अपनों को छोड़कर दूर जाना पड़ता है
यही प्रकृति का नियम है
पेड़ अपने पुराने पत्तें गिराता है
तभी उसमें नये पत्तें आते हैं
सांप भी अपनी केंचुली उतार कर नया धारण करता है
आना - जाना लगा रहता है
नदी भी पहाड़ को छोड़कर निकलती है
तभी पूजी जाती है
जीवनदायिनी बन जाती है
गोपाल भी गोकुल छोड़कर गए
द्वारिकाधीश बने
पांडवों के विधाता बने
राम वन गए तभी अपना परचम फहराया
जीवन सजीव है
चलायमान है
रूक गया तो वही ठहर गया
तो चलते रहे
ऐसे भी यहाँ हमेशा के लिए कोई नहीं आया है
जीवन भी छोड़ना पड़ता है
तब गांव क्या
शहर क्या
अपने क्या
दोस्त- रिश्तेदार क्या
सब छूटते जाते हैं
नए जुड़ते जाते हैं
ठहरिए मत
ठहराव कभी ऊपर नहीं ले जा सकता
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