जग को प्रकाशित करना मेरा कार्य
अंधेरा दूर करने को प्रतिबद्ध
कुंती तो विवश थी
लोकलाज का डर था उसे
वह कुंवारी माता बनी जिसे समाज स्वीकार नहीं करता
दो कुल का भार था उस पर
पर मैंने क्या किया
क्या कर्ण के जन्म का भागीदार मैं नहीं था
मैं उसे अपमानित होते देखता रहा
कुंती ही अकेले उसकी जिम्मेदार नहीं थी
मुझ पर क्यों कोई लांछन नहीं लगा
सारा अपमान कुंती पर
कोसा उसे गया
बताती तो कुल्टा कहलाती
कैसी मां जो बच्चें को नदी में बहा दिया
वह रोती रही बिलखती रही
उसकी पीड़ा - मजबूरी को किसी ने समझा
कर्ण ने भी उसे लताड़ा
स्वाभाविक भी था
बच्चा तो दोषी नहीं था
उसका कोई कुसूर भी न था
कुंती महलों की महारानी बनी रही
पांच महारथी में स्नेह बांटती रही
मैं देवता बना रहा
पूजन करवाता रहा
मैं सारे संसार में प्रकाश बांटता रहा
कर्ण के जीवन का अंधेरा
महाभारत के युद्ध का कारणों में एक था
माता - पिता की पहचान के बिना नाजायज संतान
धर्म को जानते हुए भी अधर्मी दुर्योधन के साथ खड़े रहना
योग्यता की कद्र नहीं
पहचान के लिए तरसना
महाभारत को कौन टाल सकता था
अन्याय और अधर्म पर खड़ा समाज
उसे खत्म होना ही था
द्वारिकाधीश को अवतरित ही होना था
दोषी तो सब थे
अकेला दुर्योधन नहीं
वह तो वह नैया थी जो डूबने की कगार पर थी
नाविक का अता - पता नहीं
कोई वचनबद्ध तो कोई धर्म राज तो कोई तन - मन से नेत्रहीन
धर्म हिचकोले खा रहा था
दुर्योधन ने डुबो दिया
अच्छा ही हुआ
कहीं तो खत्म होना था नई शुरुआत के लिए
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