Thursday, 4 August 2022

स्वाद और रस

भोजन में स्वाद हो
जब मसाले और तेल हो
कुछ गर्म कुछ ठंड
कुछ तीखी कुछ कसैली 
कुछ चटक कुछ मटक
किसी का नाम काली मिर्च 
किसी का नाम धनिया
किसी का इलायची तो किसी का लौंग 
सबकी तासीर अलग-अलग 
सब मिलकर जान डाल देते हैं 
स्वादिष्ट बना देते हैं 
फिर वह चाहे दाल - चावल हो
पनीर - मटर और बिरियानी हो
शाकाहारी हो या मांसाहारी हो
छौंक और तडका जब लगता है
तब भोजन भी जानदार

यही तो स्वाद जीवन में भी चाहिए 
तभी तो जीने का रंग निखरेगा 
वह होते हैं अपने दोस्त 
हर दोस्त अलग-अलग 
फिर भी जब साथ मिल जाएं 
तब शमा तो रंगीन हो ही जाएंगी 
जीवन आसान हो जाता है
जब सब साथ मिलकर खिलखिलाते हैं 
तब पूरी प्रकृति उनके साथ हो उठती है
तब यह तो कह ही सकते हैं 
  मसालों बिना भोजन में स्वाद नहीं 
  दोस्त बिना जीवन में रस नहीं। 

Wednesday, 3 August 2022

खाना

भूखे भजन न होय गोपाला
भूखा होता है 
तब सूखी रोटी भी अच्छी लगती है
पूरी दुनिया पेट के इर्द-गिर्द ही घूमती है
हाँ सबकी खुराक अलग-अलग 
कोई कम कोई ज्यादा 
यह खिलाने वाले पर भी निर्भर 

अगर माँ खाना खिलाती है
तब वह चाहती है
उसकी संतान जितना खाए उतना कम
वह ठूस ठूस कर खिलाती  है

पत्नी का भी वही 
वह पति के खाने का ध्यान तो रखती है
लेकिन माँ के रूप में 
अपने बच्चों को ज्यादा तवज्जों देती है
उनके लिए वह हमेशा हाजिर

दोस्तों के साथ 
तब ठूंस ठूंस कर
सारी औपचारिकता को छोड़ 
मेजबान के यहाँ 
तब संभल कर 

कहते हैं 
खाने का क्या है
ऐसा नहीं है
खाने के साथ ही भावना , शरीर , स्वास्थ्य  ,मन
सब जुड़े होते हैं 
खाना खाने में 
खाना खिलाने में 
खाना परोसने में 
खाने वाली जगह में 
जो बात घर में 
जो बात अपनों में 
वह न होटल में 
न अतिथि रूप में 

भाषा और भावना

भाषा और शब्द जीवन का अहम हिस्सा 
इन्हीं के द्वारा हम समझ सकते हैं 
विचार - विमर्श कर सकते हैं 
भावनाओं का आदान-प्रदान कर सकते हैं 
मान लीजिए 
भाषा न हो तब
भावना तो होती है
आज भी है
पहले भी थी
भावना समझना पडता है
मन के भीतर झांकना पडता है
आवाज मीठी हो या कर्कश हो
धीमी हो या तेज हो
भाषाओं का मुलम्मा चढा हो
आलंकारिक भाषा हो
वह ज्यादा देर तक नहीं चलती 
भावना सच्ची हो अच्छी हो
वह हमेशा के लिए प्रभावी होती है
भाषा से ज्यादा भावना से जुड़े 

वर्तमान को देखो

मुद्दा तो दूसरे बन गए
असली बात तो पीछे 
किसने किसको क्या बोला
किसका अपमान किया
इन सबसे तो पेट नहीं भरता
घर नहीं चलता
पढाई  - लिखाई नहीं होती
विकास न घर का न देश का
आज की स्थिति यही है
विकास का मुद्दा 
गरीबी और मंहगाई का मुद्दा 
स्वास्थ्य और शिक्षा का मुद्दा 
सामान्य जनता की समस्याओं के समाधान का मुद्दा 
सब बाजू में 
बस सब नेताओं के अपने  - अपने व्यक्तिगत मुद्दे 
बखिया उघेडी  जा रही
परत दर परत भूतकाल की
वर्तमान छूटा जा रहा
उसकी सुध नहीं 
किसने क्या किया था
यह अब छोड़ दो
आज को देखो
वर्तमान पर ही भविष्य की नींव