बारिश आती है
खत्म भी हो जाती है
जाती - जाती यह कहते जाती
अब अगले मानसून में
वह क्या सचमुच चली जाती है
शायद नहीं
गीली मिट्टी में नमी छोड़ जाती है
सबको हरियाली दे जाती है
सूखे हुए को नया जीवन दे जाती है
प्यासे को पानी दे जाती है
एक सौंधी सी महक दे जाती है
हर गंदगी को साफ कर जाती है
प्रकृति के हर कण - कण पर अपना छाप छोड़ जाती है
यह कहना कि वह चली गई
यह सही नहीं
वह हमारे साथ बनी रहती है
यादों में भावनाओं में
कुछ अच्छी कुछ नागवार
पानी की बूँद की तरह मन को तरल रखती है
अभी बहुत कुछ बाकी है
सब कुछ खतम नहीं हुआ
बगिया अगर, सूखी है तो लहलहाएगी भी
खुशी अगर रूठी है तो मानेगी भी
मौसम तो आते जाते रहते हैं
कुछ भी हो तब भी बारिश का इंतजार तो सभी को रहता है
वह खत्म नहीं होती
बस थोड़े समय के लिए कहीं और चली जाती है
न खत्म होती है न हमें छोड़ती है ।
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Wednesday, 27 October 2021
बारिश आती है
अंतर्जातीय विवाह
अंतर्जातीय विवाह
एक धर्म का दूसरे धर्म में विवाह
जब करते हैं
तब तो समस्या होती ही है
बहुत ब्राड मांइडेड होते हैं
जो इनको खुले दिल से स्वीकारते हैं
कहीं न कहीं
कभी न कभी
ताने , बोली ,व्यंग्य सुनना ही पड जाता है
नीचा देखना ही पडता है
यह सब लोग
हमारे परिवार के सदस्य
अडोस - पडोस
समाज - जाति और धर्म के ही होते हैं
कोई दूसरे नहीं
यहाँ तक तो ठीक है
आने वाली पीढ़ी को भी भुगतना पडता है
इस प्रेम की बहुत बडी कीमत चुकानी पडती है
इतना अंदर हमारे यह धंस कर बैठा है
इंसानियत को दरकिनार कर दिया जाता है
हमारी पहचान
हमारी जाति
हमारा धर्म रह जाता है
तुम्हारा साथ
जीते हैं न मरते हैं
बस तुम्हारी याद में दिन गुजरते हैं
हर सांस में तुम
हर बात में तुम
हर आहट में तुम
हर ख्याल में तुम
हर स्वप्न में तुम
हर जगह बस तुम ही तुम
ऐसा लगता है
मैं भी हो गई तुम
तुमसे ही मेरी दुनिया
तुमसे ही मेरा जहान
तुमसे ही मेरी आस
तुमसे ही मेरा संसार
तुम्हारा साथ सबसे खास
बस एक तुम हो मेरे साथ
तब किसी की क्या बिसात
नहीं किसी की परवाह
सबसे बेपरवाह
बस बना रहें
तुम्हारा साथ
यह है एक गृहिणी की आपबीती
करना चाहती हूँ अपने मन की
जब मेरा जी चाहे जो चाहे
वह सब करना
न कोई पाबंदी न कोई बंधन
सोने का मन हो तो सोते रहूँ
देर रात तक टेलीविजन देखते रहूँ
सुबह टहलने जाने का मन हो
तब निकल जाऊं
आराम से तफरी कर आऊ
नुक्कड़ पर खडे हो कटिंग चाय की चुस्कियां लूं
उगते हुए सूरज को निहारू
ऐसा नहीं होता
यहाँ दूसरों का ख्याल रखना पडता है
दूसरों को समय से जगाना पडता है
देर रात तक इंतजार करना पडता है
टेलीविजन पर सबकी पसंद
नहीं मेरी पसंद
सुबह सबके चाय - नाश्ते का प्रबंध
टहलने की छोड़ों
सुबह घर के कामों में आपाधापी
जो रात तक अनवरत जारी
बस दोपहर में थोड़ा विश्रांति
वह भी कोई अकस्मात आ गया
डोर बेल बज गई
फोन की घंटी घनघना उठी
तब फिर उठिए बैठो
संझा के चाय - नाश्ता से लेकर खाने तक की तैयारी
अपनी पसंद छोड़ सबकी पसंद का ख्याल रखना
बचा हुआ खाना स्वयं ही खाना
अन्न का नुकसान नहीं
दूसरे खाएंगे नहीं
यह सब करते-करते रात हो जाना
सब निपटा कर बिस्तर पर पड जाना
यह सोचते- सोचते
सुबह क्या बनेगा
नींद के आगोश में समा जाना
मन का करना क्या
सोचने की भी फुरसत नहीं
यह है एक गृहिणी की आपबीती