माॅ यशोदा का यशोदोत्सव है
माखन मिसरी मुख पर लगा हुआ
गाय चराते कान्हा
मार खाते गोपाल
गोपी संग रास रचाते
ग्वालों संग हुड़दंग मचाते
बांसुरी बजाते
यह रूप सभी को भाता है
इसका दूसरा रूप भी
कंस और पूतना का वध करते
कालिया पर नृत्य करते
हस्तिनापुर के दरबार में विराट रूप दिखाते
कुरूक्षेत्र में सारथी बन गीता का पाठ पढ़ाते
सुदर्शन चक्र घुमाते
बांसुरी से सुदर्शन की यात्रा
इतना आसान तो नहीं हुआ होगा
माखन से विदुर घर साग - रोटी खाना
मां के आशिर्वाद से मां गांधारी के श्राप की स्वीकारता
हमेशा स्मित हास्य
भांजे अभिमन्यु की मृत्यु
अपने ही कुल को लड़ते - मरते देखना
अंत में एक बहेलिएं के बाण से मृत्यु
बहुत कुछ सहा
बहुत कुछ सीखा
बहुत कुछ किया
इस प्रक्रिया में उनका दिल किसी ने नहीं देखा
जो राधा के लिए धड़कता था
कर्म के बंधन में जो बंधे तो कभी मुक्त ही न हो जाए
अपने बच्चों को भरपूर प्यार दें
बाद में तो जिंदगी के महाभारत में उतरना ही है
कान्हा से शुरुआत कर कृष्ण तो बनना ही है
तब तो स्वाभाविक है
आप यशोदा भी बने
जिंदगी के महाभारत में वह हार नहीं माने
स्मित हास्य से सामना करें
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