
उसने अपनी बांहों पर भरोसा किया 
जितना प्यार देना था दिया 
वह पैसे से भले संपन्न नहीं थी मन से तो बहुत थी 
गजब का साहस और हिम्मत 
पूरे परिवार की धूरी 
अपने दम पर परचम फहराने वाली 
उस घरेलू और हिम्मती मां को मैंने देखा है 
बेटी - बहन - बहू - भाभी - चाची - दादी - नानी - मामी - फुआ 
हर रिश्ता क्या बखूबी निभाया 
कभी किसी के मुख से मां के बारें में कुछ अनुचित सुना नहीं 
दुश्मन को भी ऊंचा पीढ़ा देने की बात करना 
अनगढ़ पत्थर को भी तराश कर रूप देना 
नारी के सारे गुण 
स्नेह - दया - प्रेम - त्याग- सौंदर्य की मूर्ति 
सादा जीवन उच्च विचार धारण करने वाली 
अपने आंसू को अस्र बनाने वाली 
उस फौलादी मां को सलाम 
एक चुप्पा सौ को हराए का सिद्धांत 
हमें कभी-कभार कोफ्त होता था 
पर यह उसका अपना जीने का अंदाज 
कभी न किसी के सामने हाथ फैलाया न मांग की 
समय फिर भी बड़ा बलवान है 
उम्र के आखिरी कगार पर है 
देख कर दुख होता है 
मां का बुढ़ापा 
सहन नहीं होता है 
उसे उसके उसी फौलादी रुप में देखने की आदत जो है 
मैं तुम्हें क्या दूंगी 
जो कुछ भी हूँ वह तो तुम्हारें ही कारण हूँ 
तुम्हारा अंश हूँ 
कुछ प्रतिशत भी वैसे हो जाए तो खुशनसीबी हमारी 
तुम्हारें बारे में कुछ कहना या लिखना 
सूर्य को दीया दिखाना हुआ 
बहुत दिया तुमने 
बहुत बांटा प्रेम और अपनापन 
अब तो ईश्वर तुम्हारी भक्त तुम पर ही निर्भर 
बहुत कुछ विस्मरण होने लगा है 
भूलने लगी है 
शायद यह अच्छा भी है 
दुखद स्मृतियां जुड़ी है 
बस अपने बच्चों को मत भूलना 
हमेशा सुबह चार बजे भोर में प्रार्थना करती रहती थी 
वह क्रम कभी न टूटे 
क्योंकि तुम कहती थी ना 
मेरे बच्चों को कोई प्रेम दे या न दें 
मैं कोई कमी नहीं होने दूंगी 
फर्श से लेकर अर्श तक खड़ा करने वाली माता 
तुम्हें शत शत प्रणाम 

Happy mother's day

बिन बोले सब कुछ  जान जाती है माँ 
चेहरे के हर भाव को पढ लेती है माँ 
ध्यान  से देखती है निहारती है
पता नहीं  क्या  ढूढती  है मुझमें 

मन के भावों  को  छुपाना चाहती हूँ 
तुमसे दूर जाना चाहती  हूँ 
तुम्हारा मन न दुखे यह भरसक कोशिश  करती हूँ 
पता नहीं  कौन सी ज्योतिष  विद्या  सीखी है तुमने
सब कुछ  अपने आप जान जाती हो

नहीं  चाहती  तुम्हें  दुखी  करना
पता है न 
तुम माँ  हो भाग्य-विधाता  नहीं 
वह होती तब तो कुछ  और बात होती
सारे संसार  की खुशियाँ  तुम मेरी झोली में  डाल देती

खैर कोई  बात नहीं 
ईश्वर  न हो तब भी माँ  तो हो ही
तुम  ईश्वर  से कम थोड़े  ही हो
भगवान  से तो प्रार्थना  करनी पडती है कुछ पाने के लिए 
तुम  पर तो अधिकार  है तभी तो छीन कर ले लेते हैं 
ऊपर से चार बात भी सुनाते हैं 
इतना नखरे  कौन सहेगा
बिन स्वार्थ  के कौन पूछेगा 

वह तो बस तुम  ही हो सकती हो
मेरी सारी बुराइयों  को  नजरअंदाज कर 
मुझे  पलकों  पर  बिठाने वाली
मेरे  लिए  किसी से भी लड जाने वाली
अपनी  परवाह  न कर
हर पल मेरी खिदमत में  तत्पर 
जैसे  मैं  कोई  महारानी हूँ 
आर्डर  दू और वह तुरंत  हाजिर

