Monday, 29 August 2016

राष्ट्रीय क्रीडा दिवस - हॉकी के जादूगर ध्यानचंद का जन्मदिन

आज मेजर ध्यानचंद ,हॉकी के महान खिलाडी का जन्म
हॉकी के इस जादूगर  का खेलते समय स्टिक चिपक जाती थी और वैसा हॉकी का करतब फिर नहीं दिखा
खेलों को बढावा देना ,प्रोत्साहित करना
आज की मांग
१२१ करोड वाले देश को केवल दो पदक
पदकों के लिए तरसता देश
हम शिक्षा पर तो खर्च कर सकते हैं पर खेलों पर नहीं
क्योंकि वहॉ भविष्य उम्दा नजर नहीं आता
" खेलोगे - कूदोगे बनोगे गँवार
पढोगे - लिखोगे बनोगे नवाब"
यह धारणा थी पर समय बदल रहा है
खेल दम- खम और गति का ही नहीं
प्रसिद्धि और संपत्ति भी दिला रहा है
लडके क्या लडकियॉ भी बढ- चढकर भाग ले रही है
अपने जलवे भी दिखा रही है
मैदान पर बाजी मार रही है
पर फिर भी बहुत कुछ बाकी है
हॉकी ,कबड्डी ,कुश्ती तो हमारे पारंपरिक खेल है
इनमें तो हम सबको पछाड ही सकते हैं
खिलाडी खेले ,खेल भावना से न कि स्वार्थ से
लालच और स्वार्थ जहॉ ,वहॉ खेल तमाम.
बल्ला घुमाएं तो तेंडुलकर जैसे
मुक्केबाजी मैरी कॉम जैसे
दौड लगाए तो पी टी उषा की तरह
कमाल दिखाए तो सिंधु और पटखनी दे तो साक्षी के भुजदंडो से
खेल केवल खेल हो ,भ्रष्टाचार का उसमें नाम - निशान न हो
खेल में अग्रणी हो हमारा हिन्दूस्तान
ओलंपिक में तिरंगा फहराए और शान दिखाए.

Sunday, 28 August 2016

आया सावन - जीवन का पाठ पढाता सावन

तन बावरा ,मन बावरा ,जब सावन आया हरा भरा
मदमस्त कर रही ये हवा
छा रही काली घटा ,पड रही रिमझिम फुहार
सृष्टि भी मना रही जन्मोत्सव
नवा महीना ,सृजन का महीना
हमेशा सबको रहता है इंतजार
हरियाली ने मखमली सेज बिछाई
त्योहारों की रंगत आई
गया आषाढ आया सावन करता भादों का इंतजार
पेड- पौधे ,पशु- पक्षी सब तृप्त हुए
चिडियॉ चहकने लगी ,कोयल कुहकने लगी
मोर पंख फैला नाचने लगे ,पपीहा पी- पी करने लगा
मेंढक भी टर्राने लगे, कीट- पंतगे भी बोलने लगे
संगीत की लहरियॉ गुंजने लगी
मायके में बेटियॉ आने लगी
परिवार की रंगत खिलने लगी
सब इकठ्ठा हो जश्न मनाने लगे
मन हरा , तन हरा ,प्रकृति का हर अंग हरा
पर यह भी है क्षणभंगुर
शीतल कर जाता और जाते- जाते शीत त्रृतु भी दे जाता
प्रकृति अपना खेल दिखाती
हर चार महीने बाद घर बदलती
जीवन का संदेश सिखाती
नश्वरता का पाठ पढाती
कुछ नहीं यहॉ स्थायी
चाहे वह बचपन हो, युवावस्था हो या वृद्धावस्था
अमरता का वरदान किसी के पास नहीं
काल किसी का मोहताज नहीं
कब कौन- सा करवट ले
यह पाठ भी पढाता जाता सावन

