Monday, 8 November 2021

हर रूप तुम्हारा लगता प्यारा

तुम सिंदूर मत लगाओ
बिंदी मत लगाओ
चूडियां औ नथ मत पहनो
बिछिया और पायल की भी कोई जरूरत नहीं
तुम्हें सजने और संवरने की भी कोई कोई जरूरत नहीं
तुम तो हर हाल में मुझे सुंदर लगती हो
सौंदर्य की मूरत लगती हो
तुम मेरे मन मंदिर में निवास करती हो

यह सब करना हो तो करों
वह तुम्हारी मर्जी
अगर यह सब बेडियाँ लगती है तो मत धारण करो
सोलह श्रृंगार बिना भी तुम दिखती लाजवाब
कर लिया अगर श्रृंगार तब तो सोने पर सुहागा
इतनी रूपसी तो स्वयं ही हो

बिना पायल के ही तुम्हारी चाल में रून झुन की आवाज आती है
बिना काजल के ही तुम्हारे नैन कजरारे  लगते हैं
बिना बिंदिया के ही तुम्हारा माथा दम दम दमकता रहता है
चूडी  और कंगना की खनखन से ज्यादा खनखनाहट  तुम्हारे हंसी की प्यारी लगती है
सुहाग के चिन्ह की क्या जरूरत जब साक्षात सुहाग ही समक्ष हो
स्वर्ण का गहना हो या फूलों का सादा गजरा
हर रूप तुम्हारा लगता प्यारा

Getting Older Laugh it out

*Getting Older*
*Laugh it out*

I changed my car horn to gunshot sounds. People get out of the way much faster now.

Gone are the days when girls used to cook like their mothers. Now they drink like their fathers..

I didn't make it to the gym today. That makes five years in a row.

I decided to stop calling the bathroom the 'John' and renamed it the 'Jim'. I feel so much better saying "I went to the Jim this morning".

Old age is coming at a really bad time. When I was a child I thought “Nap Time” was a punishment. Now, as a grownup, it feels like a small vacation.

The biggest lie I tell myself is..."I don't need to write that down, I'll remember it."

I don't have grey hair; I have "wisdom highlights" I'm just very wise.

Don't ever ask me to bend down and touch my toes.  If God wanted me to touch my toes, He would have put them on my knees.

Last year I joined a support group for procrastinators We haven't met yet.

Of course I talk to myself; sometimes when I need expert advice.

At my age "Getting lucky" means walking into a room and remembering what I came in there for.

Actually I'm not complaining because I am a Senager. (Senior teenager)

I have everything that I wanted as a teenager, only 60 years later.
- I don’t have to go to school or work.
- I have a driver’s license and my own car.
- I get an allowance every month.
- I have my own ipad (although I can't recall where I kept it)
- I don’t have a curfew.

Life is great.

I have more friends I should send this to, but right now I can't remember their names.

Now, I’m wondering…did I send this to you, or did you send it to me?

*Have a good chuckle. Laughter is a good Medicine*
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हारना क्या होता है

हारना क्या होता है
वह तुम क्या जानो
पूछो उस हारने वाले से
कदम कदम पर जिसे हार मिली हो
प्रयास किया हो तब भी सफलता न मिली हो
कुछ ही कदम दूर रह गई हो
बाजी कोई  और मार ले गया हो
प्रेम में हार
नौकरी में हार
जिंदगी के हर महत्वपूर्ण मोड पर हार
काबिलियत है
योग्यता है
मेहनत है
भाग्य नहीं है
तब क्या करें कोई
मन मसोसकर रह जाना पडता है
जिंदगी बोझिल लगने लगती है
जीना नहीं छोड़ा जाता
इतने कायर और कमजोर नहीं
पर पग पग पर असफलता आदमी को तोड़ देती है
सारे सपने चकनाचूर कर देती है
हार से सीखो
पर कितना सीखो यार
कभी तो जीत का साथ हो
किनारे तक आ जाते हैं
जैसे ही ऊपर चढने की कोशिश करते हैं
जलधारा फिर पीछे खींच लेती है
मझधार में ला पटकती है
उसी में डूबते - उतराते रहते हैं
कब समय खिसक जाता है
पता भी नहीं चलता

Sunday, 7 November 2021

अपनापन सीखे राम और भरत से

*श्री राम, लक्ष्मण एवम् सीता' मैया*चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे,
राह बहुत *पथरीली और कंटीली*थी !
की यकायक *श्री राम के चरणों मे *कांटा चुभ गया !
श्रीराम *रूष्ट या क्रोधित नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से *अनुरोध करने लगे !
बोले- "माँ, मेरी एक *विनम्र प्रार्थना*है आपसे, क्या आप *स्वीकार*करेंगी ?"
*धरती*बोली- "प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए !"
प्रभु बोले, "माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुज़रे, तो आप *नरम*हो जाना !
कुछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना !
मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव मे *आघात मत करना"
श्री राम को यूँ व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई !
पूछा- "भगवन, धृष्टता क्षमा हो ! पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार है ?
जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कुमार भरत सहन नही कर पाँएगें ?
फिर उनको लेकर आपके चित मे ऐसी *व्याकुलता*क्यों ?"
*श्री राम*बोले- "नही...नही माते, आप मेरे कहने का अभिप्राय नही समझीं ! भरत को यदि कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नही, उसके *हृदय*को विदीर्ण कर देगा !"
*"हृदय विदीर्ण !! ऐसा क्यों प्रभु ?",
*धरती माँ*जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं !
"अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि...इसी *कंटीली राह*से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये *शूल उनके पगों मे भी चुभे होंगे !
मैया, मेरा भरत कल्पना मे भी मेरी *पीड़ा सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति मे आप *कमल पंखुड़ियों सी कोमल बन जाना..!!"
अर्थात
*रिश्ते*अंदरूनी एहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं ।
जहाँ *गहरी आत्मीयता*नही, वो रिश्ता शायद नही परंतु *दिखावा*हो सकता है
इसीलिए कहा गया है कि...
*रिश्ते*खून से नहीं, *परिवार*से नही,
*मित्रता*से नही, *व्यवहार से नही,
बल्कि...
सिर्फ और सिर्फ *आत्मीय "एहसास" से ही बनते और *निर्वहन*किए जाते हैं।
जहाँ *एहसास*ही नहीं,
*आत्मीयता*ही नहीं ..
वहाँ *अपनापन*कहाँ से आएगा

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