नदी का प्रवाह तेज था
एक तिनका नदी की धारा के साथ ही बह रहा था
उसने सोच लिया था
जहाँ ले जाएगी चला जाऊंगा
अपने को भाग्य भरोसे छोड़ दिया
दूसरा तिनका यह मानने को तैयार नहीं था
जद्दोजहद कर रहा था
लड़ रहा था
कोशिश कर रहा था
वह नदी की धारा के अनुसार बहने को तैयार नहीं
अब तो दोनों का दृष्टिकोण अलग- अलग
कौन सही कौन गलत ???
यह भी तो नहीं कहा जा सकता
एक जा रहा है जहाँ उसको ले जाया जा रहा है
वह संघर्ष भी नहीं करना चाहता
न विरोध भी करना चाहता
दूसरे को यह स्वीकार नहीं
किसका क्या हश्र होगा
कौन कहाँ जाएगा
क्या हासिल होगा
एक बूंद की आपबीती
जो ऊपर से तो गिरती है
कहाँ जाएगी वह यह नहीं जानती
सीप का मोती बनेगी
किसी की प्यास बुझाएगी
समंदर में मिल अपने को खारा करेंगी
नदी - कुएं में मिल मीठा जल बनेगी
खेतों को सींचेगी
पेड़ - पौधों को लहलहाएंगी
गंदी नाली में गिरेगी
अब तो वह बादलों को छोड़ निकल चुकी है
जो होगा वह देखा जाएगा
उसे बादलों की बंदिश स्वीकार नहीं
चल पड़ी है
देखना है होता क्या है
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