Friday, 31 July 2026

मौसम का मिजाज बदलता है

कुछ दिनों से लगातार बारिश हो रही है 
अब धरती माता तप नहीं रही है 
गर्मी से जूझ रहे लोग भी आनंदित हुए 
रात में ऑख खुली 
थोड़ा ठंड महसूस हुई 
चादर जो कितने महीनों से ऐसे ही सिरहाने पड़ा था 
उसको खोल ओढ़ लिया 
मन को सुकून मिला 
इस वर्ष की बेहिसाब गर्मी से बेहाल हो गई थी 
सहन नहीं हो रहा था 
पर क्या करें 
मौसम का मिजाज है 
रात में नींद खुलने पर जल्दी फिर नहीं आती 
विचार उमड़ते - घुमड़ते रहते हैं 
ठंड अच्छी लग रही थी 
गर्मी की तपन भूल गई 
ऐसा ही जीवन है शायद 
कभी बहुत परेशान हो जाते हैं 
कुछ वक्त के बाद वह समय भी निकल जाता है 
तब इतनी याद नहीं रहती 
सुख - दुख आनी - जानी है 
वक्त बदलता रहता है 
ठंड,  गर्म , वर्षा , अंधड़ आते रहते हैं 
चले भी जाते हैं 
उनको जाना ही है 
टिक कर रह नहीं सकते 

Thursday, 30 July 2026

यह जन्मसिद्ध अधिकार है ???

युवा पीढ़ी अपने बड़ों का आईना होती है 
उसमें जो और जैसा संस्कार डाला गया है 
वो वैसे ही होंगे 
वे आपका प्रतिबिंब हैं 
आज उनके गाली-गलौज पर उंगली उठाई जा रही है 
सीखा कहाँ से हैं उन्होंने 
कहने को तो हम सभ्य समाज से आते हैं लेकिन 
मुख पर मां - बहन - बेटी की गाली तैयार रहती है 
कुछ तो बिना बात ही गाली निकालते रहते हैं 
शहरी परिवेश में तो कुछ मर्यादा भी है 
ग्रामीण अंचल में यह सामान्य बात है 
वहाँ तो बच्चा गाली देता है तो औरतें भी हंसती हैं 
जैसे बहुत अच्छा सीख रहा हो 
स्वयं ही गंदी और भद्दी बात बतियाती रहती है 
हद की अश्लीलता 
जबान पर कोई लगाम नहीं 
शादी-ब्याह में सुनिए 
सर शर्म से झुक जाएगा 
थोड़ा-बहुत परिवर्तन आ रहा है अब
लेकिन माहौल वैसा ही 
बस अड्डे पर
दुकानों पर 
सड़क पर
अश्लील गाने बजते रहते हैं 
लोग चलते रहते हैं 
छेड़ते रहते हैं 
फब्तियां कसते रहते हैं 
और इसमें कुछ बुराई भी नहीं है 
यह जन्मसिद्ध अधिकार है 


जेन जी को जोश में होश नहीं खोना है

अपनी आवाज उठाना 
अपनी मांगे रखना 
विरोध करना 
ये प्रजातंत्र में सबका हक है 
हां मर्यादित आचरण जरूर हो 
गाली - गलौज यह ठीक नहीं है 
वह भी अपने प्रधानमंत्री के लिए 
देश के मुखिया हैं वे 
उम्र दराज भी हैं 
इस नाते भी आदरोचित संबोधन होना चाहिए 
किसी की मां के लिए अपशब्द 
पुलिस कर्मियों से मारपीट 
तोड़ - फोड़ , उपद्रव 
यह भी तो उचित नहीं है 
जेन जी को अभी बहुत कुछ करना है 
क्रांति के जनक हैं वे 
उसका एक तरीका भी हो 
मोहनदास करमचंद गांधी से अच्छा उदाहरण कौन हो सकता है 
हिंसा - गाली-गलौज यह क्या है ??
उग्रता ठीक है और स्वाभाविक भी है 
होता है 
नौजवान हैं जोश है 
जोश में होश नहीं खोना है 

कौन सा रंग

जिंदगी में कभी - कभी परेशानी आती है एक साथ 
मन व्यथित हो जाता है 
ये क्या हो रहा है मेरे साथ 
कब तक 
क्या ऐसा ही चलता रहेगा 
ऐसा बिल्कुल नहीं होता 
पीछे मुड़कर देखने पर लगता है 
और हंसी आती है 
यह भी बीत गया 
कैसे इतना झेल लिया 
यहाँ हर तस्वीर कोरी ही मिलती है 
रंग भरना हमको है 
कौन सा रंग किस तरह 
किसे कितनी जगह देनी है 
एक ही रंग या रंग बिरंगी इन्द्रधनुषी 
सत रंगों से 
जीवन में हर रंग समाया 
हम चित्रकार हैं
निर्भर हम पर करता है 
कौन सा रंग भरें 
कैसे भरें 

Wednesday, 29 July 2026

आत्मसम्मान

मैंने उससे कुछ कहा 
उसने जवाब नहीं दिया 
मैंने समझा 
सुना नहीं ??
फिर कहा 
कोई प्रतिक्रिया नहीं 
सर उठाकर देखना भी नहीं गंवारा 
अब समझ आया 
उनको बात नहीं करना ना सुनना 
अगर ऐसा होता है 
तो सर्तक  हो जाए 
अपनी उपेक्षा को नजरअंदाज मत करें 
स्वयं का भी आत्मसम्मान है 
महत्त्व  है 
अपने को भी तवज्जों दें 
हल्के में किसी को न ले 
न अपने को न अपनों को 

अभिमान क्यों ???

सूर्य ने एक बार कहा 
अगर मैं न रहा तो सारा जग अंधकार में घिर जाएगा 
बिना मेरे तो कुछ नहीं हो सकता 
तभी एक छोटी सी मोमबत्ती फुसफुसाई 
मैं अपना पूरा प्रयास करूगी 
जब तक रहूंगी तब तक जलकर रोशनी फैलाउगी 

अगर कोई सोचता है 
कि हम नहीं रहेंगे तो ??
कुछ नहीं 
यह संसार भी चलेगा 
तुम्हारा परिवार भी चलेगा 
किसी के बिना कुछ रूकता नहीं है 
इतना अभिमान मत करें 

