जब वह ठान लेती है
तब वह यमराज से लड जाती है
सावित्री बन पति को मांग लाती है
वह जब ठान लेती है
तब रातोरात तख्तोताज उलट देती है
कैकयी बन राजा दशरथ से अयोध्या का राज मांग लेती है
जब वह ठान लेती है
तब तो महाभारत का युद्ध निश्चित है
अपने सखा कृष्ण से वह प्रतिशोध ही मांग लेती है
जब वह ठान लेती है
तब लक्ष्मीबाई बन पीठ पर बेटे को बांध अंग्रेजों से लोहा ले लेती है
जब वह ठान लेती है तब इंदिरा बन विश्व के नक्शे को बदल डालती है
एक नए बांगलादेश का निर्माण कर डालती है
वह मीरा बन कर सिंहासन को धता बता देती है
शबरी बन राम को अपनी कुटिया में बुला लेती है
सुलोचना बन मेघनाथ की कटी भुजा से लिखवा लेती है
सीता बन रावण की लंका के विनाश का कारण बन सकती है
उसको कम आंकना बहुत बडी भूल
वह अपने लिए नहीं अपनों के लिए न जाने क्या - क्या कर जाती है
शक्तिस्वरूपा बन जाती है
तब भी दिखाती है
वह कुछ भी नहीं है
जो इस भ्रम में रहता है
नारी को कमजोर समझता है
यह तो उसकी समझ का फेर है
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Monday, 1 March 2021
यह तो उसकी समझ का फेर है
सहना कितना
सहने को तो सब सह लेते हैं
सब्र भी कर लेते हैं
इंतजार भी कर लेते हैं
फिर भी वक्त नहीं बदलता
तब तो धीरज टूट जाता है
मिट्टी की मूर्ति नहीं
भावनाओं में रहता इंसान है
जब वह टूटता है
तब जुड़ना बहुत कठिन
जब तक सहता है
तब तक सहता है
जब सीमा खत्म हो जाती है
तब सारे बंधन खत्म कर देता है
उसे फिर वही रूप में पाना
वह शायद होता नहीं
परीक्षा तो परीक्षा की तरह हो
जीवनपर्यन्त परीक्षा
तब तो वह सच में परेशान
जोड़ते - जोड़ते हैरान
जिंदगी के खेल से परेशान
हर बार हार
नहीं उसे स्वीकार
जलेबी की मिठास
जलेबी टेढी ही सही
है तो रसभरी
मुंह में डालते ही कब अंदर
क्रिसपी और रस में डूबी
नरम हुई तो मजा नहीं
लुजं - पुंज जैसी
वह स्वाद नहीं
कडी हो और मीठी हो
यह एक विरोधाभास
वैसे ही इंसान का भी
भले कठोर हो पर मीठा हो
तभी कठोरता शोभा देती है
कर्मठ हो , तपा हुआ हो
आलसी , निकम्मा हो
तब भले नम्र हो कितना भी
वह शोभित नहीं
मैं कमजोर शख्स नहीं
जीवन कितना भी कठिन हो
तब भी मैं जीना चाहती हूँ
क्योंकि इससे प्यारा भी मुझे कुछ नहीं
जब तक जीवन तब तक मैं
उसके बाद का किसे पता ??
जो कुछ हासिल करना है
यहीं करना है
जब जीओगे तभी तो कुछ करोंगे
अन्यथा बाद का किसने देखा है
लोग तुम्हें याद करते हैं या नहीं
बाद में करेंगे या नहीं
उस बाद के पहले आज की सोचो
आज आप कैसे हैं
आपका संबंध लोगों से कैसा है
लोगों के काम आप आ रहे हैं या नहीं
आपकी जरूरत है या नहीं
किसी के लिए न सही
अपने लिए
अपनों के लिए
बहुत मुश्किल से मिला है यह जीवन
लोगों की तपस्या है
न जाने कितनों का योगदान हैं
संवारने और बनाने में
तब आपको अकेले यह निर्णय का भी अधिकार नहीं
जीना तो पडेगा ही
कुछ जिम्मेदारी बनती है
तब आप जीए
खुशी से जीना सिखिए
क्या ले जाना है
सब यही रह जाना है
पर जाने के समय
विदा की बेला तक
यह तो कह सकें
मैंने अपना जीवन जीया है
भागा नहीं हूँ
न डरा और घबराया हूँ
मैं कमजोर शख्स नहीं