Friday, 23 October 2026

बेटी के जन्म से पराएपन की गाथा

बेटी का वह घर नहीं होता जहाॅ वह जन्म लेती है 
उसको संवारती है , दुलारती है 
झाड़ू - पोछा करती है , सजाती है 
मां के साथ हर वक्त खड़ी रहती है 
सब्जी लाने से लेकर बिस्तर बिछाने की जिम्मेदारी 
खाना बनाने - खिलाने - समेटने और बर्तन साफ करना 
छोटे भाई- बहनों की देखभाल करना 
समय से पहले ही बड़ी हो जाती है 
कोई मान - मनुहार नहीं करती 
जो है उसी में काम चला लेती है 
पिता की हैसियत और मजबूरी दोनों को यह भलीभांति समझती है 
मेहमानों का स्वागत सत्कार से लेकर बैंक का काम सब कर लेती है 
अपने बासी खाना खा लेती है पर पिता - भाई को ताजा देती है 
उनकी थाली में कभी घी - दूध नहीं रहता 
कपड़े भी ऐसे - वैसे में चला लेती है 
तब भी कहीं जिक्र नहीं करती 
अपने परिवार की बुराई उन्हें नहीं भाती 
परिवार वालों के खिलाफ सुन नहीं सकती 
किसी से भी लड़ जाती हैं 
पढ़ाई में भी किताबें नहीं खरीदती , मांग कर चला लेती है 
जब घर की माली हालत अच्छी नहीं रहती तब भी वह गर्व से रहती है 
वह अपने को गार्जियन ही समझने लगती है 
अपने से छोटों पर धौंस जमाना ,उन पर नजर रखना 
जब तक वह रात को घर नहीं आ जाए जागते रहना 
टेलीविजन देखने पर , घूमने पर , देर रात नीचे खड़े होने पर टोकाटाकी 
दोस्तों के घर में बेवक्त बैठने पर नाराजगी 
हुक्म चलाती है भरपूर 
उसको यह भान ही नहीं रहता 
वह किस खेत की मूली है 
जब ब्याह हो जाता है वह पराई हो जाती है 
देखने का नजरिया  बदल जाता है 
उस घर के मामलो में वह बोल नहीं सकती 
चुपचाप रहें तो ठीक अन्यथा न जाने क्या-कुछ कहा जाता है 
जवाब न दें , गलत का प्रतिरोध न करें 
अगर उसकी हैसियत अच्छी न हो तब तो उसे तुच्छ देखा जाता है 
बार-बार उसे उसकी औकात याद दिलाई जाती है 
उस पर एहसान का एहसास हर पल कराया जाता है 
 उसे नजरअंदाज किया जाता है 
लालची करार दिया जाता है 
कंजूस कह मजाक उड़ाया जाता है 
स्वार्थी कहा जाता है 
जिस परिवार की मंगल कामना वह दिन - रात करती है उसी पर तोहमत लगाया जाता है वह जलती है सबसे 
जिस परिवार पर घमंड करती है 
बाहर बड़ाई मारती है 
वह सब दिखावा और ढोंग करती है ताकि उसकी इज्जत बनी रहें 
मायके और ससुराल पर ही वह निर्भर रहती है 
उसका अपना कुछ नहीं होता 
वह डरती रहती है कि कहीं मायके का कोई उससे रूठ न जाए 
कोई नहीं बुलाए तो भी वह जाती है 
कोई नहीं प्रेम और अपनेपन से बात करें तब भी 
वहाँ उसको कुछ बुरा नहीं लगता 
उस घर से जन्म का रिश्ता जो है 
उस घर के लोगों से भी 
वह कभी-कभार झगड़हिन का खिताब भी पा जाती है 
घर फोड़ने का भी 
घमंडी का भी भले ही उसके पास घमंड करने लायक कुछ भी बात नही 
जिन मां - बाप के लिए वह सब कुछ करने को तैयार रहती थी 
उनके प्रति गलत होते देख आवाज नहीं उठा सकती 
किसको टोक या बोल नहीं सकती 
मां - बाप भी चुप चुपचाप रहते हैं , उसे चुप कराते हैं 
मां - बाप का किया भी उसे ही सुनना पड़ता है 
भले ही वह उसमें सहभागी न हो 
यहाँ तक कि उसे उस बात का पता न हो 
गलती उसकी केवल वह कि वह उनके साथ हर वक्त- बेवक्त खड़ी थी 
उसको कोई  सम्मान नहीं 
वह न घर की सदस्य ही होती है और न मेहमान ही 
उसका स्वागत मन से कोई नहीं करता 
एक समय बाद तो कोई याद भी नहीं करता 
नई पीढ़ी तो इस नजरिए से देखती है जैसे डायनासोर आ गई हो 
वह छुप - छुप हंसती है और मजाक उड़ाती है 
उसकी छवि इस तरह से बना दी जाती है कि उसको लगता है कि वह सच में ऐसी ही है 
उसकी बात उसकी प्रतिक्रिया सब याद रहती है 
बरसों बाद भी सबके सामने मजाक बनती है 
बातें याद कर ठहाके लगाए जाते हैं
यहाँ तक कि उसके बच्चों के सामने भी मां का माखौल 
उसे नीचा दिखाने में कोई कसर नहीं 
यह होती है 
बेटी के जन्म से बेटी के परायेपन की गाथा 
यह कथा अमूमन हर घर की 
बेटी , बहन , बुआ की सिलसिलेवार चलने वाली दास्तां 

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