Monday, 3 February 2020

Who hurts you

*Who hurts you!!*

_When Abraham Lincoln became the president of America, his father was a shoemaker.  And, naturally, egoistic people were very much offended that a shoemaker’s son should become the president.   On the first day, as Abraham Lincoln entered to give his inaugural address, just in the middle, one man stood up.  He was a very rich aristocrat.  He said, “Mr. Lincoln, you should not forget that your father used to make shoes for my family.”  And the whole Senate laughed; they thought that they had made a fool of Abraham Lincoln._

_But certain people are made of a totally different mettle. Lincoln looked at the man directly in the eye and said, *“Sir, I know that my father used to make shoes for your family, and there will be many others here because he made shoes the way nobody else can”. He was a creator. His shoes were not just shoes; he poured his whole soul into them. I want to ask you, have you any complaint? Because I know how to make shoes myself. If you have any complaint I can make you another pair of shoes. But as far as I know, nobody has ever complained about my father’s shoes. He was a genius, a great creator and I am proud of my father”.*_

_The whole Senate was struck dumb. They could not understand what kind of man Abraham Lincoln was. He was proud because his father did his job so well, with so much enthusiasm, such a passion, and perfection._

*_It does not matter what you do. What matters is how you do it of your own accord, with your own vision, with your own love.  Then whatever you touch becomes gold._*

*Moral*

_No one can hurt you without your consent. It is not what happens to us that hurts us. It is our response that hurts us._

*“Ships don’t sink because of the water around them; ships sink because of the water that gets in them. Don’t let what’s happening around you get inside you and weigh you down”*

*WONDERFUL PIECE FOR THE VERY MATURE MIND*.
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तत्वनिष्ठ कहानी

        *तत्त्वनिष्ठ*
"अजी सुनते हो? राहूल को कम्पनी में जाकर टिफ़िन दे आते हो क्या?"
"क्यों आज राहूल टिफ़िन लेकर नहीं गया।?"
शरदराव ने पुछा।
आज राहूल की कम्पनी के चेयरमैन आ रहे हैं, इसलिये राहूल सुबह सात बजे ही निकल गया और इतनी सुबह खाना नहीं बन पाया था।"
" ठीक हैं। दे आता हूँ मैं।"
शरदराव ने हाथ का पेपर रख दिया और वो कपडे बदलने के लिये कमरे में चले गये।"
पुष्पाबाई ने एक उच्छ्वास छोडकर राहत की साँस ली।
शरदराव तैयार हुए मतलब उसके और राहूल के बीच हुआ विवाद उन्होंने नहीं सुना था। विवाद भी कैसा ? हमेशा की तरह राहूल का अपने पिताजी पर दोषारोपण करना और पुष्पाबाई का अपनी पति के पक्ष में बोलना।
विषय भी वही! हमारे पिताजी ने हमारे लिये क्या किया? मेरे लिये क्या किया हैं मेरे बाप ने ?  ऐसा गैरसमज उसके मन में समाया हुआ था।
  "माँ! मेरे मित्र के पिताजी भी शिक्षक थे, पर देखो उन्होंने कितना बडा बंगला बना लिया। नहीं तो एक ये हमारे नाना (पिताजी) । अभी भी हम किराये के मकान में ही रह रहे हैं।"
"राहूल, तुझे मालूम हैं कि तुम्हारे नाना घर में बडे हैं। और दो बहनों और दो भाईयों की शादी का खर्चा भी उन्होंने उठाया था। सिवाय इसके तुम्हारी बहन की शादी का भी खर्चा उन्होंने ने ही किया था। अपने गांव की जमीन की कोर्ट कचेरी भी लगी ही रही। ये सारी जवाबदारियाँ किसने उठाई? "
" क्या उपयोग हुआ उसका? उनके भाई - बहन बंगलों में रहते हैं। कभी भी उन्होंने सोचा कि हमारे लिये जिस भाई ने इतने कष्ट उठाये उसने एक छोटा सा मकान भी नहीं बनाया, तो हम ही उन्हें एक मकान बना कर दे दें ? "
एक क्षण के लिए पुष्पाबाई की आँखें भर आईं। क्या बतायें अपने जन्म दिये पुत्र को  *"बाप ने क्या किया मेरे लिये"*  पुछ रहा हैं? फिर बोली  ....
" तुम्हारे नाना ने अपना कर्तव्य निभाया। भाई-बहनों से कभी कोई आशा नहीं रखी। "
राहूल मूर्खों जैसी बात करते हुए बोला — "अच्छा वो ठीक हैं। उन्होंने हजारों बच्चों की ट्यूशन्स ली। यदि उनसे फीस ले लेते तो आज पैसो में खेल रहे होते। आजकल के क्लासेस वालों को देखो। इंपोर्टेड गाड़ियों में घुमते हैं। "
" यह तुम सच बोल रहे हो। परन्तु, तुम्हारे नाना( पिताजी) का तत्व था, *ज्ञानदान का पैसा नहीं लेना।* उनके इन्हीं तत्वों के कारण उनकी कितनी प्रसिद्धि हुई। और कितने पुरस्कार मिलें। उसकी कल्पना हैं तुझे। "
ये सुनते ही राहूल एकदम नाराज हो गया।
" क्या चाटना हैं उन पुरस्कारों को? उन पुरस्कारों से घर थोडे ही बनाते आयेगा। पडे ही धूल खाते हुए। कोई नहीं पुछता उनको।"
इतने में दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी। राहूल ने दरवाजा खोला तो शरदराव खडे थे। नाना ने अपना बोलना तो नहीं सुना इस डर से राहूल का चेहरा उतर गया। परन्तु, शरदराव बिना कुछ बोले अन्दर चले गये। और वह वाद वहीं खत्म हो गया।
ये था पुष्पाबाई और राहूल का कल का झगड़ा, पर आज ....

