Wednesday, 17 February 2021

अभिशप्त कर्ण

मैं दान वीर कर्ण हूँ
सारी जिंदगी दान दिया
हर जाने - अंजाने को
तुमको नहीं दे सका मैं
तुम्हारे पांचों पुत्रो  का जीवन दान
अर्जुन या मैं
कोई एक बचेगा फिर भी
मैं नहीं माफ कर पाया तुमको
तुम थकी - हारी , व्यथित मेरे दर पर आई थी
मेरी अपनी माँ जननी मेरी
तुमको आधा - अधूरा ही लौटा दिया
जिसने इंद्र को कवच - कुंडल दे दिया
वह तुम्हें एक अर्जुन नहीं दे सका
जिसने मुझे जन्मते ही नदी में बहा दिया था
तुम पांच पुत्रों के साथ हस्तिनापुर की महारानी बनी रही
मैं सूतपुत्र अधिरथ और राधा का बना रहा
हर जगह मुझे धिक्कारा गया
मैं महारानी कुंती और सूर्य का पुत्र
यह कभी उजागर हो ही नहीं पाया
अर्जुन से मेरा युद्ध होना था अवश्यभांवी
वहाँ मेरे असतित्व का प्रश्न था
मैं वीर धनुर्धर हूँ
यह बताना था सभी को
मुझे तो गुरु परशुराम का शाप था यह विदित था
फिर भी तुमको लौटाया
तुमको मैं कभी क्षमा नहीं कर पाया
मैं स्वयं से हारा था
इतना विशाल हदय नहीं था मेरा
मैंने भरी सभा में पांचाली का अपमान किया था
हर कदम पर दुर्योधन के कुचक्रों में साथ रहा
केवल एक उपकार
कि उसने मुझे मेरी पहचान दी थी
अंगराज का मुकुट सर पर रखा था
जबकि मेरी पहचान तो मेरी वीरता थी
वह किसी की मोहताज नहीं थी
मृत्यु तो निश्चित है
अगर अर्जुन को जीवन दान दे भी देता
तब भी क्या ??
तब तो दोनों तरफ से हारता
हार तो मेरी ही थी माता
जहाँ माॅ ने उपेक्षा दी थी
जीवन भर दंश मैंने सहा
उस पीड़ा को अपने बाणों से अर्जुन की छाती में उतारना चाहता था
अगर वासुदेव कृष्ण नहीं होते अर्जुन के सारथी
तब तो परिणाम कुछ और होता
मैं कहीं न कहीं पांडव कहलाना चाहता था
इसलिए युद्धभूमि पर मृतवत  पडे हुए भी याचक को खाली हाथ न लौटाने वाले
अपने सोने के दांत को तोड़कर देनेवाला
कर्ण ने अपनी जननी को लौटा दिया
कर्ण वहाँ हारा था
कर्ण वहाँ टूटा था
वह प्रतिशोध की अग्नि में जल रहा था
हर हाल में हार गया था
सबके लिए दानवीर कर्ण उस दिन ही हारा था जब तुम सर झुकाएं , ऑखों में ऑसू लिए
मेरे सामने याचक बन खडी थी
पांडव मेरे भाई है यह बता कर तुमने मुझे स्वयं हरा दिया था
मेरा जन्म और मृत्यु दोनों अभिशाप बन गए

