अचानक बारिश होने लगी
आज छाता घर पर ही छोड़कर आई थी
पछतावा होने लगा
अचानक मन में ख्याल आया
बारिश को क्या मैं रोक सकती हूँ
अपनी इच्छानुसार चला सकती हूँ
उत्तर मिला नहीं
छाता तो ओढ़ सकती हूँ
कुछ हद तक तो अपने को बचा सकती हूँ
शायद जीवन भी ऐसा ही है
परिस्थिति पर तो हमारा नियंत्रण नहीं है
पर उसका मुकाबला तो हमें करना ही है
कुछ न कुछ तो बचाव करना है
पूर्ण रूप से तो नहीं कुछ हद तक ही सही
मुसीबत जब आए
प्रयास नहीं छोड़ सकते
बचाव रूपी छाता तो तानना ही चाहिए
सब कुछ भाग्य और परिस्थिति पर नहीं छोड़ना
यह बारिश भी हमेशा की नहीं है
आई है तो जाएंगी भी
मौसम बदलते हैं
समय बदलता है
एक सा कुछ भी नहीं रहता
आज कुछ तो कल कुछ
यही है जीवन का फंडा
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