Sunday, 26 July 2026

स्त्री-पुरुष

श्रंगार कि संघर्ष 
कामकाजी या घरेलू 
भागती - दौड़ती या आराम पसंद 
तेज तर्रार या सीधी सादी 
विरोध में खड़ी होने वाली या हर बात में सहमति 
आत्मनिर्भर या दूसरों पर निर्भर 
पढ़ी - लिखी या अनपढ़ 
स्वतंत्र या गुलाम 
हार न मानने वाली 
परिस्थिति का सामना करने वाली या फिर कुछ न कर सकने वाली 
निडर या डरपोक 
सुंदर या साधारण 
गोरी या सांवली 
समझदार या लड़ाकू 
आप कैसी स्त्री को पसंद करेंगे 
पुरुष के कंधे से कंधा मिलाने वाली 
अपनी जायज- नाजायज मांग मनवाने वाली 
सुसंस्कृत,  सभ्य और समझदार 
घरनी से घर 
तब उसे चलाने वाली कैसी हो ??
पसंद या नापसंद आपकी च्वाइस 
रहना - निभाना आपको 
तब चुनाव भी गलत - सही जो हो 
उसके जिम्मेदार आप 
और कोई नहीं 

कौन हारा कौन जीता

कौन हारा कौन जीता 
किसका इस्तीफा हुआ 
सरकार झुकी ??
विपक्ष की मंशा पूरी हुई 
आंदोलन खत्म हुआ 
मुद्दा यह नहीं है 
शिक्षा सबका मौलिक अधिकार है 
उस पर सबका हक है 
उसे तो बख्श दिया जाए 
उसमें तो मिलावट न की जाए 
राजनीति न की जाए 
छात्र देश का भविष्य हैं 
उन्हें कमजोर नहीं करना है 
युवा पीढ़ी है 
जब यह आक्रोशित हो जाती है 
तभी क्रांति भी होती है 
सत्ता पलटने की ताकत है इनमें 
न्याय उनका हक है 
वह उनको मिलना चाहिए 
ये वह जोशीले लोग हैं 
जो आगा - पीछा नहीं देखते 
जब अपने पर उतर आए 
इसका एक नमूना तो अभी हमने देखा 
तो इन्हें इग्नोर कर काम नहीं चल सकता 
हाथों में पत्थर होठों पर नारा 
यह उनकी तस्वीर नहीं होनी चाहिए 
इनके हाथ में तो कलम - किताब शोभता है 
लैपटॉप और कम्प्यूटर अच्छे लगते हैं 
मजबूर नहीं मजबूत हो हमारी युवा पीढ़ी 
हमारे कंधे तो झुक रहे हैं 
मजबूती से इनको खड़ा होना है 
हार - जीत मसला नहीं 
योग्यता की कद्र हो 
इसमें कुछ भी आड़े न आए 
न धर्म न जाति न राजनीति

Friday, 24 July 2026

यह वादा रहा

सावन के झूले पड़ने लगे हैं 
सावन आ रहा है 
त्योहारों का मौसम शुरू हो गया है 
आनंद ही आनंद 

हंसी आ गई 
आनंद हो या न हो 
हम इन्हीं के बहाने आनंदित होने की कोशिश करते रहते हैं 
नहीं तो किस बहाने ??

लगता है 
हम जिंदगी को धता बता रहे हैं 
कह रहे हैं 
तू कितना भी झूला झुला ले 
हिचकोले खिलवा ले 
हम भी हार मानने वालों में नहीं 
चढ़ाव - उतार तो आते रहेंगे 
हम भी झूलते - झूलते 
जीवन नैया पार ही लगा लेंगे 
डर के मारे झूले से उतरने वाले नहीं 
यह वादा रहा 

पिता का घर

एक घर पिता का होता है
जहाँ अपनापन और अधिकार होता है
एक घर भाई का होता है
जहाँ हम मेहमान सरीखे होते हैं 
कुछ भी छूने से डर लगता है

एक घर पिता का होता है
जहाँ हम जिद करते हैं 
अपनी बात मनवा कर ही छोड़ते हैं 
खाने में ना - नुकुर करते हैं 
एक घर भाई का होता है
जहाँ हम समझदार हो जाते हैं 
जो मिला वह खा लेते हैं 
ना - नुकुर की कौन कहे 
रसोई में जाने पर भी डर लगता है

एक घर पिता का होता है
जहाँ हम जब चाहे आ - जा सकते हैं 
विचरण कर सकते हैं 
परमीशन की जरूरत नहीं 
एक घर भाई का होता है
जहाँ सोचना पडता है 
मौका और वक्त  देखना पडता है

एक घर पिता का होता है
जहाँ हम राजकुमारी होते है
राजदुलारी  होते हैं 
एक घर भाई का होता है
जहाँ हम सिर्फ उस घर की बेटी होते हैं 
नाज - नखरे नहीं कर सकते
उसे उठाने वाला कोई नहीं 
हर भाई पिता समान नहीं हो सकता

पिता तो पिता ही होता है
उसकी जगह कोई नहीं ले सकता 
न किसी का दिल इतना बडा होता है
अपना सर्वस्व लुटाकर भी हमारे चेहरे पर मुस्कान हो 
यह तो पिता ही कर सकता है।

Thursday, 23 July 2026

वह किताबों की दुनिया

आज आलमारी साफ कर रही थी 
बहुत सी पुरानी चीजें निकाल कर फेंक रही थी 
कुछ पुराने अखबार के पन्ने 
कुछ कतरने 
कुछ पत्रिकाऍ  
जो पुरानी और पीली पड़ गई थी 
एक किताब मिली 
जो मैंने संभाल कर  रखी थी 
पहले तो न जाने कितनी बार पढ़ी थी 
बीच के वर्षों में भूल गई थी 
आज फिर वह जमाना याद आ गया 
किताब तो पुरानी हो गई थी 
उसका महत्व??
वह तो आज भी बरकरार है 
तभी तो पुरानी स्मृतियाँ ताजा हो उठी 
जीवन उतना पीछे चला गया 
जब हम रात भर जागकर इसे खत्म कर ही चैन लेते थे 
जब भी मन में उलझन होती 
इसके पात्रों से तुलना कर लेते थे 
प्रेरणा प्राप्त होती थी 
यही तो जीवन है शायद 
उम्र बढ़ने से महत्ता खत्म नहीं होती 
हम ऐसे - वैसे नहीं हैं 
जीवन में हर संघर्ष का सामना किया 
हारे नहीं 
मुश्किल और असफल होने पर फिर खड़े हुए 
आज कुछ बहुत याद आए 
प्रेमचंद,  शरतचंद्र,  शिवानी , मन्नू भंडारी , महादेवी वर्मा 
अज्ञेय , पंत , प्रसाद , निराला और न जाने कितने 
किताबों से नाता था हमारा 
उन पीढ़ियों से पूछो 
आज शायद मोबाइल और इंटरनेट पर सब झटपट उपलब्ध 
कहीं सहेजना नहीं 
जब चाहे तब हाजिर 
पर जनाब 
वह मजा मोबाइल में कहाँ जो किताबों में थी 