शरदरावने टिफ़िन साईकिल को  अटकाया और तपती धूप में औद्योगिक क्षेत्र की राहूल की कम्पनी के लिये निकल पडे। सात किलोमीटर दूर कंपनी तक पहूचते - 2 उनका दम फूल गया था। कम्पनी के गेट पर सिक्युरिटी गार्ड ने उन्हें रोक दिया।
"राहूल पाटील साहब का टिफ़िन देना हैं। अन्दर जाँऊ क्या?"
"अभी नहीं देते आयेगा।" गार्ड बोला।
"चेयरमैन साहब आये हुए हैं। उनके साथ मिटिंग चल रही हैं। किसी भी क्षण वो मिटिंग खत्म कर आ सकते हैं। तुम बाजू में ही रहिये। चेयरमैन साहब को आप दिखना नहीं चाहिये।"
शरदराव थोडी दूरी पर धूप में ही खडे रहे। आसपास कहीं भी छांव नहीं थी।
थोडी देर बोलते बोलते एक घंटा निकल गया। पांवों में दर्द उठने लगा था। इसलिये शरदराव वहीं एक तप्त पत्थर पर बैठने लगे, तभी गेट की आवाज आई। शायद मिटिंग खत्म हो गई होगी।
  चेयरमैन साहेब के पीछे पीछे अधिकारी
और उनके साथ राहूल भी बाहर आया।
उसने अपने पिताजी को वहाँ खडे देखा तो मन ही मन नाराज हो गया।
   चेयरमैन साहब कार का दरवाजा खोलकर बैठने ही वाले थे तो उनकी नजर शरदराव की ओर उठ गई। कार में न बैठते हुए वो वैसे ही बाहर खडे रहे।
  "वो सामने कौन खडा हैं?" उन्होंने सिक्युरिटी गार्ड से पुछा।
"अपने राहूल सर के पिताजी हैं। उनके लिये खाने का टिफ़िन लेकर आये हैं।" गार्ड ने कंपकंपाती आवाज में कहा।
"बुलवाइये उनको। "
  जो नहीं होना था वह हुआ। राहूल के तन से पसीने की धाराऐं बहने लगी। क्रोध और डर से उसका दिमाग सुन्न हुआ जान पडने लगा।
गार्ड के आवाज देने पर शरदराव पास आये।
चेयरमैन साहब आगे बढे और उनके समीप गये।
" आप पाटील सर हैं ना? डी. एन. हायस्कूल में शिक्षक थे। "
" हाँ। आप कैसे पहचानते हो मुझे?"
कुछ समझने के पहले ही चेयरमैन साहब ने शरदराव के चरण छूये। सभी अधिकारी और राहूल वो दृश्य देखकर अचंभित रह गये।
"सर, मैं अतिश अग्रवाल। तुम्हारा विद्यार्थी । आप मुझे घर पर पढ़ाने आते थे। "
" हाँ.. हाँ.. याद आया। बाप रे बहुत बडे व्यक्ति बन गये आप तो ..."
चेयरमैन हँस दिये। फिर बोले, "सर आप यहाँ धूप में क्या कर रहे हैं। आईये अंदर चलते हैं। बहुत बातें करनी हैं आपसे।
सिक्युरिटी तुमने इन्हें अन्दर क्यों नहीं बिठाया? "
गार्ड ने शर्म से सिर नीचे झुका लिया।
वो देखकर शरदराव ही बोले —" उनकी कोई गलती नहीं हैं। आपकी मिटिंग चल रही थी। आपको तकलीफ न हो, इसलिये मैं ही बाहर रूक गया। "
"ओके... ओके...!"
चेयरमैन साहब ने शरदराव का हाथ  अपने हाथ में लिया और उनको अपने आलीशन चेम्बर में ले गये।
"बैठिये सर। अपनी कुर्सी की ओर इंगित करते हुए बोले।
