सुहानी सुबह
शांतिदाई रात्रि
एक अदद घर
पेट भर भोजन
प्रिय स्वजन
सब सुखी और संपन्न
कामकाज
शिक्षा
योग्यता
सम्मान
स्वस्थ शरीर
सुंदर मन
ईश्वर भक्ति
संतुष्टि
धीरज
शांति
इतनी खुशी काफी है खुश रहने के लिए
बहुत ज्यादा नहीं चाहिए
न कोई झोल न झमेला
उपरोक्त सभी मिल जाए
तब आसान हो जाए
जीवन का हर खेला
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Monday, 2 December 2019
जीवन का खेला
Sunday, 1 December 2019
कविता मर रही है
आज मेरी कविता मर रही है
थक रही है
निशब्द हो रही है
आए दिन वही
कितना लिखेंगी
वह भी सामान्य घटना हो जाएगी
कुछ बच ही नहीं रहा है
हर बार वही
सब लिख चुके
बार बार वही दोहराना
उसका कोई असर भी नहीं
दूसरा कुछ सूझ भी नहीं रहा है
कविता तो सौन्दर्यबोध कराती है
यह तो वीभत्सिता की चरम सीमा
तब शब्द कहाँ से आएगे
कविता को भी मूक बनना पडेगा
तमाशा देखना पडेगा
क्रांति की जननी कविता
यहाँ तो लाचार खडी है
किसी को उसकी नहीं पडी
अब पढने की जरूरत नहीं
अब तो मोबाइल में अश्लील फोटों देखना है
वीभत्स कृत्य को अंजाम देना है
ज्यादा क्या होगा
केस चलेगा
सजा होगी
फांसी हो जाएगी
या फिर वह भी माफ हो जाएगी
है तो औरत ही
दिल रो रहा है
कहीं न कहीं नाराज हैं
कहीं न कहीं लाचार है
कहीं न कहीं डरा हुआ है
कहीं न कहीं सहमा हुआ है
कहने को तो स्वतंत्र है
पर वास्तव में गुलाम है
कुछ कर नहीं पा रहा है
मजबूर हो गया है
समझ नहीं पा रहा
यह सब क्या हो रहा है
क्यों हो रहा है
हर रोज एक नई वारदात को अंजाम
आए दिन बलात्कार
नारी की अस्मिता पर प्रहार
कितना वहशीपन हुआ जा रहा इंसान
कानून ,सरकार सब हो गए हैं लाचार
ऑखों पर पट्टी बांध रखी है
जमीर मर गया है
ऐसा तो होता रहेगा
औरत है न वह
चाहे अनपढ़ हो या पढी लिखी
छोटे वस्त्र हो या पूरा शरीर ढका हो
दो महीने की मासूम हो
या फिर साठ साल की वृद्धा हो
है तो औरत ही
जीने का मजा तो अपनों के साथ
आज घर में अकेले हूँ
सब बाहर गए हैं
शांति ही शांति
सुबह उठते ही कोई किच-किच नहीं
आराम से अपना मनपसंद खाऊँगी
टेलीविजन देखूंगी
व्यायाम करूँगी
टहलने जाऊंगी सुबह सुबह
अच्छा मजेदार दिन काटेगा
हर रोज जैसा उबाऊ नहीं
रात में भी नीरव शांति
वह अखरने लगी
आदत जो नहीं थी
किसी का इंतजार भी नहीं था
समय से पहले ही बिस्तर पर
देर रात तक नींद नहीं
सुबह हुई
देर तक सोई
सर भारी भारी
किसी तरह चाय बना ली
बस फिर पसर गई सोफे पर
कहाँ का खाना
कहाँ का टहलना
सब धरा का धरा
स॔ध्या हुई
इंतजार अपनों का
कब आएंगे
कम से कम घर में हलचल तो रहती है
जीवन का एहसास तो रहता है
किसी के लिए कुछ करना रहता है
भावनाओं का खिलवाड़ चलता है
कभी हंसना
कभी रोना
कभी क्रोध
कभी नाराजगी
कभी खुशी
कभी गम
कभी उदासी
कभी जिद
अकेले में तो इनका कोई स्थान नहीं
यहाँ तो अपनी मनमानी
तब क्या मजा जीने में
जीने का मजा तो अपनों के साथ