Wednesday, 22 July 2026

वादा है तुम भूखे नहीं रहोगे

एक समय था जब पेट भर भोजन भी नहीं मिलता था 
मजूरी करना मानो गुलामी करना था 
पेट के कारण गालियां सुननी पड़ती थी 
मारा - पीटा जाता था 
गुलामी का दौर खत्म हुआ 
भूखमरी का भी अंत 
अब मजबरी - काम नहीं करें 
तब भी जीवनयापन हो जा रहा है 
मुफ्त में अनाज मिल रहा है 
पैसे भी मिल रहे हैं जो नशा- पानी के लिए पर्याप्त है 
समय- समय पर बिजली बिल भी माफ 
चुनाव आने पर कर्ज भी माफ 
अब तो मजे ही मजे हैं 
संविधान ने हमें अधिकार भी दिया है 
दवाई भी मुफ्त अस्पताल भी 
तीर्थ यात्रा भी भगवान के दर्शन भी 
और क्या चाहिए 
सही है 
अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम 
दास मलूका कह गए सबके दाता राम
यहाँ सबके दाता सरकार है 
पूँजीपति अमीर हो रहे हैं 
कुछ यहाँ पांच किलो पर खुश हैं 
पढ़ने की क्या जरूरत 
पकड तल कर कमा लेंगे 
ठगी कर कमा लेंगे 
लेकिन घूमेंगे आलिशान  गाड़ी में 
बड़े - बड़े बंगले बनाएंगे 
भले ही चंदा चोरी करना पड़े 
हमको अपनी पड़ी है 
लोग जाए भाड़ में 
नेताओ का एक ही नारा 
तुम भी खुश रहो 
हम भी खुश रहेंगे 
हमको जीताओ हम तुम्हारा ख्याल रखेंगे 
वादा है तुम भूखे नहीं रहोगे 

Tuesday, 21 July 2026

आजादी का जश्न ???

कुछ ही दिन बाद हम आजादी का जश्न मनाने वाले हैं 
स्वतंत्रता दिवस आ रहा है 
बड़े शान से मनाते हैं हम 
कोई कमी नहीं छोड़ते 
एक ही दिन ही सही बलिदानियों को याद करते हैं 
आजाद हैं क्या हम ??
अपनी आवाज उठाने का हक है 
अधिकार प्राप्त है ??
बोलने की आजादी हैं ??
रोटी - कपड़ा - मकान सबको उपलब्ध है ??
रोजगार के साधन हैं ??
शिक्षा  सबके लिए निष्पक्ष ??
भ्रष्टाचार खत्म ??
आदर्श सत्ताधारी नेता ??
दवा और अस्पताल??
सरकारी कामकाज??
और न जाने क्या - क्या ??
योग्यता की कद्र या फिर उसकी बलि पैसों के आगे 
निर्भय और निडर हैं देश में ??
पुलिस और प्रशासन का कर्तव्य 
लगता है ऐसा है नहीं 
सब परेशान हैं 
आखिर क्यों ??
क्यों लोगों को अंग्रेजी हुकूमत की याद आ रही है 
अब तो जलियांवाला बाग जैसा कुछ नहीं होने वाला है ना ??
फिर लगता है 
कहीं कुछ तो सही नहीं है 

इस शहर में हर शख्स परेशान क्यों हैं ????


Monday, 20 July 2026

अपना कर्म करते रहे

सुबह हुई 
बहुत कुछ साथ लाई 
एक नयी आशा 
एक नया दिन 
आज का भविष्य  ??
ज्योतिषी की भविष्य वाणी सुनते हैं 
कुछ कल्पना करते हैं 
कभी खुश हो जाते हैं 
कभी निराश हो जाते हैं 
कर तो कुछ नहीं सकते 
मन में ताना - बाना बुनते हैं 
यह भलीभाँति जानते हुए 
यह सब जरुरी नहीं कि 
सच हो 
मन को समझाते हैं 
उपाय में विश्वास नहीं 
बस सुनना है 
अगले दिन फिर सुबह 
टेलीविजन के सामने बैठ जाना है 
आज का दिन कैसा जाएगा 
यही मानव मन है 
वह भविष्य जानना चाहता है 
वर्तमान को छोड़ उसमें उलझा रहता है 
उसके अपने वश में कुछ नहीं 
सब ऊपर वाले के हाथ में 
हाथ की लकीरे तो बदलती नहीं है ना 
जो लिख दिया है वह तो हैं 
फिर भी मन को संतोष देने के लिए 
शायद ईश्वर सुन ले 
भाग्य को थोड़ा संवार दें 
यह विश्वास तो होता है उस पर
और वो चाहे तो फिर क्या न हो 
सब संभव है 
भविष्य नहीं भगवान पर विश्वास करें 
जो करता है हमारे भले के लिए ही 
चिंता नहीं चिंतन करें 
जिम्मेदार अपने को न माने 
उसको माने 
उसकी इच्छा के बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता 
बस आप अपना कर्म करते रहे 

Saturday, 18 July 2026

नीरज

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गयी
पाँव जब तलक उठें कि ज़िन्दगी फिसल गयी
पात-पात झर गए कि शाख-शाख जल गयी
चाह तो सकी निकल न पर उमर निकल गयी
गीत अश्क़ बन गए
छंद हो हवन गए
साथ के सभी दिए, धुआँ पहन-पहन चले
और हम झुके-झुके
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे!

    गोपालदास "नीरज"

Tuesday, 14 July 2026

समुंदर होना ????

समुंदर होना आसान नहीं है 
सब कुछ अपने में समा लेना 
अपनी गहराई की थाह किसी को न लगने देना 
अपनी सारी पीड़ा को नमक में रूपांतरित कर देना 
वेग आता भी तो फिर तुरंत पीछे हट जाना 
अपनी सीमा में रहना 
अवांछित को बाहर निकाल देना 
साफ हो या गंदा 
नदी हो या नाला 
सबके पानी को अपने अंदर ले लेना 
धूप में अपने को जला वाष्प बनाना 
उसी को फिर से स्वच्छ जल में बरसवाना 
पाटता  जाता फिर भी कुछ नहीं कहता 
न जाने कितने जीवों का घर 
सीप में मोती बनाता 
न जाने कितने अमूल्य जवाहरात इसके गर्भ में 
फिर भी घमंड नहीं 
जो आता अपने किनारे बैठा लहरों से सहलाता  
तुम भी ऊंचे बनो अपनी मर्यादा में रहकर 

पाठ्यक्रम जीवन का

अपनी किताब बंद मत करें 
हो सकता है कुछ पन्ने पसंद न आएं 
तो आगे बढे 
अगले पन्नों को पलटें 
कुछ तो पसंद आ ही जाएंगे
न जाने कितने चैप्टर हो
हर चैप्टर पसंद हो यह जरूरी नहीं 
समझ भी आए यह भी जरूरी नहीं 
उन चैप्टर को छोड़ आगे बढ़ें 
जो पसंद आए उन्हें पढें 
प्रथम और अंतिम को मत छोड़े
खत्म तो करें ही
आखिर तक आते-आते सब समझ आ जाएंगा 
इतना गुणा- गणित की जरूरत नहीं है 
सब कुछ पढना
सब कुछ समझना
यह तो मुश्किल है
मुमकिन बनाइए 
आसान बनाइए 
अपनी पसंद को साथ रखें 
उसे मत छोड़े 
जितना जरूरी है उतना करें 
हो सकता है जो चैप्टर या पन्ना समझ में  आया है 
प्रश्न पत्र में प्रश्न उन्हीं से हो
जिसका उत्तर आप आसानी से दे सकते हो
तब यह तो करना ही है
अपनी किताब बंद नहीं करना है
फिर वह चाहे 
जिंदगी की हो
पाठ्यक्रम की हो ।

Monday, 13 July 2026

आंटी मत कहो ना ???