" नहीं। नहीं। वो कुर्सी आपकी हैं।" शरदराव सकपकाते हुए बोले।
"सर, आपके कारण वो कुर्सी मुझे मिली हैं। तब पहला हक आपका हैं। "
चेयरमैन साहब ने जबरदस्ती से उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाया।
" आपको मालूम नहीं होगा पवार सर.."
जनरल मैनेजर की ओर देखते हुए बोले,
"पाटिल सर नहीं होते तो आज ये कम्पनी नहीं होती और मैं मेरे पिताजी की अनाज की दुकान संभालता रहता। "
राहूल और जी. एम. दोनों आश्चर्य से उनकी ओर देखते ही रहे।
"स्कूल समय में मैं बहुत ही डब्बू विद्यार्थी था। जैसे तैसे मुझे नवीं कक्षा तक पहूँचाया गया। शहर की सबसे अच्छी क्लासेस में मुझे एडमिशन दिलाया गया। परन्तु मेरा ध्यान कभी पढाई में नहीं लगा। उस पर अमीर बाप की औलाद। दिन भर स्कूल में मौज मस्ती और मारपीट करना। शाम की क्लासेस से बंक मार कर मुवी देखना यही मेरा शगल था। माँ को वो सहन नहीं होता। उस समय पाटिल सर कडे अनुशासन और उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में प्रसिद्ध थे। माँ ने उनके पास मुझे पढ़ाने की विनती की। परन्तु सर के छोटे से घर में बैठने के लिए जगह ही नहीं थी। इसलिये सर ने पढ़ाने में असमर्थता दर्शाई। माँ ने उनसे बहुत विनती की। और हमारे घर आकर पढ़ाने के लिये मुँह मांगी फीस का बोला। सर ने फीस के लिये तो मना कर दिया। परन्तु अनेक प्रकार की विनती करने पर घर आकर पढ़ाने को तैयार हो गये। पहिले दिन सर आये। हमेशा की तरह मैं शैतानी करने लगा। सर ने मेरी अच्छी तरह से धुनाई कर दी। उस धुनाई का असर ऐसा हुआ कि मैं चुपचाप बैठने लगा। तुम्हें कहता हूँ राहूल, पहले हफ्ते में ही मुझे पढ़ने में रूचि जागृत हो गई। तत्पश्चात मुझे पढ़ाई के अतिरिक्त कुछ भी सुझाई नहीं देता था। सर इतना अच्छा पढ़ाते थे, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान जैसे विषय जो मुझे कठिन लगते थे वो अब सरल लगने लगे थे। सर कभी आते नहीं थे तो मैं व्यग्र हो जाता था। नवीं कक्षा में मैं दुसरे नम्बर पर आया। माँ-पिताजी को खुब खुशी हुई। मैं तो, जैसे हवा में उडने लगा था। दसवीं में मैंने सारी क्लासेस छोड दी और सिर्फ पाटिल सर से ही पढ़ने लगा था। और दसवीं में मेरीट में आकर मैंने  सबको चौंका दिया था।"
" माय गुडनेस...! पर सर फिर भी आपने सर को फीस नहीं दी? "
  जनरल मैनेजर ने पुछा।          
