अब धरती माता तप नहीं रही है
गर्मी से जूझ रहे लोग भी आनंदित हुए
रात में ऑख खुली
थोड़ा ठंड महसूस हुई
चादर जो कितने महीनों से ऐसे ही सिरहाने पड़ा था
उसको खोल ओढ़ लिया
मन को सुकून मिला
इस वर्ष की बेहिसाब गर्मी से बेहाल हो गई थी
सहन नहीं हो रहा था
पर क्या करें
मौसम का मिजाज है
रात में नींद खुलने पर जल्दी फिर नहीं आती
विचार उमड़ते - घुमड़ते रहते हैं
ठंड अच्छी लग रही थी
गर्मी की तपन भूल गई
ऐसा ही जीवन है शायद
कभी बहुत परेशान हो जाते हैं
कुछ वक्त के बाद वह समय भी निकल जाता है
तब इतनी याद नहीं रहती
सुख - दुख आनी - जानी है
वक्त बदलता रहता है
ठंड, गर्म , वर्षा , अंधड़ आते रहते हैं
चले भी जाते हैं
उनको जाना ही है
टिक कर रह नहीं सकते
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