सत्तू और सत्ता
लालू और नितिश
ये है जनता के नेता
पुराने दोस्त फिर मिले फिर बिछडे
इस बार दोस्ती टूटने का कारण भ्रष्टाचार
चारा घोटाला और सुशासन
क्या यह दोस्त अंजान थे
सब एक - दूसरे के बारे में जानते थे
अचानक अंतर आत्मा की आवाज आई
हाथ छोडा और दूसरे से हाथ मिलाया
कभी गलबहियॉ की थी
आज विरोधी है
क्या यह केवल अंतर आत्मा की आवाज है??
या और कुछ ??
सत्ता का जबरदस्त खेल ,खेला गया है
कौटिल्य के राज्य से आते हैं
राजनीति में तो सब जायज है
पर कहीं यह खेल उल्टा न पड जाय
नितीश , मोदी के साथ रेस में न हो उनकी छाया बन कर रह जाय
सहयोगियों का साथ छोडना कही भारी न पड जाय
मोदी की बाटी के सत्तू में मिल कर वजूद न खो दे
सत्तू में कितनी ही साम्रगी मिली हो
पर ऊपर का कवर तो मोदी ही रहेगे
नाम और सत्ता तो भाजपा की ही होगी
केन्द्र के साथ साथ अगली बारी बिहार की हो
बिहारी बाबू कही खो न जाय
सुशासन की कल्पना धरी ही रह जाएगी
मोदी का लोहा मानते - मानते अपनी साख न गंवा दे
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Tuesday, 1 August 2017
सत्तू और सत्ता का खेल
बेटी का सम्मान , युग का सम्मान
बेटी का सम्मान
देश का सम्मान ,
समाज का सम्मान , युग का सम्मान
उसे गुडियॉ सजाना और संवारना ही नहीं
बाईक ,प्लेन और कार चलाना है
अब खेल- खेल में खाना ही नहीं बनाना है
बर्तन मांजना और चोटी ही नहीं बनाना है
बल्कि हाथ में बंदूक थमाना है
अब केवल टीचर - टीचर ही नहीं
सत्ता पर बैठकर काबिज भी होना है
नर्स ही नहीं बनकर सेवा करना है
फौजी भी बनना है
हर क्षेत्र में अपनी पहुंच बनानी है
शुरूवात तो खेल से ही करनी है
उसके हाथ में बेलन नहीं बल्ला थमाना है
पर्वत पर चढाना है ,घर में नहीं बैठाना है
अबला नहीं सबला बनाना है
कंधे को कमजोर नहीं मजबूत बनाना है
उसे भीरू नहीं साहसी बनाना है
उसे आश्रित नहीं आश्रय देने लायक बनाना है
एथलीट और तैराक बनाना है
खतरों से खेलना सिखाइए
मजबूत बनेगी तभी तो अपना परचम फहराएगी
बेटी बनेगी मजबूत तभी तो बढेगी साख
देश की ,समाज की , युग की
युग निर्मात्री बने तब ही तो नये निर्माण की नींव मजबूत बनेगी
बरसे तब भी और न बरसे तब भी
बरसे तब भी और न बरसे तब भी
फिर करे तो क्या करे ??
कोसने वाले हमेशा कोसेगे ही
ज्यादा पानी क्यों गिरा
बारीष हुई ही नहीं
न जाने कब बरखा रानी मेहरबान होगी
यह चारों तरफ कीचड ही कीचड
दिन में क्यों बरसता है
रात में बरसे जब सब सब घर पर हो
कितनी परेशानी आने - जाने में
पता नहीं कब धूप निकलेगी
कपडे सूखना भी मुश्किल
अरे यार इतनी गरमी
इस साल बारीश होगी या नहीं
अरे क्या झिम- झिम हो रही है
जरा जम कर बरसे
अब बरखा रानी समझ नहीं पा रही है
आखिर करे तो क्या करे .
वाह रे गुलाबो
गुलाबी रंगत , गुलाबी छटा
गोरा - गोरा गाल भी हुआ गुलाब
पूछ रही है पुरवाई
यह कौन - सी परी जो पिंकी बन कर आई
माहौल को रोशन कर गई
बरखा की बूंदे बाहर से निहार रही
अंदर आने को बेकरार हो रही
काली घटा के बीच गुलाबी - गुलाबी
उसे क्या पता
उसकी काली घटा पर छाई है हमारी सुंदरी
घनेरे लहराते - बल खाते केश
उसके पास तो केवल काली घटा
हमारी गुलाबों तो काली और गुलाबी
दोनों में खिलकर और हुई दिलकश
सबकी हसरते भरी निगाहे इस पर
पर बूंदों को अंदर आना मना है
कुम्हला जाए तो , भीग जाए तो
इसे खिली रंगत में ही रहने दो
हँसने और मुस्कराने दो
स्वयं पर गुरूर होने दो