" मेरे माँ - पिताजी के साथ मैं सर के घर पेढे लेकर गया। पिताजी ने सर को एक लाख रूपये का चेक दिया। सर ने वो नहीं लिया। उस समय सर क्या बोले वो मुझे आज भी याद हैं। सर बोले — "मैंने कुछ भी नहीं किया। आपका लडका ही बुद्धिमान हैं। मैंने सिर्फ़ उसे रास्ता बताया। और मैं ज्ञान नहीं बेचता। मैं वो दान देता हूँ। बाद में मैं सर के मार्गदर्शन में ही बारहवीं मे पुनः मेरीट में आया। बाद में बी. ई. करने के बाद अमेरिका जाकर एम. एस. किया। और अपने शहर में ही यह कम्पनी शुरु की। एक पत्थर को तराशकर सर ने हीरा बना दिया। और मैं ही नहीं तो सर ने ऐसे अनेक असंख्य हिरें बनाये हैं। सर आपको कोटी कोटी प्रणाम...!!"
चेयरमैन साहब ने अपनी आँखों में आये अश्रु रूमाल से पोंछे।
" परन्तु यह बात तो अदभूत ही हैं कि, बाहर शिक्षा का और ज्ञानदान का  बाजार भरा पडा होकर भी सर ने एक रूपया भी न लेते हुए हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाया, न केवल पढ़ाये पर उनमें पढ़ने की रूचि भी जगाई। वाह सर मान गये आपको और आपके आदर्श को।"
शरदराव की ओर देखकर जी. एम ने कहा।
" अरे सर! ये व्यक्ति तत्त्वनिष्ठ हैं। पैसों, और मान सम्मान के भूखे भी नहीं हैं। विद्यार्थी का भला हो यही एक मात्र उद्देश्य था। "चेयरमैन बोले।
" मेरे पिताजी भी उन्हीं मे से एक। एक समय भूखे रह लेंगे, पर अनाज में मिलावट करके बेचेंगे नहीं।" ये उनके तत्व थे। जिन्दगी भर उसका पालन किया। ईमानदारी से व्यापार किया। उसका फायदा आज मेरे भाईयों को हो रहा हैं।"
बहुत देर तक कोई कुछ भी नहीं बोला  । फिर चेयरमैन ने शरदराव से पुछा, - "सर आपने मकान बदल लिया या उसी मकान में हैं रहते हैं। "
"उसी पुराने मकान में रहते हैं सर! "
शरदराव के बदले में राहूल ने ही उत्तर दिया।
    उस उत्तर में पिताजी के प्रति छिपी नाराजगी तत्पर चेयरमैन साहब की समझ में आ गई ।
‌"तय रहा फिर। सर आज मैं आपको गुरू दक्षिणा दे रहा हूँ। इसी शहर में मैंने कुछ फ्लैट्स ले रखे हैं। उसमें का एक थ्री बी. एच. के. का मकान आपके नाम कर रहा हूँ....."
"क्या.?"
शरदराव और राहूल दोनों आश्चर्य चकित रूप से बोलें। "नहीं नहीं इतनी बडी गुरू दक्षिणा नहीं चाहिये मुझे।"शरदराव आग्रहपूर्वक बोले।
चेयरमैन साहब ने शरदराव के हाथ को अपने हाथ में लिया।  " सर, प्लीज....  ना मत करिये और मुझे माफ करें। काम की अधिकता में आपकी गुरू दक्षिणा देने में पहले ही बहुत देर हो चुकी हैं।"
फिर राहूल की ओर देखते हुए उन्होंने पुछ लिया, राहूल तुम्हारी शादी हो गई क्या? "
‌" नहीं सर, जम गई हैं। और जब तक रहने को अच्छा घर नहीं मिल जाता तब तक शादी नहीं हो सकती। ऐसी शर्त मेरे ससुरजी ने रखी होने से अभी तक शादी की डेट फिक्स नहीं की। तो फिर हाॅल भी बुक नहीं किया। "