आंटी और अंकल के चक्कर में 
उलझ गए हैं  हम
सारे रिश्ते गुम 
बस सबका एक ही रिश्ता 
चाची , काकी ,मामी, बुआ 
चाचा , मामा , फूफा , मौसा 
सिमट कर रह गए हैं 
आंटी और अंकल के मायाजाल में 
अंग्रेजी बोलने के चक्कर में 
रिश्तों के नाम की बलि चढा दी हमने 

कितनी मिठास 
कितना प्यार 
झलकता था
पापा का भाई चाचा
माँ का भाई मामा
फूफा और मौसा भी अपने
अपनापन और प्यार 
हक से अधिकार से

अब तो सब अंकल और आंटी 
भईया - भाभी
दादा - दादी 
काका - काकी
का भी संबोधन हुआ लुप्त 
अब तो छोटा हो या बडा
सब है अंकल - आंटी 
कभी-कभी नागवार भी गुजरता है
जब अपने से उम्र दराज व्यक्ति आंटी और अंकल कहता है
हम उम्र  को भी संबोधते हैं
तब खीझ और गुस्सा आ जाता है

अब किसको रोके
किसको टोके 
किसको समझाए 
जब अंकल - आंटी का है बोलबाला
सुनते रहिए
पसंद आए या न आए 
बस सुन कर अनदेखा करिए
या फिर निगलते रहिए
टोकमटाकी कर क्या हासिल 
जब जमाना ही है अंकल - आंटी का पक्षधर

Sunday, 12 July 2026

साथ कौन ???

साथ बहुत से चलते हैं 
साथ खड़ा कोई नहीं होता 
हंसते तो बहुत साथ में हैं 
तुम्हारी खुशी में कोई खुश नहीं होता 
दुख में सहानुभूति तो बहुत दिखा देंगे 
कोई तुम्हारें साथ रोने वाला नहीं यहाँ 
दुनिया बहुत मतलबी है 
तुम पर हंसने वाले बहुतेरे मिल जाएगे 
बातें बनाने वाले भी 
यहाँ अकेले ही सब करना है 
कहने को अपने पर कभी काम में नहीं आते 
अजनबी भी कभी-कभार अपनों से ज्यादा हो जाते हैं 
जानते तो सब हैं तुम्हें 
असलियत तो यह है 
कि वह बस ऊपर से 
कोई मन में झांककर देखना नहीं चाहता 
दोस्त तो बहुत हैं कहने को 
दोस्ती निभाना नहीं जानते 
रिश्तेदार तो उससे भी आगे 
रिश्ता कैसे बनाए रखना है 
यह तो उनको भी नहीं मालूम 
बस अवसर की प्रतीक्षा करते हैं 
कब खाने को मिले 
वह बरही हो या तेरही 
खाकर गायब हो जाते हैं 
हैसियत देखने आते हैं 
फिर सब जगह प्रचार करते हैं 
सब मिला कर देखा जाए 
तो दोस्ती- रिश्तेदारी 
सब बेमानी 
सच्ची हो तो अच्छी है 
अन्यथा न हो तो ही ठीक 

Saturday, 11 July 2026

मुझमें मेरा शहर बसता है

मुझमें मेरा शहर बसता है 
क्या 
हां , सही सुना आपने 
शहर में हम अपने आप को देखते हैं 
उसकी आदत हो जाती है हमें 
उसके अनुसार हम बन जाते हैं
शहर सुबह  - सुबह उठाता है 
तैयार करता है दिन भर के लिए 
मेरा शहर कभी सोता ही नहीं है 
हमेशा भागता - दौड़ता रहता है 
लोग भी इसके साथ चलते रहते हैं 
अगर कहीं दूसरे शहर में जाते हैं 
तब लगता है 
समय ठहर ही गया है 
अपने शहर में सांस लेने को फुर्सत नहीं 
और दूसरी जगह समय कैसे व्यतीत करें 
समझ ही नहीं आता 
कुछ दिन के लिए ठीक है 
उसके बाद ऊब होने लगती है 
वहाँ की शांति भाती नहीं 
यहाँ की चिल्ल - पौ ही भाता है 
लोकल की रेस
सड़कों पर भीड़ 
बाजार में ठेलमठेल 
नहीं किसी की टोकमटाकी 
सब अपने में मग्न 
अकेले होकर भी सबके साथ होने का एहसास 
इस शहर ने मुझे कर्मठ बनाया है 
काम बहुत जरुरी है यह सिखाया है 
एडजस्ट करना सिखाया है 
सपने देखना और उसको साकार करना सिखाया है 
यहाँ की गर्मी हो बेहिसाब डूबती बरसात हो 
ठंड में भी गर्म कपड़े की जरूरत न हो 
ठेले वाले की पानी पुरी और पाव - भाजी भी भाती है 
दरिया को देख कर भी मन प्रसन्न हो जाता है 
भले ही उसका पानी नमकीन हो 
दरिया जैसा विशाल है मेरा शहर 
हर किसी को अपने में समेट लेता है 
अजनबी से भी अपनापा जोड़ लेता है 
इसने मुझे पंख दिया 
मैंने उड़ान भरा 
जीवन को व्यवस्थित करने की कोशिश की 
कुछ हद तक सफल भी रही 
आभार है इसका 
बहुत कुछ दिया 
जान ही गए होगे 
मैं किसकी बात कर रही हूँ 
मेरी मुंबई की 
वह जान है मेरी 
मुंबई देवी की कृपा बनी रहें 
मुझ पर और मेरे बच्चों पर
वे कहीं पर भी रहें 
उन पर अपना आशीर्वाद बनाए रखना 

जीना मत छोड़ना

"जो कुछ भी हो, जीवित रहो।
मृत्यु से पहले मत मरना।
खुद को खो मत देना, उम्मीद मत खोना, दिशा मत खोना। खुद से, अपने शरीर की हर कोशिका से, अपनी त्वचा की हर तंतु से जीवित रहो।

