Sunday, 7 November 2021

मेरा भैया

मेरा भैया सबसे बढिया
भैया में ही जीवन रमता मेरा
आती - जाती हर सांस
यही दुआ मांगती
सही - सलामत रहें मेरा भैया
नहीं किसी की नजर लगे
ऐसी कामना मेरी
दिन - रात प्रभु के समक्ष
नतमस्तक हो मांगती
उसकी उन्नति उसका विकास
दिन दूनी रात चौगुनी यह बढता जाए
अपने नाम का परचम फहराता जाएं
गर्व से सर ऊंचा कर
मैं भी चलूँ इतराते
हाँ यह मेरा भाई है
मैं इसकी बहन
यह कहते मैं जरा भी न थकू
नहीं किसी से आशा नहीं किसी से अपेक्षा
जब साथ हो भैया अपना
एक तरफ भैया
एक तरफ जग सारा
इतना प्यारा मुझे मेरा भैया

जाने - पहचाने और अंजाने

दीपावली की रात को सब इकठ्ठा थे
आज समय पर सब उपस्थित थे
नहीं तो हर कोई अपने- अपने काम में व्यस्त
त्यौहार के बहाने ही सब एकत्रित
सबने नए-नए कपडे पहने थे
पूजा हुई
मिठाई खिला शुभकामनाएं दी
गले मिले
पैर पडे
बडो का आशीर्वाद लिया गया
सबने साथ मिलकर दीया जलाया
द्वार पर कुछ पटाखे फोडे
इसके बाद सब व्यस्त
सब अपने अपने कमरे में
जो हाॅल में थे
वे भी मोबाइल पर व्यस्त
लोगों से संपन्न था घर
बाहर तो पटाखो की आवाज रह रह कर
अंदर घर में  पूरी शांतता
संबंध तो है पर संपर्क का अभाव
फोटो डाल दी जाती है
लाइक और कंमेट मिलता है
उसी से खुश
मोबाइल से नजर हटती नहीं
अंजाने लोगों के  कारण  जाने - पहचाने लोग फीके

सोनपापडी

सोनपापडी  है तू बिल्कुल सोने सी
हलवाई की दुकान ही नहीं
किराना की दुकान और माॅल पर भी हाजिर
नहीं होती जल्दी तू खराब
टिकाऊ है
स्वादिष्ट भी
जेब पर भी ज्यादा नहीं भारी
दिखने में भी खूबसूरत
हल्दीराम  , घसीटाराम जैसे दिग्गज उत्पादकों के  साथ - साथ लोकल वाले भी
घरेलू से लेकर ब्रांडेड तक
बच्चों को तो तू है ही प्यारी
बुढिया के बाल से मिलती - जुलती
नर्म और मुलायम
मुंह में जाते ही घुल जाती
पहले से ही है तेरा असतित्व
आजकल हो गई है और ज्यादा प्रसिद्ध
कुछ समझ न आए
किसको क्या दे
सोनपापडी तुरंत हाजिर
इतना ही नहीं
एक घर से दूसरे घर का चक्कर लगाती है
कभी-कभी उसी के पास लौट आती है जिसने इसे किसी को दिया था
आजकल इस पर बहुत जोक्स बन गए हैं
हंसते हैं
फिर भी मिठाई तो मिठाई है
मुंह मीठा कराती है
रिश्तों में मिठास भरती है
कुछ न दे इससे तो भली सोनपापडी
और मिठाईयाँ तो त्योहार तक ही सीमित
पर हमारी सोनपापडी हर वक्त
ऐसे ही इसका नाम नहीं है सोनपापडी

Saturday, 6 November 2021

एक अनब्याही माँ

मैं माॅ हूँ
एक अनब्याही माँ
समाज की नजरों में गिरी औरत
सबकी नजरें मुझ पर
खैर इतना तो ठीक
आज बात मेरे बच्चे पर
जो मुझे बहुत नागवार
उसका क्या दोष
उस अबोध का
वह आदमी जो इसके लिए जिम्मेदार
वह मुकर गया
यह मानने से इनकार कर दिया
ज्यादा जोर देने पर कहा
गिरा दो बच्चा
जो मुझसे नहीं हुआ
भागीदार तो मै भी थी
मैंने अपनी जिम्मेदारी समझी
अब समस्या आई
उसके एडमीशन की
बाप का नाम चाहिए
वह कहाँ से लाऊं
सैकड़ों प्रश्न
किसका किसका उत्तर दू
शिक्षा तो हर बच्चे का अधिकार है
वह जायज है
नाजायज है
अनाथ है
गरीब है
देश का भविष्य तो है
उसे संवारना सबकी जिम्मेदारी
शिक्षा के बडे बडे ठेकेदार
यह सोचे समझे
हर बच्चे को शिक्षा
नहीं तो क्या फायदा
ऐसे कर्णधारो का
जाति - धर्म
वेज - नानवेज
यह भी  कभी-कभी
अमीरी-गरीबी तो हैं ही
कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष
दिखता कुछ है होता कुछ है
मैं एक मुक्त भोगी माँ
यह व्यथा मेरी ही नहीं
न जाने कितनों की