चेयरमैन ने फोन उठाया और किसी से बात करने लगे।समाधान कारक चेहरे से फोन रखकर, धीरे से बोले" अब चिंता की कोई बात नहीं। तुम्हारे मेरीज गार्डन का काम हो गया। *"सागर लान्स"* तो मालूम ही होगा! "
" सर वह तो बहूत महंगा हैं... "
" अरे तुझे कहाँ पैसे चुकाने हैं। सर के सारे विद्यार्थी सर के लिये कुछ भी कर
‌ ‌सकते हैं। सर के बस एक आवाज देने की बात हैं। परन्तु सर तत्वनिष्ठ हैं, वैसा करेंगे भी नहीं। इस लान्स का मालिक भी सर का ही विद्यार्थी हैं। उसे मैंने सिर्फ बताया। सिर्फ हाॅल ही नहीं तो भोजन सहित संपूर्ण शादी का खर्चा भी उठाने की जिम्मेदारियाँ ली हैं उसने... वह भी स्वखुशी से। तुम केवल तारिख बताओ और सामान लेकर जाओ।
"बहूत बहूत धन्यवाद सर।" राहूल अत्यधिक खुशी से हाथ जोडकर बोला। "धन्यवाद मुझे नहीं, तुम्हारे पिताश्री को दो राहूल! ये उनकी पुण्याई हैं। और मुझे एक वचन दो राहूल! सर के अंतिम सांस तक तुम उन्हें अलग नहीं करोगे और उन्हें
कोई दुख भी नहीं होने दोगे। मुझे जब भी मालूम चला कि, तुम उन्हें दुख दे रहे होतो, न केवल इस कम्पनी से  लात मारकर भगा दुंगा परन्तु पुरे महाराष्ट्र भर के किसी भी स्थान पर नौकरी करने लायक नहीं छोडूंगा। ऐसी व्यवस्था कर दूंगा।"
चेयरमैन साहब कठोर शब्दों में बोले।
" नहीं सर। मैं वचन देता हूँ, वैसा कुछ भी नहीं होगा। "राहूल हाथ जोडकर बोला।
   शाम को जब राहूल घर आया तब, शरदराव किताब पढ रहे थे। पुष्पाबाई पास ही सब्जी काट रही थी। राहूल ने बॅग रखी और शरदराव के पाँव पकडकर बोला —" नाना, मुझसे गलती हो गई। मैं आपको आजतक गलत समझता रहा। मुझे पता नहीं था नाना आप इतने बडे व्यक्तित्व लिये हो।"
‌ शरदराव ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया।
अपना लडका क्यों रो रहा हैं, पुष्पाबाई की समझ में नहीं आ रहा था। परन्तु कुछ अच्छा घटित हुआ हैं। इसलिये पिता-पुत्र में प्यार उमड रहा हैं। ये देखकर उनके नयनों से भी कुछ बुन्दे गाल पर लुढक आई।
.....................................
*एक विनती*
  ☝ *उपरोक्त कथा पढने के उपरान्त आपकी आँखों से 1 भी बुन्द बाहर आ गई हो तो ही यह पोस्ट अपने स्नेहीजन तक भेजियेगा जरूर ! ✍✍✍✍✍✍ * और कृपया अपने पिताजी से कभी यह न कहे कि "आपने मेरे लिये किया ही क्या हैं? क्या कमाकर रखा मेरे लिये? जो भी कमाना हो वो स्वयम् अर्जित करें। जो शिक्षा और संस्कार उन्होंने तुम्हें दिये हैं वही तुम्हें कमाने के लिए पथप्रदर्शक रहेंगे*
✍ श्री अनिल मांडगेजी की पोस्ट का हिन्दी अनुवाद। ✍
अनुवादक
भारतेन्द्र लाम्भाते Copy paste