जीवित रहो, सीखो, अध्ययन करो, सोचो, पढ़ो, बनाओ, आविष्कार करो, रचनात्मक बनो, बोलो, लिखो, सपने देखो, डिज़ाइन करो।
अपने भीतर जीवित रहो, बाहर भी जीवित रहो, दुनिया के रंगों से अपने आप को भरो, शांति से अपने आप को भरो, आशा से अपने आप को भरो।
खुशी से जीवित रहो।

जिंदगी में सिर्फ एक ही चीज़ है जिसे तुम्हें व्यर्थ नहीं करना चाहिए,
और वो है खुद ज़िंदगी..."
~ वर्जीनिया वूल्फ

Friday, 10 July 2026

नींव मजबूत हो

न प्यार से रहना 
न छोड़कर जाना 
ऐसे संबंध को क्या कहना 
कहना कुछ करना कुछ 
कभी नजदीक का एहसास 
कभी देखकर अनदेखा 
कैसा जाल संबंधों का 
लगता है जकड़ लिया है 
न उनके साथ न उनसे दूर
संबंध ऐसे तो न हो 
उलझा हुआ 
जो भी हो मन से हो 
जबरदस्ती लादा न गया हो 
जिम्मेदारी निभाने की मजबूरी न हो 
नींव मजबूत हो 
तभी टिक पाएंगे 
अन्यथा भरभराकर गिरने में पल भी नहीं 

गुरूर भी जरुरी है

गुरु पूर्णिमा का ज्ञान  । 
गुरुर भी जरुरी है 
 चरण स्पर्श कर लिया फिर मजाक उड़ाया 
ऐसे सम्मान का क्या फायदा 
जहॉ सम्मान मन से न हो वहॉं से हट जाना ही बेहतर 
रिश्ता अपनी हैसियत वाले लोगों से ही रखना चाहिए बड़े लोगों से रख अपना ही अस्तित्व समाप्त करने जरूरत नहीं है 
लाचार और उपहास का पात्र बनने के अलावा कुछ हासिल नहीं 
समाज में हैसियत देख रिएक्शन होता है 
डार्विन की थ्योरी लागू होती है 
शक्तिशाली बनो स्वयं और आत्मनिर्भर भी 
एहसान का एहसास ताउम्र झेलना आसान नहीं होता 
लोग समय-समय पर दंश चुभाते रहेगे , जताते रहेगे 
अपना याद रहता है आपका याद नहीं रखेंगे 
यह सिलसिला चलता रहेगा कम से कम दो पीढ़ी तक
उनकी औलाद भी यही सोचती रहेंगी 
आपके साथ आपके बच्चों को भी उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी 
वहाँ कभी जाना नहीं जो कहने को होते तो है अपने लेकिन रहते हैं अजनबियों सा

गुरू अनंत

गुरू अनंत 
गुरुवाणी अनंता 
इसका अंत ही नहीं 
हर मोड़ पर ज्ञान देने वाला कोई न कोई मिल ही जाता है 
उम्र चाहे कोई भी हो 
कुछ मालूम हो या न हो 
उन्हें लगता है 
दूसरे एकदम अज्ञानी हैं 
वे अभी - अभी मां के गर्भ से बाहर आए हैं 
कभी खाने पर
कभी स्वास्थ्य पर
कभी नैतिकता पर
उपदेश देना शुरु हो जाता है 
अब क्या कहें 
मूक श्रोता बने रहें 
या उल्टा जवाब दे किनारा कर लिया जाए 

Wednesday, 8 July 2026

प्यार और अपनापन ??

सब कुछ है 
अच्छी नौकरी 
बड़ा घर 
मोटर - गाड़ी 
आधुनिक सुख - सुविधा
बड़ा बैंक बैलेंस 
तब भी खुशी नहीं 
कुछ रिक्तता 
इसी को भरने में व्यक्ति लगा रहता है 
विश्वास करता है 
धोखा खाता है 
एक मन होता है 
उसको साथ चाहिए 
प्यार चाहिए 
दौलत से दिल का सुकून नहीं खरीद जा सकता 
प्यार की तलाश में भटकन जारी है 
कोई महलों में रहकर खुश नहीं 
कोई सड़क पर रह खुश 
आज जो घटनाएं हो रही है 
वह चिंताजनक हैं 
अकेले रहो आराम से रहो 
शादी मत करो 
ठीक भी है 
शादी का अर्थ बर्बाद होना नहीं होता 
घुट - घुट कर जीना नहीं होता 
ताउम्र कम्प्रोमाइज करना भी नहीं होता 
अपना अस्तित्व समाप्त करना भी नहीं होता 
पर करें क्या 
अकेला जीवन भी कोई जीवन नहीं होता ??
किसी ने एक बार कहा था 
पांच बच्चों से परेशान भले ही हूँ पर बांझ तो नहीं हूँ 
पति भले दारूबाज है पर विधवा तो नहीं हूँ 
मारता - पीटता है पर खाना और छत भी वो ही देता है 
यह तो भावना अनपढ़ और साधारण की 
पढ़े - लिखे और आत्मनिर्भर लोगों की 
सब इंसान हैं 
सबमें दिल है 
जो प्यार और अपनापन चाहता है 
उसी की तलाश में न जाने क्या-कुछ खोता है 

लिखना तो है मुझे

लिखना तो है मुझे 
जो आया मन में 
जो सोचा मन में 
जो भाया मन को
किसी को अच्छा लगें या न लगें 
क्या फर्क पडता है
लच्छेदार भाषा न हो 
क्या फर्क पडता है
कोई अच्छा कहें 
कोई बेकार कहें 
क्या फर्क पडता है
बस मैं लिखती रहूँ 
मन की भावनाओं को उकेरती रहूँ 
कोई पढे या न पढे 
क्या फर्क पड़ता है 
कोई  पढकर प्रशंसा करें 
कोई मजाक बनाएं 
क्या फर्क पड़ता है 
इस दुनिया में तरह-तरह के लोग
मेरी लेखनी बस मेरी है
किसी की गुलाम नहीं 
किसी को अच्छा लगें या न लगें 
क्या फर्क पड़ता है 
लोग बातें बनाएं 
कुछ छींटाकसी करें 
क्या फर्क  पड़ता है 
मैं  तो  लिखती हूँ 
बस अपने लिए 
अपने सुकून के लिए 
लिखना मेरा शौक है
यह कायम रखना है
किसी की बातों को दिल से क्यों लगाऊ 
बस जब मन आया लिखूं 
जो चाहूँ वह लिखूं 
जैसे कहते हैं न
    गाना आए या न आए  , गाना ,गाना चाहिए 
     लिखना आए या न आएं 
                               लिखना चाहिए।

