पता नहीं कैसे गुजर गई
बेटी - बहन - पत्नी - माॅ की भूमिका निभाते - निभाते अपने को भूल गई
हर रिश्ता दिल से निभाया पर पता नहीं क्या कमी रह गई
किसी के दिल के करीब न हो पाई
सब मुझमें कुछ न कुछ कमियां निकालते रह गए
मैं अब तक अपने को सुधारते रह गई
उसका कोई हल तो निकला नहीं बस मैं लोगों से दूर होती गई
प्यार मुझे सब करते हैं किया भी
मां - पिता भी पति भी
वहाँ स्वतंत्रता होकर भी नहीं थी
पहले उनके अनुसार बाद में उनके अनुसार
एक समाज थे
एक सास- नन्द - जेठानी से बढ़कर था
सब उसमें ही समाए हुए
कभी किसी ने मुझे मनाया नहीं
रूठना भी मुझे ही मानना भी मुझे ही
परिस्थिति के जिम्मेदार ये नहीं केवल मैं
सबने मुझ पर एहसान किया
उनका अपना धर्म और कर्म कुछ नहीं
आज पीछे मुड़कर देखती हूँ
तब सब कुछ कैसा ही लगता है
मन से मैंने कुछ नहीं किया ??
जबरदस्ती किया शायद
आज पढ़ाई भी की होती ढंग से
प्रोफेसर होती बड़ी
आज बच्चों पर ध्यान दिया होता
तब वो और कुछ होते
जीवन ढर्रे पर चलता रहा
हम कभी यहाँ कभी वहाँ ढालते रहें
सबके बीच पड़ते रहे
हासिल कुछ नहीं हुआ
बस नाम खराब हुआ
अपने लिए कभी सोचा ही नहीं
अपना वजूद कभी अह्सास कराया ही नहीं
आज जब कोशिश की
तब सब कुछ बदला - बदला
न वह समय न वह परिस्थिति
अब तो बस मजाक लगता है सब
वह जो पहले नहीं लगता था
न कभी किसी से कुछ मांग
न ईश्वर से कुछ शिकायत
हुई भी तो बस थोड़े समय के लिए
उसको लोगों ने कुछ और समझ लिया
परेशानी कभी सुनी नहीं
सबको सब अच्छा सुनना
कुछ बोलने की कोशिश तो उपहास
जो जिम्मेदार थे असली
वह तो मस्त रहें
मैं बस त्रस्त रही
अभी भी सब खत्म नहीं हुआ
गाहे - बगाहे सुनना पड़ता है
कभी-कभार तो बिन कारण के
कुछ भी दोष मढ़ दिया जाता है
अपने रवैया किसी को याद नहीं
मेरी हर बात सबको याद है
चटकारे ले किस्से सुनाए जाते हैं
सुनाने वाले भी अपने सुनने वाले भी अपने
ऐसा लगता है जीवन व्यर्थ किया मैंने
फिर लगता है नहीं
मैने कीचड़ में से मोती निकाला है
अपना एक मुकाम कायम किया है
दोष लगाने वाले भी पूछते हैं मुझी से
निर्णय लेना इतना आसान नहीं होता ना
दूर खड़े हो तमाशा देखना आसान है
काम करना अलग बात है
कभी अपनों की कभी गैरों की
सुनती रही
उलझती रही
जिंदगी यू ही गुजरती रही
गुजर रही
बहुत कुछ देखा - सुना
लगता है
अभी भी बहुत कुछ बाकी है
ये उम्र सब छोड़ने की
कुछ छूट नहीं पा रहा
देखे कब तक चलता है
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