कहानी सेवा की

*👉🏿बुद्धिमानी से सेवा करें...!*

एक लड़की विवाह करके ससुराल में आयी| घर में एक तो उसका पति था, एक सास थी और एक दादी सास थी| वहाँ आकर उस लड़की ने देखा कि दादी सास का बड़ा अपमान, तिरस्कार हो रहा है! छोटी सास उसको ठोकर मार देती, गाली दे देती| यह देखकर उस लड़की को बड़ा बुरा लगा और दया भी आयी! उसने विचार किया कि अगर मैं सास से कह कहूँ कि आप अपनी सास का तिरस्कार मत किया करो तो वह कहेगी कि कल की छोकरी आकर मुझे उपदेश देती है, गुरु बनती है! अतः उसने अपनी सास से कुछ नहीं कहा| उसने एक उपाय सोचा| वह रोज काम-धंधा करके दादी सास के पास जाकर बैठ जाती और उसके पैर दबाती| जब वह वहाँ ज्यादा बैठने लगी तो यह सास को सुहाया नहीं| एक दिन सास ने उससे पूछा कि ‘बहु! वहाँ क्यों जा बैठी?’ लड़की ने कहा कि ‘बोलो, काम बताओ!’ सास बोली कि ‘काम क्या बतायें, तू वहाँ क्यों जा बैठी?’ लड़की बोली कि ‘मेरे पिता जी ने कहा था कि जवान लड़कों के साथ तो कभी बैठना ही नहीं, जवान लड़कियों के साथ भी कभी मत बैठना; जो घर में बड़े-बूढ़े हों, उनके पास बैठना, उनसे शिक्षा लेना| हमारे घर में सबसे बूढ़ी ये ही हैं, और किसके पास बैठूँ? मेरे पिताजी ने कहा था कि वहाँ हमारे घर की रिवाज नहीं चलेगी, वहाँ तो तेरे ससुराल की रिवाज चलेगी| मेरे को यहाँ की रिवाज सीखनी है, इसलिये मैं उनसे पूछती हूँ कि मेरी सास आपकी सेवा कैसे करती है?’ सास ने पूछा कि ‘बुढ़िया ने क्या कहा?’ वह बोली कि ‘दादी जी कहती हैं कि यह मेरे को ठोकर नहीं मारे, गाली नहीं दे तो मैं सेवा ही मान लूँ!’ सास बोली कि ‘क्या तू भी ऐसा ही करेगी?’ वह बोली कि ‘मैं ऐसा नहीं कहती हूँ, मेरे पिता जी ने कहा कि बड़ों से ससुराल की रीति सीखना!’

सास डरने लग गयी कि मैं अपनी सास के साथ जो बर्ताव करुँगी, वही बर्ताव मेरे साथ होने लग जायगा! एक जगह कोने में ठीकरी इकट्ठी पड़ी थीं| सास ने पूछा-‘बहू! ये ठीकरी क्यों क्यों इकट्ठी की हैं?’

लड़की ने कहा-‘आप दादी जी को ठीकरी में भोजन दिया करती हो, इसलिये मैंने पहले ही जमा कर ली|’

‘तू मेरे को ठीकरी में भोजन करायेगी क्या?’

‘मेरे पिता जी ने कहा कि तेरे वहाँ की रीति चलेगी|’

‘यह रीति थोड़े ही है!’

‘तो आप फिर आप ठीकरी मैं क्यों देती हो?’

‘थाली कौन माँजे?’

