Thursday, 25 December 2025

बंधन

मैंने जो पाया तुमसे ही पाया 
हर आस में तुम 
हर सांस में तुम
जीवन तुम बिन सून
हर कहानी में तुम
हर हिस्से में तुम 
तुमसे मिलना तुमसे बिछड़ना 
हर बार यही दोहराना 
संग साथ चलने के राही 
हाथ पकड़कर रखने वाले साथी 
कब बंधा जीवन 
यह तो अब याद नहीं 
अब तो याद भी बिसरी 
सब कुछ भूला जा रहा 
जीवन अपनी डगर चल रहा 
कभी तेज कभी धीमे कभी डगमग डगमग 
कैसे चले कब तक चले 
यह तो नहीं पता 
बस चलते जा रहे 
चलना जारी रहे 
जब तक शरीर में जान रहे 
पग - पग पर साथ रहे 
हाथों में हाथ रहे 
सुख- दुख के भागीदार रहे 
हंसी - खुशी के साथ गुजरता जीवन हो 
वादें- कसमें की क्या जरूरत 
मन  में विश्वास हो 
हर हाल में यह साथ होगा 
हर मोड़ पर यह खड़ा होगा 
आए कितने ही आंधी-तूफान 
रहेगा कायम यह बंधन 

Tuesday, 16 December 2025

गम किस बात का

झुकाने की कोशिश तो बहुत हुई 
न मैं झुकी न मैं रुकी 
न जाने कौन सी मिट्टी की बनी हुई 
आपदा को भी आसान बना लेना 
उसके अनुसार ढल जाना 
अपने अनुसार उसको बना लेना 
हर हाल में संतुष्ट 
ईश्वर से कभी ज्यादा कुछ मांगा नहीं 
वह तो हर राह आसान करता गया 
रास्ता दिखाता गया 
मदद के लिए किसी को भेजता रहा 
उससे कोई शिकायत नहीं 
पहले कभी-कभार होती भी थी 
अब नहीं होती 
शिकायत तो लोगों से थी 
अब वह भी नहीं रही 
समय के अनुसार हर कोई चला 
साथ- साथ चला 
जरूरत पर चला 
उनका कर्तव्य नहीं था 
उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती थी 
फिर भी किया 
क्योंकि जिनकी बनती थी उन्होंने नहीं किया 
शून्य से यात्रा शुरू हुई 
अब चल रही है 
किससे नाराज रहूं 
समय बदला लोग भी बदले 
हम भी तो बदले 
सबकी अपनी अपनी जिंदगी 
अपना अपना भाग्य 
गलतियां तो हर किसी से 
माने या न माने 
अब तो छोड़ना है पीछे 
नयी डगर नयी राह 
भूत को पकड़कर रखना बुद्धिमानी तो नहीं 
जिनसे दिल से प्यार किया 
उसका बुरा सोचे कैसे 
तब भी तो दुखी हम ही 
बस किनारा कर ले 
अपनी नैया का मुख मोड़ ले 
नये राह पर चल पड़े 
जो अब तक साथ रहा है 
वह ईश्वर तो अब भी साथ है 
गम किस बात का 

Monday, 15 December 2025

भय

मैंने तो तुमको हाथ दिया था 
विश्वास था इसको थामे रखोगे 
बात का क्या 
वह तो आती - जाती है 
आज कहा कल भूला 
उसको क्या पकड़कर रखना 
लेकिन वास्तविकता तो यह
लोग बात पकड़कर रखते हैं 
हाथ छोड़ देते हैं 
वही तो तुमने किया 
तुम भी तो इसी दुनिया के 
कुछ अलग तो नहीं 
गलतफहमी में तो हम थे 
गलत तो हम भी थे 
हम ने क्यों विश्वास किया 
भरोसा उस पर क्या करना 
जो हर बात- बात पर बुरा मानता हो
वहाँ विश्वास नहीं भय का वास होगा 
जहाँ भय वहाँ प्रेम कहाँ  

Sunday, 14 December 2025

समय की धारा

क्या सही क्या गलत
अब भला पीछे मुड़कर क्यों देखना 
जो लगा उचित वह किया 
जितनी समझ उतना समझा 
परखा कितना 
धोखा कितना 
इस्तेमाल कितना 
गलती कितनी 
निर्णय कहाँ सही कहाँ गलत 
लेखा - जोखा से क्या होगा 
उससे सबक तो सीखा 
वहीं तो नहीं दोहराया जाएंगा 
कल कोई दूसरा मसला 
उससे सब अंजान 
पछता कर हासिल क्या 
ऐसा होता तो 
वैसा होता तो 
जिंदगी अनिश्चित 
यहाँ मौसम का मिजाज कब बदले 
कोई नहीं जानता 
अचानक क्या हो जाए 
कुछ वश में नहीं 
समय के अनुसार चलना है 
वह पल पल बदलता है 
ऐसा लगता है 
सब ठीक है 
करवट ले लेता है 
कुछ सही नहीं हो रहा है 
सही होने लगता है 
बस रौ में बहते जाओ 
तैरते रहो 
मझधार में फंसो तो हाथ- पैर मारो 
किनारे पर पहुंचो 
खुश हो जाओ 
बस चलो समय की धारा संग