उसके लिए भी सोचना पड़ता है
एक समय था जब हंसी अपने आप आ जाती थी
बिना कारण कहीं भी कभी भी
किसी से डांट पड़ने पर भी
स्वयं गिरने पर भी दूसरों के तो अनायास ही
वाकया है उस समय का
जब हम यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे
क्लास छूटते ही बाहर झुंड बना बतियाते थे
घर जाने की जल्दी नहीं रहती थी
समय का तो पता ही नहीं चलता था
एक बार ऐसे ही खड़े थे
प्रोफेसर भी अपनी - अपनी क्लास से निकलते थे
कभी-कभार उनको जाने की जगह भी नहीं बचती थी
सब अपने में मग्न और मशगूल
तभी एक सर ने कहा
क्या फालतू ही - ही करते रहते हैं ये सब
तब दूसरे सर ने उत्तर दिया
यार छोड़ो
जवानी हंस रही है
इतने बरसों बाद भी आज वह वाक्य गूंजता है
तो मुस्कान अपने आप आ जाती है
वह उनका कहा
जवानी हंस रही है