समाज वहीं का वहीं खड़ा है
उसकी सोच भी वैसी ही है
बस दिखावा रहता है
सोच वैसी की वैसी है
औरत के प्रति नजरिया
बदला नहीं है
विवाह की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है
सब कुछ छिन्न भिन्न
क्योंकि जिस पर दारोमदार था
वह ही बदल रही है
अपना महत्व समझ रही है
और जहाँ अपने लिए सोचा
वहाँ त्याग की बातें बेमानी
बदलाव पर खड़ा समाज
क्या होगा
राम जाने
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