Tuesday, 7 July 2026

ये हमारी मुंबई

ये हमारी मुंबई 
पानी - पानी हुई 
हर जगह पानी की मारी 
सबको घरों में कर दिया कैद 
लोकल की रफ्तार भी मंद 
कही कही तो ठप्प 
काम फिर भी जारी है 
कहीं नहीं थमी है 
दूध - अखबार भी टाइम से 
कामवाली और सुरक्षा गार्ड भी 
सबकी दुकान खुली है 
घुटना भर पानी है 
तब भी सब जारी है 
यहाँ बस काम ही भारी है 
कुछ समय बारिश रुक जाए 
फिर सब वैसे ही दौड़ पड़ेगे 

बेबस जीवन

प्रकृति भी खेल दिखा रही है 
बेहिसाब गर्मी 
बेहिसाब बारीश 
इनके बीच पीसता जीवन
एक पल में सब छीन लेती है 
पहले गर्मी का कहर 
अब बरसात का तांडव
बेबस जीवन 

मानवता शर्मसार

मानवता  शर्मसार  हो रही है 
तेरह साल की मासूम बच्ची बलात्कार का शिकार
वह भी एक - दो नहीं 
गिनती नहीं एक - दो दर्जन 
क्या किसी के घर भी कोई स्त्री नहीं होगी 
न सही 
मां तो होगी ही 
क्या ख्याल नहीं आया 
मानवता - नैतिकता नहीं जागी 
हैवानियत की हद पार
जानवर से भी गया - बीता इंसान 
हर दिन एक खबर सुर्खियों में 
नित नया कांड 
सब डरे हुए हैं 
बच्चें कहीं भी सुरक्षित नहीं है 
न घर न बाहर न आस - पड़ोस न रिश्तेदार 
न सड़क पर न स्कूल में 
किस तरह की परवरिश हुई है इन हैवानों की 
समाज पर कलंक हैं ये 
इनके लिए तो कानून कोई मायने नहीं रखता 
तब कानून को भी इनकी हिफाजत करने की 
इनकी दलील सुनने की 
अपना पक्ष रखने की 
इजाजत न दिया जाए 
बीच चौराहे पर गोली मारी जाए 
कानून मजबूर है लेकिन 
इसीलिए ये अपराधी हैवान मजबूत हो रहे हैं 
समाज को भी इन्हें बहिष्कृत कर देना चाहिए 
पहले की पंचायती न्याय भी सही था 
लोग डरते थे 
आज डर गायब है 
न घर-परिवार का 
न समाज का 
न सरकार का 
तब क्या किया जाए 

Monday, 6 July 2026

माझी

अपना माझी खुद ही बनना होगा 
जीवन नैया को मझधार से निकाल 
किनारे पर खुद ही लाना होगा 
पतवार खुद ही चलाना होगा
नहीं कोई आएगा 
खुद ही नैया पार लगाना होगा 

अच्छा होना

क्या अच्छा होना गुनाह है 
अच्छाई ही हमेशा परेशान होती है 
उसमें उसका क्या दोष 
इसका हल क्या 
क्या अच्छाई छोड़ दें 
यह भी नहीं होगा 
संस्कार ही ऐसे नहीं है 
तब रहना तो है इसी संसार में 
सही है 
तब भी शुक्रिया करो उस ईश्वर का 
जिसने तुम्हें ऐसा मन दिया है 
तुम अच्छे हो 
किसी के बारे में बुरा नहीं सोचते 
न करते हो 
न बदला लेते हो 
न अपशब्द कहते हो 
न बद्दुआ निकलती है 
इससे अच्छा और क्या 
तुम अपना काम करो 
सब बुरे नहीं है यहाँ भी 
अच्छे लोगों की बदौलत दुनिया टिकी है 
राम भी यही और रावण भी यही 
चुनाव तुम्हारा है 
क्या बनना है 

Sunday, 5 July 2026

मेरी अम्मा का मजबूत शस्त्र

अम्मा कब रोती नहीं ??
बचपन से देखा 
ऑख में ऑसू ही गाहे - बगाहे 
कारण कभी-कभार पता भी नहीं चलता था 
दुख और पीड़ा में तो रोती ही 
खुशी के पल में भी ऑसू छलक जाते थे 
कभी अतीत को याद कर रोती 
कभी अपनों को याद कर रोती 
कहती कुछ नहीं बस ऑसू छलकाती  
कभी हमारी गलती पर रोती 
न डाटती न मारती बस रोती 
और हम गलती करने पर पछताते 
बड़ी ताकत है इन ऑसूओं में 
आज भी बात करती मोबाइल पर तब रोती 
यह एक इमोशनल ब्लेकमेल जैसा हुआ 
अब तो ऐसा लगता है 
कभी हंसते हुए देखा नहीं 
रोता देख कभी अच्छा नहीं लगता 
फिर एक दिन समझ आया 
रोना मतलब नार्मल है 
न रोये तो खतरा है 
क्या मां ऐसी ही होती है 
आशीर्वाद देते भी ऑख में पानी भर आना 
कभी बच्चों को याद कर रोती है 
कभी उनकी चिंता में ईश्वर से प्रार्थना कर रोती है 
ईश्वर भी उसके ऑसूओं पर पसीज जाता होगा 
कहते हैं जहाॅ 
शब्द असमर्थ हो जाते हैं वहाँ ऑंसू काम आते हैं 
बड़ी ताकत है इन आंसुओं में 
मैं भी मां हूँ पर अम्मा जैसी नहीं 
यहाँ ऑंसू कम गुस्सा ज्यादा 
शब्द ज्यादा 
जो कभी-कभार बात को बिगाड़ भी देते हैं 
अम्मा के ऑंसू का पावर
अब भी है बरकरार 
सब हो जाते उसके आगे निरूत्तर 

विधवा ???