नहीं  चाहती  राज पाट
नहीं  चाहती सुख - सुविधा 
बस तुम्हारा हाथ सर पर रहें 
तुम  शतायु  हो
जीती रहो और  मेरे आसपास  डोलती रहो
ईश्वर  की शुक्रगुजार  हूँ 
वह तो साक्षात  नहीं  अवतरित  हो  सकता
तुमको भेज दिया  बस काफी  है

बरखा बिन सागर  कौन भरे 
माता बिन आदर कौन करें 

Happy Mother's day

Saturday, 9 May 2026

ऐ जिंदगी

जीना तो कुछ और तरह से चाहती थी 
वैसा कुछ हुआ नहीं 
बड़े अरमान और सपने भी न थे 
बस छोटी - छोटी ख्वाहिशें थी 
वह भी मयस्सर नहीं हुई 
स्वाभिमान को भी ताक रखना पड़ा 
न जाने किस - किसके सामने झुकना पड़ा 
बिना दोष के भी दोषी बनना पड़ा 
कोई न समझ पाया न समझने को तैयार 
बिन कारण भी बातें सुननी पड़ी 
परायों की तो क्या कहें अपनों की भी 
हर जगह बस समझौता 
बस निभाना 
बोलने का अधिकार नहीं 
अपना पक्ष भी रख न सकी 
कभी-कभार मन में आता है 
क्या ऐसा ही जीवन होता है 
या हमारे हिस्से में ही 
प्यार बहुत करते हैं मेरे अपने 
अपना कर्तव्य भी निभाते हैं
बहुत कुछ किया है और करते भी हैं 
लेकिन स्वतंत्रता नहीं दिखती है उसमें 
एक बंधन और जकड़न सी है 
लगता है जबरदस्ती बांधा गया है 
बंधी हुई कोई भी चीज मन को आनंदित नहीं करती 
हर जगह आपको परीक्षा देना पड़े 
अपने को सही सिद्ध करना पड़े 
विश्वास दिलाना पड़े 
तब जीवन का वह मजा नहीं 
जहाँ बोलने के पहले सोचना पड़े 
वहाँ अपनापन ही क्या 
जहाँ मन न खोल सके 
बस कमियां निकाली जाए 
यह तो ऐसा पिंजरा है 
जहाँ से न बाहर निकला न जा सकता है 
न अंदर शांति से बैठा जा सकता है 
सबको जोड़ते- जोड़ते टूटता रहा अंदर कुछ 
फिर वही पूछते हैं 
क्या हुआ 
सब कुछ तो अच्छा चल रहा है 
इसे अच्छा चलाने के लिए गिरते रहे हैं 
गिड़गिड़ाते रहे हैं 
झूठी हंसी बिखेरते रहे हैं 
फिर भी कोई कभी बात पर बतंगड़ बनाया तो कभी आवाज पर
अब तो डर लगता है सबसे 
कहीं कोई गलती न हो जाए 
कोई संबंध न तोड़ लें 
बचने की कोशिश रहती है हर दम
इंसान ही हैं हम 
कभी - कभी खुशी में अपनी औकात भूल जाते हैं 
लेकिन यह ज्यादा समय टिकता नहीं 
औकात दिला ही दी जाती है 
फिर वापस अपनी दुनिया में लौट आते हैं 
मन में विचार उमड़ते - घुमड़ते हैं 
बाद में बादल बन बरसते हैं 
उनको भी छुपाना पड़ता है 
बस अकेले में व्यक्त करना पड़ता है 
हंसी आती है ऐसे जीवन पर
दिखता कुछ होता कुछ 
शायद ऐसा जीवन तो नहीं चाहा था 
पर मिला और हमने भी शिद्दत से निभाया 
कोई साक्षी हो न हो 
जिसने यह जीवन दिया है वह तो है 
तभी तो हर कठिन को आसान बनाया 
जो लोगों ने किताबों में पढ़ी है वह हमने जी है 
मलाल कतई नहीं 
कुछ बात तो हममें भी थी 
वरना सबको कहाँ ऐसी मिलती है 

Wednesday, 6 May 2026

पहल किसकी तरफ से

मत जोहो 
मत इंतजार करो
मत ज्यादा सोचो
कौन पहले पहल करेगा
कौन पहले बात करेंगा
पहले तुम पहले तुम
कहते-कहते कहीं समय न निकल जाय
खता किसी की भी हुई हो
यह मत सोचो
कभी-कभी मन तो करता है
दोनों तरफ से चाहा भी जाता है
पर इसी सोच के कारण रह जाता है
एक ही बार तो यह अनमोल जिंदगी मिली है
न जाने कब फिसल जाय
और हम पछताते ही रह जाय
नाते रिश्तेदार
यार दोस्त
सबसे निभा कर रहे
कभी-कभी छोटी सी बात की कसक
हम पनपने देते हैं
उसका कुछ फायदा तो है नहीं
बस हमारी अहं की संतुष्टि के लिए
अगर मन करता है
तब मन की मानिए
जिद छोड़ 
आप ही पहल कर ले

