Wednesday, 9 September 2026

पाषाण ???

कभी-कभार मन में ख्याल आता है 
पत्थर को कठोर कहा जाता है 
आखिर क्यों ??
वह जो हर परिस्थिति में अडिग रहता है 
जरूरत पड़ने पर अपने को मोड़ भी लेता है 
उस पर छेनी - हथौड़ी चलती है 
उसका कलेजा छलनी होता है 
तब भी वह अपने को उस मूर्ति में ढाल लेता है 
उस पर खुदाई की जाती है 
नाम उकेरे जाते हैं 
अपने को मिटाकर दूसरों का नाम चमकाता है 
मंदिर में स्मारक पर 
टूटता भी है बिखरता भी 
समुंदर के लहरों के थपेड़े सह रेत बन जाता है 
कण - कण टूटता है 
इतना होने पर भी पाषाण है 
कठोर है 
उपमा मिल गया है 
उसको उसी रूप में देखना 
औरों की खातिर 
         उसने स्वयं को मिटाया 
औरों ने उसे पाषाण कहा 
               न जाना उसकी महत्ता 
जो सदियों से अपनी छाती पर 
           उनकी महत्ता दर्शा रहा 

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