विधवा ??
विधवा यह शब्द चुभता है
असहायता का प्रतीक  लगता है
विधवा शब्द सुनते ही
एक मुर्ति  जेहन में उभरती है
रंगहीन जीवन का
सफेद साडी में लिपटी 
न हाथ में चूडियां 
न माथे पर बिंदी 
न गले में मंगल सूत्र 
न मांग में सिंदूर 
न शरीर पर गहना
रंगों  से टूटा नाता
रंगहीन जीवन 
यही था विधवा का रूप
पति ही परमेश्वर 
वह नहीं तो सब सून
इसलिए सती हो जाओ
आग में जल जाओ
मरना आसान था जीना मुश्किल 

आज समय बदला 
अब वह हालात वह विचार न रहें 
अब उसको भी जीवन जीने का  हक
पहनने - ओढने  
खाने - पीने
घूमने- फिरने की आजादी 
वह अब सक्षम है 
उसका जीवन पति के साथ खत्म नहीं हुआ है
वह विधवा है इसलिए दया का पात्र है
यह न समझा जाएं 
जमाना बदला है
तब नजरिया भी बदला जाएं 

विधवा शब्द को ही भूला दिया जाएं 
विधवा है
परित्यक्ता  है
इन शब्दों की जरूरत ही क्या है
बस व्यक्ति ही रहने दिया जाएं 
लाचारी और विवशता तथा सहानुभूति 
इसकी कोई आवश्यकता नहीं 
वह पैरों पर खड़ी हो
आत्मनिर्भर हो
केवल ब्याह - शादी के मापदंड पर न मापा जाएं।

Saturday, 4 July 2026

मन में रह गई

जो कहना था वह तो रह गया 
न जाने कितनी बातें थी 
वह मन में रह गई 
जब - जब कहना चाहा 
जुबां ने साथ नहीं दिया 
कहना चाहा कुछ कहा कुछ
एक कसक मन में रह गई 

एक माता - पिता का दर्द

तुम तो चले गए 
हमको रोता - बिलखता छोड़कर 
न जाने क्या-कुछ सपने देखे थे 
सब कुछ खत्म हो गया 
हमारे लिए तो वक्त ही ठहर गया 
हर वक्त हर पल तुम पर था वारा 
तुमको अपनी जान से ज्यादा चाहा था 
तुम जान थे हमारी 
दिल की धड़कन थे 
दिल खुश रहता था तुमको देख - देख कर
हमारी ऑखों  के तारें 
तुम हमसे दूर तारों की दुनिया में चले गए 
हमसे तो जीते - जी हमारी जिंदगी छीन ली 
अब किसको दे उलाहना 
उस ऊपर वाले को 
जिसने हमारी गोद में तुमको डाला था 
हमें माता - पिता बनाया था 
तुम्हारे जन्म पर खूब जश्न मनाया था 
छठी - बरही में अपनों को खिलाया था 
सोहर गीत गवाया था 
घर गूंज उठा था 
तुम्हारी किलकारी से 
वंश के दीपक थे 
नहीं सोचा था 
यह दीपक इस तरह बूझ जाएगा 
हमको इस हालत में छोड़ जाएंगा 
अपने साथ हमारी सब खुशियां ले जाएंगा 
अब क्या करेंगे जीकर 
रोना ही है जीवन भर 
वक्त ने वह मार मारा है 
अब तो संभलना मुश्किल है 
क्या करेंगे क्या न करेंगे 
कैसे रहेंगे कैसे जीएंगे कैसे सहेजेगे
 कहना मुश्किल 
अब तो आँख के आंसू भी कभी न सूखेंगे 
होठों पर हंसी भी न आएगी 
सारी इच्छाएं मर गई 
तुम नहीं मरे 
हम जीते जी मर गए 
अब इससे बड़ा दुख क्या होगा 
अपनी ही संतान को कांधा  देना 
जिस पर कभी हमको जाना था वह हमसे पहले चला गया 
किसको दोष दें 
ईश्वर को 
भाग्य को 
समझ नहीं आ रहा 
अब तो शरीर बचा है 
सांस चल रही है 
अंतर्मन मर चुका 
चूक कहाँ हुई 
सोच रहे हैं 
कैसे हुई 
कारण को ढूंढ रहे हैं 
इससे क्या हासिल 
जो होना था वह तो हो गया 
हमारा जीवन आधार हमको निराधार कर गया 
हम कुछ न कर पाए 
बस पत्थर बन 
हम विवश देखते रह गए 

Friday, 3 July 2026

जो दिखता है

कोई जब कहता है 
सब ठीक है तो कुछ ठीक नहीं होता 
कोई जब कहता है 
मैं बहुत मजबूत हूँ तो वह मजबूर होता है 
कोई जब कहता है 
स्वास्थ्य में कोई दिक्कत नहीं है पर वह सही नहीं होता 
कोई जब बहुत मुस्कराता है तो वह अंदर से रुदन कर रहा होता है 
कोई जब बहुत आत्मविश्वास दिखाता है तो वह डरा हुआ होता है 
कोई शक्तिमान साबित करता है अपने को तो वह कमजोर होता है 
जो गरीब होता है वह शान दिखाता है 
क्योकि सत्य यह है 
कि जो दिखाई देता है वह होता नहीं 
सबने एक मुखौटा पहन रखा है दुनिया के सामने 
नहीं तो दुनिया जीने नहीं देगी 
अमीर को कपड़े की परवाह नहीं गरीब को होती है 
उसका मूल्यांकन उससे होता है 
फैशन में पैबंद और अभाव में पैबंद 
यह अलग- अलग है 
यहाँ तुम्हारी कमजोरी का ढिंढोरा पीटने और विज्ञापन को लोग तैयार बैठे है 
मसाला चाहिए नमक - मिर्च वे लगा लेंगे 
अपने बोलने का सलीका न हो 
तुम.में मीन-मेख निकाल लेंगे 
हम बाहुबली 
हम ही श्रेष्ठ 
हमसा कोई नहीं 

Thursday, 2 July 2026

राम के घर चोरी

मेरी झोपड़ी के भाग खुलेंगे 
राजा राम घर आएगे 
झोपड़ी के भाग्य तो खुल गए 
महल बन गए 
आलिशान घर और दुकान हो गई 
जमीन के मालिक बन बैठे 
पूरे खानदान और रिश्तेदारों का भी कल्याण हो गया 
तब तो भरत थे जो अन्याय होने नहीं दिया 
कैकयी और मंथरा की साजिश को सफल होने नहीं दिया 
आज तो अंदर ही लुटेरे बैठे हैं 
हमारे राम को लूट रहे हैं 
गजनी और बाबर तो आततायी थे 
ये तो रामभक्त हैं 
देखभाल का जिम्मा इन पर हैं 
और ये ही लुटेरे - चंदाचोर 
शर्म नहीं आई 
लोगों ने अपनी जमीन बेच कर दान दिया है 
तुम अपनी जमीन बना रहे हो 
इस बार रावण को नहीं तुमको जलाना चाहिए 
विभीषण बने हो 
अपनी ही रामनगरी से विश्वासघात कर रहे हो 
कहाँ जाओगे 
हिन्दू हो ना 
कर्म का फल मिलता है 
तब डर नहीं लगा अपने भगवान से 
क्या मुंह लेकर नतमस्तक होंगे उनके समक्ष 
कौन से दंड के पात्र??
तुम्हारा निर्णय तो रामजी ही करेंगे 
होइए वही जो राम रचि राखा 
वो बख्शेगे नहीं 
दंड तो उन्होंने सबको दिया 
चाहे वह कोई भी हो 
महाबलशाली रावण हो या बालि  
अनीति और अन्याय के खिलाफ ही रहें 
मर्यादापुरुषोत्तम रहे हैं हमारे राम 
तुम लोग अपनी मर्यादा भूल गए 
राम के नाम पर चोरी 
अधम पाप है यह 

