Friday, 31 January 2025

उधार मैं रखता नहीं

तुम मेरे सामने से गएं 
आमने - सामने पड़े 
मैं कतरा कर निकल गया
नहीं इच्छा हुई ठहरने की
रुक कर हाल - चाल पूछने की
तुम्हें अच्छा नहीं लगा न
तुमने शिकायत की 
जायज भी है
कोई जान - पहचान वाला मिले 
नजरअंदाज कर दें 
तव्वजो भी न दें
अच्छा तो नहीं  मुझे भी लगा था
जब तुमने ऐसा किया था
बिना किसी वजह से 
आज वही किया 
जो मुझे तुमने दिया था 
वह व्यवहार मैंने लौटाया है
उधार मैं रखता नहीं 

आदमी एक खिलौना है

आदमी एक खिलौना है
आना और जाना है 
नहीं यहाँ ठहरना है 
जब तक हवा भरी है
तब तक फूला है
बाद में फुस्स हो जाना है 
नहीं रह जाता कुछ भी 
न साथ कुछ जाता
अकेले आया था
अकेले ही जाना है
यह वह जानता है
तब भी भीड़ का हिस्सा रहता है
जकड़ा रहता उलझनों में
ताउम्र सुलझाता रहता है
सुलझते सुलझते उलझ जाते हैं
फिर वही सब दोहराता है
एक दिन सब छोड़ चला जाता है 

Wednesday, 29 January 2025

फर्क पड़ता है

हवा सर्द थी
बहुत बेरहम थी
ठिठुरा रही थी
कंपकंपी बढ़ा रही थी 
हम उससे अपने को बचाने की कोशिश कर रहे थे
शाँल लपेट रहे थे 
स्वेटर भी पहन रखी थी
मोजे - दस्ताने भी पहन रखे थे 
वह अपनी गति से 
हम सोचते रहें
जल्दी जाए 
वह कहाँ मानने वाली
हवा है 
स्वतंत्र है
उसकी अपनी मर्जी
हम उसकी तरह क्यों नहीं 
अपनी मर्जी नहीं चला सकते
सबका ध्यान रखना पड़ता है
किसको अच्छा लगता है 
नहीं लगता है
हवा को फर्क नहीं
हमको पड़ता है
हम मनुष्य है
हमारे पास दिल है 
जिसको फर्क नहीं उसे इंसान की संज्ञा नहीं दी जा सकती 

Tuesday, 28 January 2025

जो जाने वह जाने जमाना नहीं

मन हमारा भी था
छांव में बैठने का 
कुनकुनी धूप का मजा लेने का
बारिश की बूंदों को चाय की  चुस्की से निहारने का 
मन ही मन खुले आसमां के तले गुनगुनाने का 
समंदर किनारे बैठ लहरों की आवाज सुनने का 
यहाँ- वहाँ मटरगश्ती करने का 
लेकिन यह सब हो न सका
हमारे हिस्से में कड़कड़ाती धूप आई
छांव तले सुस्ताना नहीं चलना लिखा था 
हम चलते गए 
कभी धीरे चले 
कभी दौड़े  
कभी गिरें और फिर अपने आप उठ भी गए 
किसी ने कहा हमसे 
आप बहुत मजबूत हैं 
कैसे कहें उनको 
हम मजबूर हैं 
हम तो अपनी इच्छानुसार चल भी न सकें 
जो करना चाहा वह कर भी न सकें 
आज भी वही मजबूरी है
जो दिखता है वह होता नहीं
होने और दिखने में बड़ा फर्क होता है
हम जो दिखते हैं वैसे तो असल में हम हैं ही नहीं
जो लोग हमारे बारे में बोलते हैं 
वह भी सही नहीं 
ऐसा नहीं कि सबकी हमारे प्रति यही धारणा है
कुछ ऐसे भी हैं 
जो मुझे सच में जानते हैं
बखूबी पहचानते हैं 
हम क्या हैं 
हमें भी पता है 
ऊपर वाले को भी पता है 
तभी तो निराश नहीं करता
मुश्किल को आसान बना देता है
देर से ही सही देता तो है 
देने वाले ने बहुत दिया 
जिसके काबिल हम थे भी नहीं
लोगों का क्या 
उसका बस हाथ रहें
उसका बस साथ रहें
जो जाने वह जाने 
जमाना नहीं