Tuesday, 5 May 2026

हम मिडिल क्लास

क्या मिडिल क्लास  मेंटालिटी है
बहुत  बार सुना 
हंसते  - हंसते  टाल दिया 
मिडिल  क्लास  को समझना  सबके बस की बात नहीं 
यह वे लोग हैं  जो राष्ट्र निर्माता  है
समाज  निर्माता  है 
टेक्स पेयर है
सारा दारोमदार  इन्हीं  के  कंधों  पर
सारी अपेक्षाएं इन्हीं  से
परम्परा  का पालन करना 
वर्तमान  में  रहते हुए  उज्जवल भविष्य  का ख्वाब  बुनना
शिक्षा  को पुरजोर बढावा 
विरासत को कायम  रखना
आधुनिकता  को स्वीकार  करना

रहते है दो कमरों  के  घर में 
स्वप्न देखते हैं  अट्टालिकाओं के 
पैसा होते हुए  भी सोच समझ  कर खर्च करते  हैं 
फिजुलखर्ची  इन्हें  बर्दाश्त  नहीं 
चीजों  का इस्तेमाल  करना इन्हें  बखुबी  आता है
टूथपेस्ट  खत्म  होने पर भी काट - पीट कर जब तक खत्म  न हो जाएं  दम  नहीं 
जूस की बोतल में  पानी डालकर खंगार  लेंगे 
रसगुल्ले  की  बची  चाशनी से मीठी  पुरी बना लेंगे
सर दर्द  में क्रोशीन  से काम  चला लेंगे
साबुन जब घिस जाय तब उसके टुकडे  टुकड़े  कर डिटर्जेंट  बना लेंगे
हाथ से बुना स्वेटर 
हाथ से कूटे मसाले बहुत  भाते हैं 
कपडा फट जाएं  तो उसका पोछा बना लेते  हैं 
मगर कामवाली  बाई  को नई साडी भी दीवाली  पर देते हैं 
वाॅचमैन  , पोस्ट मैन को बख्शीश भी देते हैं 
सब्जी वाले से सब्जी  पर धनिया - मिर्ची  मुफ्त  में  मांगते हैं 
पर मेहमानों  की खूब  आवभगत करते हैं 

टैक्सी  नहीं  बस और ट्रेन  से सफर करते हैं 
पर बच्चों  की  शिक्षा  में  कोताही  नहीं  करते हैं 
किश्त पर सामान  लेकर  घर को सजाते हैं 
किसी को अपनी कमजोरी  का एहसास  नही होने देते
कभी-कभी  महंगे होटलों  में  भी खाना खा आते हैं 
मेनू  पर कीमत   देखकर डिश आर्डर  करते हैं 
कभी  कभी  पिकनिक  पर भी जाते हैं 
नाश्ता  घर से बनाकर ले जाते हैं 

रात - दिन मेहनत  करते है
कभी चुपचाप  नहीं  बैठते हैं 
डाॅक्टर  , इंजीनियर  , टीचर यही तैयार  करते हैं 
नेतागिरी इनके बस की बात नहीं 
ये वोट भी मुश्किल  से देने जाते हैं 
हाॅ चर्चा  में  ये किससे पीछे नहीं 
तभी तो बुद्धिजीवी कहलाते हैं 

अमीर  तो अमीर  है उसे पैसे  की  परवाह  कहाँ  
गरीब  तो गरीब  है उसे दो जून को रोटी ही बहुत  है
समाज  की  परवाह  भी इन दोनों  तबको  को नहीं 
यह  मिडिल  क्लास  ही है जो सबको साथ लेकर चलता है
फिर भी सबसे ज्यादा  वहीं  पीसता है
उसे किसी  चीज में  छूट नहीं 
नहीं  कोई  सरकारी बैनिफिट्स 
क्योंकि वह वेतन भोगी है
उसकी कमाई  जग-जाहिर  है
भले यह सब करते-करते  महीने के आखिर  तक कंगाल  हो जाएं 
फिर भी फर्ज  निभाना है
देश और समाज  का भार तो उसे  ही निभाना है ।