Saturday, 27 August 2016

मदर टेरेसा - आज देश आपको याद कर रहा है

सात समुन्दर पार से आई एक खूबसूरत परी
वह और कोई नहीं हमारी मदर टेरेसा थी
एक बार आई तो यही की हो रह गई
फिर वापस कभी नहीं गई
कुष्ठ रोगियों और गरीबों की पीडा न देख सकी
वह मॉ बन गई सबकी
सेवा के पथ पर चल पडी
कोलकाता की झोपडपट्टी से शुरू हुआ सफर
आजीवन चलता रहा
अपना जीवन दीन- असहायों को समर्पण कर देना
किसी एक बच्चे की मॉ नहीं वह सारे भारत की मॉ बन गई
बहुत कुछ विवाद भी हुए उनके नाम से
धर्म प्रचार का आरोप लगाया गया
पर सारे आरोपों को धता बता वह सेवा कार्य में लगी रही
उनकी सेवा के आगे कोई न टिक सका
भारत माता की वे असली बेटी बन गई
तिरंगे में लपेट कर उनको अंतिम बिदाई दी गई
ऐसा समर्पित जीवन और सादा बिरले ही मिलेगे
सफेद साडी ,नीले पट्टे वाली यह उनकी पोशाक थी
लगता है कि नीले आसमान ने अपनी इस सफेद परी को धरती पर भेजा हो
सौभ्यता और चेहरे पर मुस्कराहट बरकरार रखने वाली
मदर हमारे बीच नहीं है
पर उनके अमूल्य योगदान को सदियों तक याद रखा जाएगा
उनको संत की उपाधि देने की तैयारी चल रही है
वास्तव में वह एक महान संत ही थी
जिन्होंने सब कुछ
अपना घर ,देश ,सारी इच्छाओं का त्याग कर जीवन मानवता की सेवा में समर्पित कर दिया
वे भारत की न होकर भी यही को हो रह गई
और देश ने उनके कार्यों को सराहा ,सम्मान भी दिया
वे भारत रत्न भी बनी
आज भी वे हमारी है तथा हम पूरे सम्मान के साथ  उनके जन्मदिन पर उन्हें याद कर रहे हैं
देश की बेटी और मानवता की देवी को प्रणाम

Friday, 26 August 2016

बचपन के दिन भी क्या दिन थे

बचपन के दिन भी क्या दिन थे
वह रूठना ,जमीन पर लोटना
किसी चीज के लिए जिद पर अडना
गुस्सा आने पर पैर पटकना
चीजों को फेकना
मुँह फुलाकर बैठना
बिना कारण बक बक करना
हँसना और खिलखिलाना
लपाछिपी और खो- खो खेलना
बगीचे में तितलियॉ पकडना
गिरती पंतग को पकडने के लिए दौडना
पानी में छप- छप करना
खाना नहीं खाना बस खेलना
देर तक सोना
पढने में बहानबाजी करना
सबका मजाक उडाना
नकल करना
न चप्पल की परवाह ,नंगे पैर ही भागना
दोस्त ने कोई चीज ले ली तो उससे झगडना
आमऔर जामुन पर पत्थर मार गिराना
कच्ची कैरियॉ मुँह बना- बनाकर खाना
शाम को देर से घर आने पर पिता की डाट सुनना
मॉ का बचाना
तरह- तरह के झूठ बोलना
दोस्तों में डींग हाकना
जाने कहॉ सब लुप्त हो गया
हम तो अब बन गए है बडे
सब कुछ समय से करना
हर काम सोच- समझ कर करना
दिल में दर्द हो पर होठों पर हँसी बिखेरना
गुस्से को दबाकर रखना.
हर जिम्मेदारी को निभाना
मन न करे तब भी वह काम करना
क्योंकि अब हम बडे हो गए है
काम के बोझ तले दब गए हैं
बचपन तो कहीं खो ही गया है
बस बची है उसकी यादे
जो महसूस कराती है कि हम भी कभी बच्चे थे
और ले आती है हँसी यह कहती हुई कि
बचपन के दिन भी क्या दिन थे

      शुक्रिया  बचपन ,अलविदा बचपन