‘थाली तो मैं माँज दूँगी|’

‘तो तू थाली में दिया कर, ठीकरी उठाकर बाहर फेंक|’ अब बूढ़ी माँजी को थाली में भोजन मिलने लगा| सबको भोजन देने के बाद जो बाकी बचे, वह खिचड़ी की खुरचन, कंकड़ वाली दाल माँ जी को दी जाती थी| लड़की उसको हाथ में लाकर देखने लगी| सास ने पूछा-‘बहू! क्या देखती हो?’

‘मैं देखती हूँ कि बड़ों को भोजन कैसा दिया जाय|’

‘ऐसा भोजन देने की कोई रीति थोड़े ही है!’

‘तो फिर आप ऐसा भोजन क्यों देती हो?’

‘पहले भोजन कौन दे?’

‘आप आज्ञा दो तो मैं दे दूँगी|’

‘तो तू पहले भोजन दे दिया कर|’

‘अच्छी बात है!’

अब बूढ़ी माँ जी को बढ़िया भोजन मिलने लगा| रसोई बनते ही वह लड़की ताजी खिचड़ी, ताजा फुलका, दाल-साग ले जाकर माँ जी को दे देती| माँ जी तो मन-ही-मन आशीर्वाद देने लगी| माँ जी दिनभर एक खटिया में पड़ी रहती| खटिया टूटी हुई थी| उसमें से बन्दनवार की तरह मूँज नीचे लटकती थी| लड़की उस खटिया को देख रही थी| सास बोली कि ‘क्या देखती हो?’

‘देखती हूँ कि बड़ों को खाट कैसे दी जाय|’

‘ऐसी खाट थोड़े ही दी जाती है! यह तो टूट जाने से ऐसी हो गयी|’

‘तो दूसरी क्यों नही बिछातीं?’

‘तू बिछा दे दूसरी|’

‘आप आज्ञा दो तो दूसरी खाट बिछा दूँ!’

अब माँ जी के लिए निवार की खाट लाकर बिछा दी गयी| एक दिन कपड़े धोते समय वह लड़की माँ जी के कपड़े देखने लगी| कपड़े छलनी हो रखे थे| सास ने पूछा कि ‘क्या देखती हो?’

‘देखती हूँ कि बूढों को कपड़ा कैसे दिया जाय|’

‘फिर वही बात, कपड़ा ऐसा थोड़े ही दिया जाता है? यह तो पुराना होने पर ऐसा हो जाता है|’

‘फिर वही कपड़ा रहने दें क्या?’

‘तू बदल दे|’

अब लड़की ने माँ जी का कपड़ा चादर, बिछौना आदि सब बदल दिया| उसकी चतुराई से बूढ़ी माँ जी का जीवन सुधर गया!

अगर वह लड़की सास को कोरा उपदेश देती तो क्या वह उसकी बात मान लेती? बातों का असर नहीं पड़ता, आचरण का असर पड़ता है| इसलिये लड़कियों को चाहिये कि ऐसी बुद्धिमानी से सेवा करें और सबको राजी रखें|

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Article for Senior Citizens

Such a nice article to read, not just for senior citizens but for all of us.
Getting old is a reality that we need to embrace and prepare for

*The Sky Gets Dark, Slowly*

Mao Dun literary prize winner Zhou Daxin’s latest novel to be published, “The Sky Gets Dark, Slowly”, is a sensitive exploration of old age and the complex, hidden emotional worlds of the elderly in a  rapidly ageing population.

In it he writes, “…Many elderly speak as though they know everything, but of old age they are in fact as ignorant as children. Many elderly are in fact, completely unprepared for what they are to face when it comes to getting old and the road that lays ahead of them.

In the time between a person turning 60 years old, as they begin to age, right until all the lights go out and the sky gets dark, there are some situations to keep in mind, so that you will be prepared for what is to come, and you will not panic.

1.
The people by your side will only continue to grow smaller in number. People in your parents’ and grandparents’ generation have largely all left, whilst many your peers will increasingly find it harder to look after themselves, and the younger generations will all be busy with their own lives. Even your wife or husband may depart earlier than you, or than you would expect, and what might then come are days of emptiness. You will have to learn how to live alone, and to enjoy and embrace solitude.