Tuesday, 16 February 2021

विद्या की देवी सरस्वती का वंदन

विद्या की देवी माँ सरस्वती की आराधना
कितना समृद्ध है हमारा सनातन धर्म
ज्ञान को सर्वोपरि समझा गया
ज्ञान बिना मनुष्य कुछ नहीं
हम लक्ष्मी की पूजा तो करते हैं
धन की संपत्ति की देवी की
ज्ञान विद्या की देवी की
माँ सरस्वती की भी पूजा करते हैं
इन दोनों का मानव जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका है
आपके पास धन हो पर ज्ञान न हो
तब उतना मजा नहीं आता
धन भी हो
विद्या भी हो
तब तो जीवन धन्य हो जाता है
कहा जाता है
लक्ष्मी और सरस्वती का निवास एक साथ नहीं होता
जिसके पास लक्ष्मी है
उसके पास सरस्वती नहीं
आज ऐसा नहीं है
शिक्षा के साथ पैसा
तभी तो जीवन स्तर भी ऊंचा हो रहा है
प्रथम है शिक्षा
अगर वह ग्रहण की तब लक्ष्मी जी भी कृपा करेंगी
शिक्षा मानव को सही अर्थों में मानव बनाती है
दृष्टिकोण बदलती है
सही गलत का निर्णय करने की ताकत देती है
जीवन जीने का ढंग समझाती है
विद्या बिना तो मनुष्य निरा पशु समान
वह इंसान बनाती है ।
व्यक्ति का  व्यवहार और बोलचाल
उसकी शिक्षा तय करती है
तभी तो हम विद्या की देवी सरस्वती का वंदन करते हैं

वसंत आया और गया

मैं वसंत को तलाश कर रहा था
कांक्रीट के जंगल में
वहाँ कहाँ मिलेगा
सडक के किनारे अवश्य कुछ पेड - पौधे
हरियाली गायब
धूल - धुसरित
गाडी ले चल पडा गाँव की ओर
खेतों में पीली सरसों फूली थी
गेहूं की बालिया लहरा रही थी
आम के पेड पर बौर आ रहे थे
लग रहा था
त्रृतुराज वसंत पधारे हैं
फिर भी कुछ कमी दिखी
वह पहले वाली बात नहीं रही
जहाँ घनदार झाडिया थी
वह अब समतल बन चुका था
मंदार और धतूर का कहीं दर्शन न था
न कंटीले नागफनी
न घेरे मे मूंज
अपने लंबे लंबे घास के साथ
महुआ - बबूल सब लुप्त हो रहे
बगीचे भी कुछ ही बचें
घर बन गए हैं
काट छांटकर साफ सुथरा कर दिया गया है
बंसवारी की जगह पर शौचालय
बैलों की जगह ट्रेक्टर
फसल काटना और दावना मशीन से
वह द्वार पर लोगों की जमघट नहीं
वसंत तो दिखा भी
वसंतोत्सव कहीं नहीं
मन सिकुड़ गए हैं
व्यक्तिवाद हावी हो रहा है
सबका अपना अपना स्वार्थ
साथ और समूह में नहीं
अकेले चलना
लगा मैं गलत जगह ढूढ रहा था
अब वसंत आता भी है
तब चुपके से चला जाता है
आहट नहीं होने देता
कहीं लोग डिस्टर्ब न हो जाय
उनके जीवन में खलल न पड जाएं
वह दबे पांव आता है
दबे पांव चला भी जाता है

कलम स्वतंत्रता चाहती है

कलम जब चलती है
तब वह बंधन में नहीं बंधना चाहती
स्वतंत्रता चाहती है
यह रचनाकार पर है
वह अपनी लेखनी कैसे चलाता है
बंध कर
किसी के दवाब में
स्वतंत्र
स्वतंत्र तो हो पर स्वच्छंद न हो
लगाम लगाना आवश्यक है
अनुशासित रहना जरूरी है
बंधन नहीं
न किसी के इशारों पर
तब जब वह चलती है
तब तहलका मचा देती है
बडे बडो को झुका देती है
कलम तलवार से ज्यादा पावरफुल
उसे आजादी पसंद है
गुलामी नहीं
वह दरबारी नहीं बनना चाहती
रचनाकार स्वतंत्र हो
यह प्रजातंत्र की सबसे बडी मांग है
अगर लेखनी दबी
तब वह विस्फोटक हो सकती है
बम फूटने की आवाज से कहीं ज्यादा गूंज
उसकी सुनाई देती है