क्या जमाना था

वह अस्सी का दशक था
क्या जमाना था
जब भगवान टेलीविजन पर आते थे
बढे बूढे हाथ जोड़ प्रणाम करते थे
अरूण और दीपिका 
सचमुच के राम और सीता होते थे
रामायण आते ही घर में सन्नाटा
बाकायदा आरती होती थी
फूल चढाये जाते थे
मजाल कि कोई बीच में चू चा करें
सब टेलीविजन को घेर कर बैठ जाते
जैसे सत्यनारायण की कथा हो
लगता था उनके घर में साक्षात ही 
नारायण पधारे हो
कैकयी को कोसना
राम वन गमन के समय 
ऑसू की अविरल धारा का बहना
भरत प्रेम को देख मंत्रमुग्ध हो जाना
रावण को जम कर गालियां देना
ऐसा लगता था
राम फिर अवतरित हो आए हैं
इस धरती पर
मानना पडेगा रामानंद सागर को
जिन्होंने रामायण के सागर में सबको नहला दिया
प्राचीन काल में बाबा तुलसीदास ने मानस को घर घर पहुँचाया
मर्यादा पुरुषोत्तम राम को बनाया
आधुनिक काल में रामानंद सागर ने रामायण को घर घर पहुँचाया
नई पीढ़ी को अवगत करवाया
रामायण के पात्रो से परिचित करवाया
जो भूल रहे थे
उसे फिर याद दिलाया
आज फिर वहीं दिन आए हैं
बीस का दशक 
घर में सब बंद
तब रामायण सबको भा रहा है
सच ही तो है
राम बिना भारत नहीं

Wednesday, 1 July 2026

हर डाॅक्टर यह पढ़े

हर डाँक्टर यह पढें
अपनी ही किसी किताब में यह कहानी पढी थी
कहानी तो बडी है उसको मैं संक्षेप में ही बता रही हूँ

एक साधारण ग्रामीण खेत खलिहानों में मजदूरी कर गुजारा करने वाला
एक बार बेटे को बुखार आया । तप रहा था ।तबीयत बिगड़ती जा रही थी ।किसी ने सलाह दी
शहर के बडे डाँक्टर है उनके पास ले जाओ
वही ठीक कर सकते हैं
रात का समय था वह बेटे को कंधे पर लादकर पहुंचा
डाँक्टर साहब ने मिलने से मना कर दिया
रात हो गई है हमारा सोने का समय है
द्वारपाल को गेट बंद करने का आदेश दे अंदर चले गए
बेचारे गरीब के बेटे ने दम तोड़ दिया

समय बीता
कुछ बरसों बाद डाँक्टर साहब के बेटे को जहरीला सांप ने काट लिया
कोई औषधि काम नहीं कर रही थीं
किसी ने कहा कि फलां गांव में एक व्यक्ति है जो जहरीले से जहरीले सांप का जहर मंत्र द्वारा निकाल सकता है
डाँक्टर साहब को इन सब बातों पर विश्वास नहीं था
पर एकलौता जवान बेटे का प्रश्न था
उन्होंने आदमी भेजे पर आने को मना कर दिया
रात गहरा रही थी पर इस गरीब का मन नहीं माना
लाठी ठेगते पहुंच गए
आवाज दी
डाँक्टर साहब पैरों पर गिर पड़े
बचा लो मेरे बेटे को
जो मांगोगे वह दूंगा
अब इन्होंने अपने मंत्र विद्या के बल पर विष निकाल दिया
लडका ऑखे मलता हुआ उठ बैठा
डाँक्टर साहब ने खुश होकर कहा
क्या चाहिए
कुछ नहीं
याद कीजिए मैं वही हूँ जो अपने बेटे के इलाज के लिए आपके पास आया था
आपने वापस लौटा दिया
मेरा बेटा मर गया

पर मैं आप जैसा नहीं बन सका
मन तो हुआ 
मर जाने दो
पर ईश्वर ने मुझे यह हुनर दिया है जहर उतारने का
जान बचाने का
मैंने अपना कर्तव्य किया
आप भूल गये थे
आइंदा किसी मरीज को बिना देखे मत लौटाना ।
कहते हुए लाठी टेक गेट से बाहर निकल गए ।

आई जुलाई

आई जुलाई बारिश लाई 
झम झमाझम बूंदे बरसाई 
तपती गर्मी को दूर भगाई 
सबके लिए खुशियों का सौगात लाई 
हर मन प्रफुल्लित देख हरियाली छाई 
आई जुलाई सबके मन भायी जुलाई 

बता तेरी रजा क्या है

यह नहीं मिला 
वह नहीं मिला
मेरे साथ ऐसा हुआ 
मेरे साथ वैसा हुआ 
बहुत अन्याय हुआ 
घर - बाहर कहीं भी न्याय न मिला
बार - बार मेरे स्वाभिमान को ठेस पहुंची
मुझे नीचा दिखाने का प्रयास किया गया
दस लोगों के बीच मुझे अपमानित किया गया 
मुझे कोई  तवज्जों नहीं दी गई 
मेरे लिए किसी ने कुछ नहीं  किया
किसी का प्रेम और अपनापन नहीं मिला 
मेरी बात को सुना नहीं गया
मेरा तो भाग्य ही खराब है
मेरा कोई नहीं सुनता
बस मुझी पर दोषारोपण किया जाता है
कटघरे में खड़ा किया जाता है
अपनी गलती छुपाने के लिए मेरे कंधे पर रखकर बंदूक चलाई जाती है
ऐसा अमूमन किसी न किसी  शख्स से सुनने को मिलता है
हमारे मन में भी यह सब चलता रहता है

अरे जनाब  / मैडम 
छोड़िए इन बातों  को 
अपने को इतना नीचे मत गिराओ 
आप भिखारी नहीं है
जो आपको प्रेम और सम्मान भीख में मिले
भाग्य को दोष मत दो
अपना भाग्य खुद बनाओ
किसी के बनाने और बिगाड़ने से आपका कुछ नहीं होगा
न किसी के दोषारोपण करने से
यह तो लोग है कहेंगे ही
मुंह देखी बात करने की आदत होती है 
पर सत्य तो सत्य ही होता है 
कब तक छुपेगा 
उजागर होना ही है

सब छोड़कर अपना कर्म करें 
भीख में मांगी वस्तु नहीं टिकती है
लोगों को एहसास कराए
अपना महत्व बताएं 

खुदी को कर बुलंद इतना कि खुदा बंदे को बनाने से पहले खुद पूछें 
बता तेरी रजा क्या है ।