जीवन का सार

ऐसा क्यों लगता है 
जीवन एक चोला है 
जिसे हमने वर्षों से धारण किया है 
कभी नया रहा होगा यह
दिन ब दिन पुराना होता जा रहा है 
कभी थोड़ा सा छेद हुआ 
कभी हल्की सी खरोंच आई 
हम उसे रफू करते रहें 
अपने अनुसार बनाते रहें 
पर कब तक ऐसा चलता रहेगा 
अब वह पुराना भी हो रहा है 
घिस भी रहा है 
रंग भी फीके हो रहे हैं 
कहीं - कहीं फट भी रहा है 
जो रफू करने की स्थिति में नहीं 
इस चोले को देखने की चाहत अब नहीं बची 
अब लोगों को यह नहीं लुभाता 
इसका बेरंग आकर्षित नहीं करता 
अब यह शीशे के सामने इतराता नहीं 
अब यह ढंग से संवरता भी नहीं 
अब वह मन भी न रहा 
ऐसा लगता है इससे छुटकारा मिल जाए 
वह हो नहीं सकता 
मोह इतना है कि जकड़ कर रखे हुए हैं 
बहुत प्यार है इससे 
पुराना भले है तो अपना ही 
इसी पर इतराए 
ठहाके लगाए 
हंसे और खिलखिलाएं 
गर्व और घमंड भी किया 
सबसे अच्छा सबसे श्रेष्ठ 
अपने आगे कोई नहीं 
बड़े - बड़ों की छुट्टी कर दी 
परचम लहराया 
हर मुश्किल को आसान किया 
अपनी राह खुद बनाई 
इसकी काबिलियत पहचानी 
वह आज उम्र के कगार पर खड़ा है 
परिस्थितियां बदल गई 
साथ छूटे वह साथ है 
निभा रहा है 
तब तो संभालना इसे भी है 
बहुत मनमानी हो चुकी 
बहुत उपेक्षा कर ली 
अब तो सब छोड़कर शिद्दत से इसका साथ निभाओ 
अंतिम सत्य यही है 
इसका साथ 
जीवन का सार 

Monday, 4 May 2026

सब ठीक है ना

सब कुछ ठीक है
यह छोटे छोटे से शब्द कितना सुकून देते हैं
आई लव यू    से भी ज्यादा
बहुत ताकत है इनमें
अपनों की खैरियत पता चलती है
माँ दूर रहने वाले बेटे से जब पूछती है
बेटा तू ठीक है न
तब माँ के चेहरे पर तसल्ली के भाव आ जाते हैं
ससुराल में नई-नई बेटी से जब माता पिता पूछते हैं
बेटा तू ठीक है न
उसकी हाॅ सुनकर ही अंदाजा लगा लेते हैं
बेटी किस हाल में है
काम पर गए पति को देर होने पर जब पत्नी पूछती है
सब ठीक है न
आज कोई परेशानी तो नहीं
उनकी हाॅ सुनकर वह मुस्कान से भर जाती है
बच्चों को देर हो जाती है कई
स्कूल - कालेज या ऑफिस
बस यही वाक्य सुनने को बेताब रहते हैं
कोई कुछ कर तो नहीं सकता
खुदा नहीं है
पर अपनो की खैरियत की हमेशा दुआ करता है
जब तक घर का हर सदस्य घर नहीं आ जाता
तब तक चैन की नींद नहीं आती
हमारे अपने कहीं भी रहे
सुरक्षित रहे
सब यही चाहते हैं
सब ठीक है
सुनना चाहते हैं हमारे कान
सब कुछ ठीक है
चिंता मत करो
और क्या चाहिए
सब ठीक रहेगा
तभी तो प्यार 'ममता 'और उन्नति होगी
आई लव यू 
कभी-कभी बोला जाता और सुना जाता है
सब ठीक है
यह सुनने और कहने को हम हमेशा तत्पर

Sunday, 3 May 2026

पेट की भूख

भूख तो भूख होती है
वह किसी की भी हो
अमीर की हो
गरीब की हो
पढे लिखे की हो 
अनपढ़ की हो
देशी की हो या विदेशी की हो
पशु की हो
मानव की हो
सारा संसार इसी के इर्द-गिर्द
सारे जतन इसी के लिए
जब पेट की अंतडिया कुलमुला रही हो
तब स्वाद नहीं देखा जाता
पेट किसी तरह से भरे
कुछ भी मिल जाय
बस भूख मिट जाए
आज महसूस हुआ
खाने में थोड़ी देर क्या हुई
भूख से हाल बेहाल हो गया
वही किचन में सब्जी को कलछी चलाते चलाते
दो बिस्किट पानी से गटका
तब जाकर जान में जान आई
याद आई 
उन मजदूरों की जो भूखे हैं
खाने के लिए लाईन लगानी पड रही है
दूसरे पर आसरा
नहीं मिला तो भूखे
ऊपर से बीवी बच्चों के साथ
तब और मुसीबत
सोशल मीडिया पर ऐसे दृश्य देखकर
कलेजा मुंह को आ जाता है
कहावत है न
पेट की भूख जो न कराए