Saturday, 20 February 2021

लगता है अजनबीपन

सब कुछ था वहाँ
मन का सुकून नहीं था
एक घुटन सी होती थी
अंदर ही अंदर मन मसोसकर रह जाती
क्यों खुशी नहीं मिलती
हर वक्त उदासी का छाना
तब ऐसा लगा
अब यहाँ से हट जाना
क्यों होता है ऐसा
जब कुछ लगता है पराया
नहीं लगता है अपना
जबकि सब अपने ही
सब अजीज हैं
मुझे जान से प्यारे हैं
उनकी हर चोट लगती मेरी चोट
उनका दुख - दर्द
लगता मेरा अपना
हर वक्त उनकी सलामती की दुआ
यही मांगती हूँ मैं हमेशा
तब इस मन का क्या करें
क्यों विचलित होता है
कहीं न कहीं कोई तो कमी है
संबंधों में कुछ तो दुरावट है
ऊपर से कुछ
अंदर से कुछ
जो है वह दिखता नहीं
जो नहीं है वह दिखता है
क्यों नजदीकीयां बस रही है दिखावे की
जबकि मन से पास - पास
एक का कांटा लगा
दूसरे को चुभता है
फिर भी वह गर्माहट नहीं
तभी होता है
लगता है अजनबीपन

यादों के भंवर

आज यादों के झरोखों में जरा सैर कर लिया
सबका हिसाब - किताब कर लिया
क्या फटा क्या उघडा
किसको सीया
किसका रफू किया
किसकी तुरपाई की
किसकी बखिया उधेड़ फिर सिलाई की
कुछ एकदम फट गए
उसे फेंक दिया
कुछ दाग लग गए
उनको रगड़कर धो दिया
कुछ बिल्कुल फट गए
पहनने लायक ही नहीं रहें
उन्हें फेंक दिया
कुछ पुराने थे
उन्हें दे दिया ।
जिंदगी की कपडे की सिलाई करते करते न जाने क्या - क्या किया
कभी नया था तब खूब इतराए थे
कुछ दिन बाद ही सब असलियत से सामना
इतना आसान नहीं होता
न जाने कितने जतन करना पडता है
तब जाकर यह सही सलामत रहता है
न जाने कितनी बार तुरपाई , बखिया , रफू किया
सुधारते रहें
जब ज्यादा फट ही गया
बहुत पुराना हो गया
तब उसको सहेजे रखना क्यों ??
जिंदगी में नयापन भरना है
तब पुराने को छोड़ना है
फटे तो फेकना है
सांप भी पुरानी केंचुली को उतार फेंकता है
तब हम क्यों यादों के भंवर में गोते लगाएं

अपनी जिंदगी कैसे जीए

मेरी पहचान क्या ??
मैं बडे पद पर कार्यरत हूं
मैं हाइअली एज्युकेडेट हूँ
मेरा ऑफिस में एक रूतबा है
कहीं अधीनस्थ कर्मचारी मेरे अंडर काम करते है
अच्छा बडा मकान है
गाडी है
सुख - सुविधा के सब साधन है
मैं परिवार के सदस्यों का भी ध्यान रखती हूँ
पूरे परिवारों का खर्चा चलाती हूँ
मैं आत्मनिर्भर हूँ
अपने दम पर
अपने शर्तों पर जिंदगी जीती हूँ
यह सब होने के बावजूद मैं बेचारी हूँ
तरस आता है लोगों को
कारण मैं सिंगल हूँ
कोई मुझे हेय की तो
कोई दया की दृष्टि से देखता है
कुछ ईष्या से देखते हैं
तो कुछ बातें बनाने को
कोई तोहमत लगाने को
ऐसा समाज जहाँ
जिंदगी की शुरुआत ब्याह से
खत्म ब्याह पर
डोली और अर्थी वाली धारणा
कितना भी सामर्थ्यवान कोई हो जाएं
यह सोच बदलने वाली नहीं
कपड़े और रहन - सहन से आधुनिक भले हो जाएं
विचारों से मार्डन नहीं हो सकते
समाज की संरचना और उसका संचालन करने वाले
कुछ ऐसे लोग
जो न आगे बढेंगे
न किसी को बढने देंगे
बस कूपमंडूकता को ओढे अपना अस्र और शस्त्र चलाते रहेंगे
हर संभव कोशिश रहती है इनकी
कब किसको गिराया जाएं
मजा आता है इनको
ये और कुछ तो कर नहीं सकते
हाँ लोगों की जिंदगी नर्क कर डालते हैं
समाज के इन तथाकथित ठेकेदारों की परवाह किए बिना
आगे बढना है
अपनी जिंदगी अपने शर्तों पर जीना है

Friday, 19 February 2021

ऐसे ही जीना है

अब तक जी रही थी
दूसरो के लिए
उनकी इच्छा सर्वोपरि
हर सदस्य का ध्यान रखती
खाना - पीना
पहनना - ओढना
पढना - लिखना
सब कुछ ध्यान रखती
बस अपने को छोडकर
अब वही सब छोड़कर चले गए
मुझे अपना ख्याल रखने को कह गए
अब अपना ख्याल रखती हूँ
सुबह-सुबह सैर पर जाती हूँ
बिना चीनी की चाय पीती हूँ
सूखी रोटी बिना घी चुपड़ी खाती हूँ
बिना तेल - मसाला की सब्जी बनाती हूँ
भगवान का नाम जपती हूँ
नियम से स्नान - ध्यान करती हूँ
सबसे प्रेम से बोलती हूँ
ऐसा तब भी लगता है
कि कहीं कुछ छूट गया
जब जीना था अपनी मर्जी से
तब तो जीया नहीं
अब शरीर की मजबूरी है
या मर्जी कह लो
ऐसे ही जीना है
इच्छा - अनिच्छा का कहीं प्रश्न नहीं
बस निर्लिप्त भाव से जीना है