2.
Society will care less and less for you. No matter how glorious your previous career was or how famous you were, ageing will always transform you into a regular old man and old lady. The spotlight no longer shines on you, and you have to learn to contend with standing quietly in one corner, to admire and appreciate the hubbub and views that come after you, and you must overcome the urge to be envious or grumble.

3.
The road ahead will be rocky and full of precarity. Fractures, cardio-vascular blockages, brain atrophy, cancer… these are all possible guests that could pay you a visit any time, and you would not be able to turn them away. You will have to live with illness and ailments, to view them as friends, even; do not fantasise about stable, quiet days without any trouble in your body. Maintaining a positive mentality and get appropriate, adequate exercise is your duty, and you have to encourage yourself to keep at it consistently.

4.
Prepare for bed-bound life, a return to the infant state. Our mothers brought us into this world on a bed, and after a journey of twists and turns and a life of struggle, we return to our starting point – the bed – and to the state of having to be looked after by others. The only difference being, where we once had our mothers to care for us, when we prepare to leave, we may not have our kin to look after us. Even if we have kin, their care may never come close to that of your mother’s; you will, more likely than not, be cared for by nursing staff who bear zero relation to you, wearing smiles on their faces all whilst carrying weariness and boredom in their hearts. Lay still and don’t be difficult; remember to be grateful.

5.
There will be many swindlers and scammers along the way. Many of them know that the elderly have lots of savings, and will endlessly be thinking of ways to cheat them of their money: through scam phone calls, text messages, mail, food and product samples, get-rich-quick schemes, products for longevity or enlightenment… basically, all they want is to get all the money. Beware, and be careful, hold your money close to you. A fool and his money are soon parted, so spend your pennies wisely.

Before the sky gets dark, the last stretches of life’s journey will gradually get dimmer and dimmer; naturally, it will be harder to see the path ahead that you are treading towards, and it will be harder to keep going forward. As such, upon turning 60, it would do us all well to see life for what it is, to cherish what we have, to enjoy life whilst we can, and to not take on society’s troubles or your children’s and grandchildren’s affairs on for yourself. Stay humble, don’t act superior on account of your own age and talk down to others – this will hurt yourself as much as it will hurt others. As we get older, all the better should we be able to understand what respect is and what it counts for. In these later days of your lives, you have to understand what it means, to let go of your attachments, to mentally prepare yourself. The way of nature is the way of life; go with its flow, and live with equanimity.

*******For all of us, a nice read, very beautiful, very true .... !

Hardly the day started and ...  it is already six o'clock in the evening.

Barely arrived on Monday and it's already  Friday.

... and the month is almost over.
... and the year is almost up.
... and already 50 or 60 or 70 years of our lives have passed.
... and we realize that we lost our parents, friends.
and we realize that it is too late to go back ...

So ...  Let's try  to take full advantage of the time we have left ...
Let's not stop looking for activities that we like ...
Let's put color in our greyness ...
Let's smile at the little things in life that put balm in our hearts.

And yet, we must continue to enjoy serenely the time that remains.
Let's try to eliminate the "after" ...
I do it after ...
I will say after ...
I will think about it after ...
We leave everything for 'later' as if "after" was ours.

Because what we do not understand is that:
after,  the coffee cools ...
after,  priorities change ...
after,  the charm is broken ...
after,  health passes ...
after,  the children grow up ...
after,  the parents get older ...
after,  the promises are forgotten ...
after,  the day becomes the night ...
after,  life ends ...
And all that afters, we find it's often too late ....

So ...  leave nothing for 'later' ...
Because in always waiting for later, we can lose the best moments,
the best experiences,
the best friends,
the best family ...
The day is today ... The moment is now ...

We are no longer at the age where we can afford to postpone until tomorrow what needs to be done right away.

So let's see if you'll have time to read this message and then share it.

Or maybe you'll leave it for ... "later" ...
And you will not share it "ever" ....

Even share with those who are not yet "seniors".

May you be well and happy

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